The Mysterious Bell – Chapter 920
"कैसे पता?"
"क्योंकि परदादा इसे हमेशा खुला रखते थे," मैंने कहा। "दादा ने एक बार कहा था — बाप की दुकान में दराज़ें खुली रहती हैं, इसलिए नहीं कि वो लापरवाह हैं, बल्कि इसलिए कि उनके पास छिपाने को कुछ नहीं था।"
काजल ने कहा, "तो ताला किसने लगाया?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मैंने कहा, "आज तक किसी ने नहीं बताया।"
और तभी दरवाज़े से आवाज़ आई।
"हाँ, बहुत बढ़िया।"
मैंने पलटकर देखा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। हाथ में मेरी नहीं, अपनी हिसाब की कॉपी थी। पीली जिल्द, कोने मुड़े हुए, ऊपर किसी चीज़ की स्याही का धब्बा। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, माथे पर चंदन का टीका, और आँखों में वो भाव जो सिर्फ़ उन्हीं के पास होता है — जिसमें डाँट भी होती है और प्यार भी, और दोनों एक साथ।
"मैं सुबह से रसोई में हूँ," उन्होंने कहा, "टिफ़िन के पच्चीस डिब्बे बाँधने हैं, तुम्हारी बहन अस्पताल जाने की तैयारी में है, और तुम लोग यहाँ बैठकर खज़ाना खोदने लगे हो।"
"माँ," मैंने कहा, "सिर्फ़ पाँच मिनट—"
"हिसाब की कॉपी अभी तक नहीं बनी," उन्होंने कहा। "और ये जो तुमने ट्रंक खोलकर रखा है, इसे बंद करने का भी वक़्त नहीं मिलेगा।"
टिंकू ने मासूम आवाज़ में कहा, "आंटी, खज़ाना मिले तो आपको पहला हिस्सा।"
माँ एक पल रुकीं।
फिर वो हँसीं। पूरे कमरे में हँसी, जिससे धूल हिली।
"पहला हिस्सा?" उन्होंने कहा। "बेटा, पहला हिस्सा तो मैं पहले ही ले चुकी हूँ — पच्चीस साल से, हर महीने।" और फिर उन्होंने कॉपी हिलाकर कहा, "ये खज़ाना है। इसी में लिखा है कौन कितना देता है और कौन कितना देता है बाद में।"
"आंटी, बाद में कौन देता है?"
"तेरे उस्ताद के पापा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में एक ऐसा काँटा था जो सिर्फ़ ख़ुद पर निकला था। "सोचते हैं, हिसाब लिखने से उनका नाम कम हो जाता है।"
कमरे में चुप्पी हुई।
मैंने देखा — माँ की आँखें संदूक पर पड़ी थीं। एक पल के लिए भी नहीं, बल्कि दो पल के लिए। और उनका चेहरा वैसा नहीं था जैसा अभी था।
"ये संदूक?" उन्होंने धीरे पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "परदादा शिवनारायण का।"
माँ ने कॉपी अपनी छाती से लगा ली। "इसमें क्या है?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "ताला नहीं खुल रहा।"
वो करीब आईं। दरवाज़े से चार छः क़दम, वो भी बैसाखी के सहारे — और मुझे लगा कि ये चार क़दम उन्होंने बहुत बड़ी मेहनत से लिए। वो रुकीं, और अपनी उँगली से संदूक के ऊपर धूल हटाई। बिना जल्दी। और फिर उन्होंने वो किया जो मैंने आज तक उन्हें कभी नहीं करते देखा।
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
बस इतना। दो पल। तीन पल। और फिर खोल दीं।
"ताले का छेद देख," उन्होंने कहा।
"देखा," मैंने कहा। "चाबी अंदर जाती है, पर घूमती नहीं।"
"नहीं," उन्होंने कहा। "तूने देखा नहीं। तूने सिर्फ़ घुमाया। अब देख।"
मैंने काजल की टॉर्च ली। उसकी बत्ती छोटी थी, पर काफ़ी तेज़। मैंने ताला पकड़ा और छेद के अंदर रोशनी डाली।
और मैं ठिठक गया।
छेद के अंदर की दीवार अलग थी। जैसी होनी चाहिए थी, वैसी नहीं। छेद के अंदर, नीचे, एक सफ़ेद, दबी हुई चीज़ दिख रही थी — न रुई, न काग़ज़, कुछ और। धूसर, हल्का, दबकर सख़्त हो चुका।
मैंने काजल की सुई जैसी पतली चाबी की नोक डाली और धीरे से खुरचा।
कुछ निकला। बहुत छोटा। मैंने उसे उँगली पर रखा।
कपड़े का रेशा था। सख़्त। और उसके साथ एक चीज़ और — मोम जैसी कोई चीज़, जो अब पत्थर हो चुकी थी।
"ये क्या है?" काजल ने पूछा।
"मोम," मैंने कहा। "या लाह। या गोंद।"
टिंकू ने झाँका। "ये तो… ये तो जानबूझकर डाला गया है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और सोच-समझकर डाला गया है।"
