The Mysterious Bell – Chapter 921
"अंकुश," काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ में घबराहट थी। "तेरा चेहरा सफ़ेद है।"
"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा।
"तू ठीक नहीं है।"
"मैं ठीक हूँ।" मैंने अपना हाथ उठाया। "बस…"
और मैंने कहा, "बस ये सोच रहा हूँ कि अगर ताले में मोम डाला गया है, तो उसे पिघलाया भी जा सकता है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"हमें आग नहीं चाहिए," उन्होंने तुरंत कहा, जैसे मेरे मन की बात सुन ली हो। "अंकुश, इस कमरे में आग नहीं। यहाँ बरसों की धूल है, बरसों का तेल है, और ये दुकान लकड़ी की है—"
"माँ, मैं आग नहीं करूँगा।"
"तूने अभी कहा—"
"मैंने कहा, मोम पिघलाया जा सकता है।" मैं उठा। "पर पिघलाना सिर्फ़ आग से नहीं होता।"
टिंकू ने सिर झुकाया। "गरम पानी?"
"गरम पानी," मैंने कहा। "और सब्र।"
और मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, पर माँ के पास से गुज़रते वक़्त वो मेरा हाथ पकड़कर रुक गईं।
"सुन," उन्होंने धीरे कहा, सिर्फ़ मेरे लिए। "आज ग्यारह बजे दुकान सील की चेतावनी है। आज सुबह दवा लेनी है। और मैं तुझे एक बात बताना चाहती हूँ जो मैंने आज तक नहीं बताई।"
"क्या?"
"जब तेरे पापा ने ये चाबी तुझे दी थी, उस रात वो रोए थे।" उन्होंने मेरी हथेली दबाई। "और उन्होंने कहा था — अंकुश इसे खोलेगा। मैंने कहा, अगर ये किसी तरह के ताले की है तो हमें बताना चाहिए। उन्होंने कहा — नहीं, मैं इसे इसलिए नहीं दे रहा कि ये किसी ताले की है। मैं इसे इसलिए दे रहा हूँ कि जब ये खुलेगा, तो जो अंदर है वो अंकुश का कुछ होगा, रणवीर का नहीं।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"और तूने मुझे ये अब बताया?"
"क्योंकि अब तुझे इसकी ज़रूरत पड़ी।"
मैंने सिर हिलाया। और मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनका जवाब नहीं दिया जाता। उन्हें बस सिर हिलाकर रख लिया जाता है, और वो अंदर बैठ जाती हैं, और काम करती रहती हैं।
मैं बाहर निकला।
सुबह की धूप अब गली में पूरी आ चुकी थी। शबनम आपा की गुमटी पर कुल्हड़ रखे जा रहे थे, रज़िया आपा कपड़े सुखा रही थीं, उस्ताद की दुकान से मशीन की टिक-टिक आ रही थी — और वो आवाज़ आज मुझे सबसे पुरानी लगी, सबसे ज़िंदा, गली की सबसे ईमानदार आवाज़। जैसे मशीन कह रही हो — मैं अभी हूँ, मैं अभी सिल रही हूँ, तुम भी ज़िंदा हो।
टिंकू मेरे पीछे आया। "उस्ताद, गरम पानी लाता हूँ?"
"अभी नहीं," मैंने कहा। "पहले दवा।"
"और संदूक?"
"संदूक को आज हम नहीं खोलेंगे, वो हमें खोलेगा।"
टिंकू कुछ सोचता रहा। फिर उसने पूछा, "उस्ताद, मोम अंदर से कैसे आया? अगर ताले का छेद बाहर से इतना छोटा है?"
मैं रुका।
यही सवाल मेरे अंदर भी था और मैं उसे दबा रहा था। ताले का छेद बाहर से छोटा है। उसके अंदर कोई मोम डाले तो वो बह जाए, फैल जाए, बाहर निकल आए। पर ये मोम अंदर दबा हुआ है, सख़्त, बराबर बैठा हुआ। जैसे किसी ने सबसे पहले मोम डाला, और फिर उसके ऊपर चाबी डालकर घुमाया, जिससे वो फैलकर अंदर की दीवारों पर चिपक गया।
जानवर को नहीं। इंसान को।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। "किसी ने चाबी डालकर मोम अंदर फैला दिया," मैंने कहा। "और मोम सूख गया। अब कोई चाबी अंदर जाती है तो उसे जगह नहीं मिलती।"
टिंकू का मुँह खुला रह गया। "ये सोचना पड़ा उन्हें।"
"हाँ," मैंने कहा। "और जो आदमी ये सोच सकता है, वो आम आदमी नहीं है।"
"रखवाला," टिंकू ने कहा।
मैं ठिठका।
"क्या कहा?"
