The Mysterious Bell – Chapter 918
"उस्ताद," उसने कहा, "आज शाम की क्लास का फ़ॉर्म लाना है। मास्टर इरफ़ान ने कहा था।"
"लाएँगे," मैंने कहा।
"और उस्ताद — वो संदूक जो अंदर कोने में है।"
मैं रुक गया।
"तू उसके बारे में कैसे जानता है?"
"मैंने देखा है," टिंकू ने कहा। "एक दिन मैंने आपकी दुकान के पीछे बोरी हटाई थी। उस पर पीतल की छोटी पट्टियाँ हैं, बहुत पुरानी। मुझे लगा हम उसे खोलें।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा — तेरह साल का लड़का, जिसके अब्बा का नाम आज मैंने रजिस्टर में देखा था, और जिसने कभी मुझसे नहीं कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "आज नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज हमारे पास और काम हैं," मैंने कहा। "आज माँ की दवा लानी है, बंसीलाल बाबा से सीढ़ी का हाल पूछना है, मास्टर इरफ़ान से फ़ॉर्म लेना है, और ग्यारह बजे से पहले दुकान के काग़ज़ सामने रखने हैं।"
"और कल?"
"कल," मैंने कहा, "कल हम संदूक खोलेंगे।"
टिंकू के चेहरे पर वो भाव आया जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब उन्हें लगता है कि उन्हें कोई बड़ा काम सौंपा गया है।
"मैं कल तक जीवित रहूँगा," उसने कहा।
"तू कल तक जीवित क्यों नहीं रहेगा?"
"क्योंकि मैं आज स्कूल जा रहा हूँ," उसने कहा।
वो मुड़ा और भाग गया।
और मैं उसके पीछे देखता रहा — दुबला, कमज़ोर, घुटने पर चोट, और कंधे पर बस्ता जो उसके शरीर से बड़ा था। और मुझे लगा कि घंटी ने आज सुबह कुछ नहीं कहा — न कोई चेतावनी, न कोई हिसाब — सिर्फ़ उसकी तरफ़ से एक बात कही थी, रात में, जो मैं अब ठीक से समझ रहा था।
“तेरे गले वाली की जोड़ी कहीं और है। और आज वो तेरी आँखों के सामने झूल रही थी।”
मैंने जेब से घंटी निकाली और उसे एक बार हल्का सा हिलाया।
टन।
आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।
"आज का काम है," मैंने कहा। "आज मैं हर चीज़ से पहले उस संदूक के पास जाऊँगा।"
"नहीं," घंटी ने कहा।
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि आज तेरे पास सिर्फ़ इतनी जगह है कि तू कुछ एक चुन सके।"
मैं चुप हो गया।
"और संदूक तेरे पास से भाग नहीं रहा है।" आवाज़ नरम हो गई। "पर माँ की दवा रोज़ भाग रही है।"
मैंने घंटी जेब में वापस डाली।
और मैं सीढ़ी की तरफ़ चला।
रास्ते में, आँगन के कोने में, मेरी नज़र एक चीज़ पर पड़ी — वो पुरानी लकड़ी का डंडा, जो गुड्डू और रफ़ीक़ को रात में दुकान के पीछे मिला था, जिसका इशारा लकड़ी के जूतों की तरफ़ था। वो अब भी वहीं रखा था, दीवार से टिका। मैंने उसे छुआ — लकड़ी चिकनी थी, बरसों पैरों की पकड़ से।
और मुझे लगा कि घंटी आज कुछ नहीं बोल रही, पर वो चुप भी नहीं है। वो बस मुझे इंतज़ार करा रही है। जैसे उसे पता हो कि जो आज होने वाला है, उसके लिए मुझे तैयार होना पड़ेगा — और तैयारी का पहला काम दवा है, दूसरा सीढ़ी है, तीसरा दुकान के काग़ज़ हैं, और संदूक — संदूक आख़िर में है।
माँ ने बाहर आकर मेरे हाथ में चाय का गिलास रख दिया।
"बता," उन्होंने कहा।
"छोटी चाबी संदूक की लगती है," मैंने कहा। "पर संदूक में लगती नहीं।"
माँ ने कोई प्रश्न नहीं पूछा।
यही माँ की सबसे बड़ी ख़ूबी है। वो उतनी ही देर पूछती हैं जितनी देर में जवाब आ जाए।
फिर उन्होंने कहा, "तेरे पापा की बात याद रखना — जो संदूक तुमने कभी नहीं खोला, उससे पहले उन्होंने जो एक बात कही थी, वो बेकार नहीं थी।"
"कौन सी?"
"कि जो खोलेगा, उसे पहले अपना कुछ खोना पड़ेगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "उन्होंने कभी अपना संदूक नहीं खोला। इसलिए नहीं कि उनके पास चाबी नहीं थी। इसलिए कि उन्हें लगता था कि अगर खोला, तो वो अपनी माँ खो देंगे।"
"उनकी माँ?"
"तेरे दादा की माँ," माँ ने कहा। "जो उन्होंने कभी नहीं खोई थी, पर सुनी हुई थी।" उन्होंने चाय का घूँट भरा। "और अब सुन — तू आज संदूक मत खोल। तू आज माँ की दवा ला, दुकान के काग़ज़ मिला, और उस सीढ़ी का हाल देख जिससे पूरी गली को रात में चढ़ना पड़ेगा। और पता है, अगर आज तू ये तीन काम कर ले, तो तेरे पास कल के लिए भी कुछ बचेगा।"
मैंने गिलास उनके हाथ में रख दिया।
"आज माँ का हिसाब जोड़ते हैं," मैंने कहा।
"अच्छा," माँ ने कहा, और मुड़कर अंदर चली गईं। "हाँ, और वो पुरानी कॉपी जो तूने गोविंद के नाम वाले पन्ने पर देखी थी — लो, मैंने उसका पन्ना अलग रख दिया है।"
वो रुकीं।
"क्योंकि अगर आज हमारी गली के बारे में कुछ साबित होगा," उन्होंने कहा, "तो वो उसी पन्ने से होगा – जिस पर मैंने खुद लिखा था कि मैं चुप रही।"
और वो अंदर चली गईं।
मैं आँगन में खड़ा रहा। सुबह की धूप छत पर चढ़ रही थी, और पीपल का पेड़ अपनी छाया समेट रहा था, जैसे आज गली को धूप में खड़ा होना पड़ेगा।
मैंने कमीज़ की जेब टटोली — छोटी चाबी वहाँ थी। और दूसरी जेब में, जिसे मैंने दिन में कभी नहीं छुआ, वो बड़ी काली चाबी टकरा रही थी।
और मुझे लगा कि जो संदूक कोने में बंद है, वो आज मेरे पास नहीं, रणवीर के पास ज़्यादा ज़िंदा है।
क्योंकि रणवीर के पास उसकी जोड़ी है।
और जिसके पास जोड़ी है, वो जानता है कि ताला कहाँ है।
॥
सुबह सात बजे मैं दुकान के पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा खोल रहा था, और मेरे हाथ काँप रहे थे।
वजह ये नहीं थी कि मैं संदूक से डरता था। वजह ये भी नहीं थी कि माँ ने कल रात कह दिया था कि आज संदूक मत खोल। वजह सीधी और साफ़ थी — दवा की खिड़की आठ बजे खुलती है। उससे पहले मुझे ये संदूक खोलना था, क्योंकि मेरे अंदर एक बात बैठ गई थी और वो बात जिद्दी थी। अगर इस संदूक के अंदर दादा का कोई काग़ज़ है, कोई ऐसी चीज़ है जो माँ की दवा से जुड़ी है, तो मुझे वो आज ही मिलनी है। आज ही। कल नहीं।
कमरे की हवा बाहर की हवा से अलग थी। बाहर सुबह की हवा में गर्मी की हल्की भाप थी, गुमटी से आती समोसे की महक थी, नाली के पास से आती ठंडक थी। और अंदर? अंदर बंद हवा थी। बरसों से बंद। जैसे किसी ने इस कमरे की साँस रोक दी हो और कह दिया हो, अब तुम यहीं रुको।
मैंने दरवाज़ा पूरा खोला। धूल का एक बादल बाहर निकला और सुबह की धूप में खड़ा हो गया, जैसे उसे भी बाहर निकलने का मौक़ा मिल गया हो।
कमरे में सब कुछ वैसा ही था जैसा मैंने छोड़ा था, और सब कुछ उससे भी पुराना। दीवार के साथ औज़ारों का ट्रंक, उस पर रखी रिंच और पेचकस की ढेर, कोने में ग्रीस की पुरानी डिब्बी जिसका ढक्कन बरसों से खुला था, छत से लटकता एक बल्ब जिसका तार किसी ने बीच से टेप से बाँध रखा था, और फ़र्श पर वो चिकनी काली परत जो सिर्फ़ तेल और धूल मिलकर बनाते हैं।
और उस सबके पीछे, दीवार से सटा, कोने में वो पड़ा था।
मोटा। लोहे का। काले पत्थर जैसा। ऊपर से देखो तो ज़ंग की पपड़ी जमी हुई, जैसे संदूक ने बरसों पहले एक मोटा कोट पहन लिया हो और फिर कभी उतारा न हो।
मैंने एक क़दम बढ़ाया और मुझे लगा कि कमरे की हवा थोड़ी और भारी हो गई।
"उस्ताद?"
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था। सुबह छह बजे से वो दुकान के बाहर बैठा था, बस्ता उसके पैरों के पास, घुटने पर पट्टी नई थी, और आँखों में वो तेज़ी थी जो हर सुबह उसके साथ आती है और शाम तक कहीं खो जाती है।
"तू इतनी सुबह?" मैंने कहा।
"आपने कहा था संदूक कल खुलेगा," उसने कहा। "आज कल है।"
मैं हँसा। "आज कल है, ये तूने कब सीखा?"
"मास्टर जी ने कहा था — जो कल कहकर सोता है, उसका कल कभी नहीं आता।"
"और तूने क्या कहा?"
"मैंने कहा, मेरे उस्ताद का कल सुबह सात बजे आता है।"
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