मैंने ताला फिर पकड़ा। मैंने उसे उलटा किया। और जो मुझे दिखा, मेरी रीढ़ में ठंड उतर गई।
ताले के छेद के अंदर से, अंदर की तरफ़ से, किसी ने कुछ ठूँस दिया था। और वो चीज़ ऐसे ठूँसी गई थी कि छेद बाहर से तो खुला दिखता था, चाबी अंदर तक जाती थी, पर उसके दाँते जहाँ घूमने चाहिए थे, वहाँ कुछ नहीं था। कुछ नहीं। जैसे किसी ने ताले का पेट भर दिया हो।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों के पास होता है और जिसे बड़े भूल जाते हैं। "तो ये ताला… ये ताला बंद नहीं है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब, ये ताला खुला नहीं है," उसने कहा। "इसे खुलने से रोका गया है।"
कमरे में बहुत चुप्पी हुई।
मैंने अपनी उँगली से ताले को छुआ। मेरी उँगली पर ज़ंग और तेल लगा। और मुझे लगा कि ये ताला, जो बरसों से मेरी दुकान के पीछे पड़ा था, मेरे ही घर में मेरा इंतज़ार कर रहा था। सिर्फ़ इस एक बात के लिए — कि एक दिन मैं आऊँ, चाबी डालूँ, और मुझे पता चले कि मैं अकेला नहीं हूँ जो इसे खोलना चाहता है। कोई और भी था। कोई और भी था जो इसे बंद करना चाहता था।
"अंकुश," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "तू इसे खोलने की कोशिश मत कर।"
"माँ—"
"मैं जानती हूँ तू क्या कहेगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तू कहेगा कि ये मेरा घर है, मेरा संदूक है, मेरा हक़ है। मगर सुन — जो चीज़ इतने बरसों से मेरे घर में बंद है और जिसे किसी ने अंदर से बंद किया है, वो अगर आज खुलेगी, तो वो कुछ लेकर खुलेगी। और मुझे नहीं पता कि वो क्या लेगी।"
मैंने कुछ देर उन्हें देखा।
"माँ," मैंने कहा। "जो बंद है, वो मेरे पास है। जो चाबी मेरे गले में है, वो पंद्रह साल से मेरे पास है। पापा ने दी थी, बिना बताए कि किस चीज़ की है। अगर ये चाबी किसी काम की नहीं है, तो पापा ने मुझे ये क्यों दी?"
माँ के चेहरे पर कुछ हुआ। कुछ ऐसा, जो मुझे उनके चेहरे पर पहले कभी नहीं दिखा।
"क्योंकि उन्हें डर था," उन्होंने कहा। "कि अगर वो इसे अपने पास रखेंगे, तो किसी दिन इसे इस्तेमाल कर लेंगे।"
"और मुझे देकर वो क्या करना चाहते थे?"
माँ ने कॉपी अपने सीने से नीचे की। "शायद ये सोचकर कि तू इसे इस्तेमाल करेगा," उन्होंने कहा। "पर सही वक़्त पर।"
मैंने छोटी चाबी वापस जेब में रखी।
और मैंने ताला देखा। मैंने छेद देखा। और मैंने सोचा — अगर किसी ने इसे अंदर से बंद किया है, तो वो अंदर से किया है। मतलब ताला खुला था जब वो चीज़ ठूँसी गई। मतलब उस वक़्त ताले की चाबी किसी के पास थी। मतलब उस वक़्त ये संदूक मेरे परदादा के कब्ज़े में नहीं था।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ उस्ताद।"
"तेरे नाना के घर वाले संदूक के बारे में तूने कहा था कि नाना कहते थे— इसे किसी ने अंदर से बंद किया है।"
"हाँ।"
"नाना ने कभी बताया, किसने?"
टिंकू ने सोचा। उसके चेहरे पर सोचने के निशान उभरे — माथे पर तीन लकीरें, आँखें ऊपर, होंठ दबे हुए।
"नाना ने यही कहा था," उसने धीरे से कहा। "कि जब वो छोटे थे, उनके घर एक आदमी आता था। हर महीने के आख़िर में। सफ़ेद कुर्ता, चमकते जूते। आता था, नाना के बाप से मिलता था, पीली शीट निकालता था, और अंगूठा लेता था। और एक बार नाना ने देखा कि उस आदमी के हाथ में एक छोटा डिब्बा था। उसमें क्या था?"
"क्या था?"
"नाना ने कहा — उसमें मोम था।" टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "गाढ़ा, पीला मोम। और वो आदमी उसे गरम करता था।"
कमरे में मेरी साँस रुक गई।
मैं घुटनों के बल संदूक के सामने बैठ गया। मेरे हाथ फ़र्श पर थे, मेरी आँखें ताले पर थीं, और मेरे अंदर एक आवाज़ थी जो कह रही थी — तूने इसे पहले देखा है। तूने इसे कहीं देखा है।
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