"रखवाला," टिंकू ने दोहराया। "जिसके बारे में आप बोल रहे थे। जो हमेशा कहता है कि मैं मालिक नहीं, रखवाला हूँ।"
और मुझे लगा कि मेरे सीने में कुछ ठंडा हुआ।
क्योंकि अगर कोई खुद को रखवाला कहता है, तो उसका काम है चीज़ों को उसी हाल में रखना जिस हाल में उसने उन्हें लिया। और अगर किसी ने संदूक को ताला लगाकर, मोम से बंद करके, दुकान के पीछे, धूल के नीचे, किसी के घर में रख दिया है — तो वो रखवाली नहीं है। वो कैद है। और कैद करने वाला कभी नहीं चाहता कि कैदी दिखे।
मैं दवा की खिड़की पर पहुँचा तो सुबह के सात बजकर पैंतालीस मिनट हो चुके थे। औरत पहले से कतार में थी। खिड़की अभी बंद थी।
मैंने कतार में खड़े होकर पीछे देखा। टिंकू वहीं पीछे खड़ा था, हथेली में छोटी सी शीशी लिए, और उसका चेहरा अब भी उतरा हुआ था।
"टिंकू," मैंने कहा।
उसने देखा।
"तेरा सवाल सही था," मैंने कहा। "जो आदमी मोम के बारे में सोच सकता है, वो सिर्फ़ काग़ज़ वाला नहीं होगा। वो कारीगर होगा। वो हाथ जानता होगा।"
टिंकू ने शीशी अपनी जेब में रखी। "उस्ताद, मेरे नाना भी हाथ के कारीगर थे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"नहीं," मैंने कहा।
"पर मैंने जो कहा—"
"तेरे नाना ने तेरे घर वाले संदूक को नहीं बंद किया," मैंने कहा। "किसी और ने बंद किया। और वही किसी ने मेरे वाला बंद किया।" मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "तेरे नाना ने तो तुझे बताया था — इससे अंदर से बंद किया गया है। यानी वो जानते थे। यानी उन्होंने देखा था। और शायद वो भी उसी तरह बंद थे।"
टिंकू ने कुछ नहीं कहा।
फिर उसने धीरे से कहा, "उस्ताद, अगर मोम जानवर नहीं, इंसान ने डाला, तो उसका कोई निशान होगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"निशान?"
"हाँ," उसने कहा। "जब मैं तेल लगा रहा था, ताले के पीछे, नीचे, कुछ खुरदुरा लगा था। मुझे लगा ज़ंग है। पर ज़ंग ऐसी नहीं होती। ज़ंग दानेदार होती है, वो लकीर जैसी थी।"
मेरे हाथ काँपे।
"कैसी लकीर?"
"दो लकीरें।"
मैं धीरे से बोला, "और बीच में?"
टिंकू ने देखा। "कैसे जानते हैं आप?"
मैंने दवा की खिड़की से आँखें नहीं हटाईं।
"क्योंकि वो निशान मैंने आज से पहले तीन जगह देखा है," मैंने कहा। "चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े की लकड़ी पर। उस्ताद की घंटी के छल्ले पर। और बिजलीघर के बक्से की भीतरी दीवार पर।"
खिड़की खुली।
किसी ने अंदर से आवाज़ दी, "सुशीला जी?"
और मैंने अपने आप को रोका, क्योंकि मेरा पूरा शरीर कह रहा था कि दवा छोड़कर दुकान की तरफ़ भागो, वो संदूक खोलो, वो निशान देखो। पर मैंने खिड़की की तरफ़ हाथ बढ़ाया और कहा, "जी, मैं आया हूँ।"
क्योंकि घंटी ने कहा था — आज तू एक ही चीज़ चुन सकता है।
और मैंने चुना था।
मैंने चुना था कि पहले माँ की दवा आएगी। और संदूक, अपने निशानों के साथ, अपने मोम के साथ, अपने पचास साल के धूल के साथ, मेरा इंतज़ार करेगा।
पर उसने इंतज़ार नहीं किया।
क्योंकि जब मैं दवा लेकर लौटा और दुकान के पीछे वाले कमरे में गया, तो मैंने देखा कि संदूक वहीं था, धूल वहीं थी, ताला वहीं था — पर उस ताले के छेद में, बाहर की तरफ़, एक चीज़ लगी हुई थी, जो अभी वहाँ नहीं थी।
काग़ज़ की एक छोटी पतली पट्टी।
मैंने उसे खींचा। धीरे से। सावधानी से। और उसे खोला।
उस पर एक ही लाइन थी, बहुत सफ़ाई से लिखी हुई, बिना नाम, बिना मोहर।
"ताले में मोम नहीं है। ताले में वही है जो तुझे अंदर जाने से रोक रहा है। और वो तेरे ही अंदर बैठा है।"
और मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों में पकड़ा, और मैंने घंटी की तरफ़ देखा।
घंटी चुप थी।
पर मुझे लगा कि उस छुपी आवाज़ में, जो आज सुबह से बोल नहीं रही थी, अब धीरे-धीरे कुछ काँप रहा है। जैसे वो कह रही हो — अब तू अकेला नहीं लड़ रहा, अंकुश। अब तेरे सामने ताले का छेद नहीं, अपना ही अंदर है।
और उससे बड़ा ताला आज तक किसी संदूक में नहीं दिखा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno