The Mysterious Bell – Chapter 917
"पापा जगे हैं," उन्होंने कहा। "छत पर बैठे हैं। जा, बात कर। वो रात भर करवट बदलते रहे।"
"तू कैसे जानती है?"
"क्योंकि मैं भी करवट बदलती रही।" उन्होंने कहा। "बाईस साल बाद पहली रात थी जब हम दोनों ने आराम से सोने की कोशिश की और नींद नहीं आई। पहले तो सो जाते थे, क्योंकि थक जाते थे। झूठ बोलकर आदमी थक जाता है।"
वो चली गईं, और मैं सीढ़ी से छत पर गया।
छत पर पापा बैठे थे। उनके सामने पुरानी ईंट रखी थी, जिस पर वो अक्सर बैठते हैं। पानी की टंकी उनके पीछे थी और उस पर ज़ंग के धब्बे थे। सुबह की हवा में गली नीली दिख रही थी — सब कुछ एक ही रंग में, जैसे किसी ने तस्वीर धो दी हो।
मैं उनके बगल में बैठ गया। कुछ देर कुछ नहीं बोला। पापा भी नहीं बोले। उनके हाथ में पुरानी रिंच थी और वो उसे बेवजह घुमा रहे थे, जैसे हाथ को काम चाहिए।
फिर मैंने जेब से छोटी चाबी निकाली और उनके हाथ पर रख दी।
पापा की उँगली काँपने लगी।
मैंने देखा। साफ़ देखा। उन्होंने चाबी उठाई ही नहीं — उन्होंने उसे हथेली पर पड़ा रहने दिया, और उनकी उँगली उसके चारों ओर घूमती रही, जैसे आँख बंद करके कोई चीज़ पहचान रहे हों।
"ये तूने कहाँ से निकाली?" उन्होंने पूछा।
"ये मेरे गले में थी," मैंने कहा। "तूने दी थी। पंद्रह साल की उम्र में।"
"हाँ।" उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने दी थी।"
"पर तूने कभी नहीं बताया कि ये किस चीज़ की है।"
पापा चुप रहे।
"पापा।"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा।
मैंने एक पल सोचा कि वो टाल रहे हैं। पर उनका चेहरा देखकर पता चला कि वो सच बोल रहे हैं — और यह सच बोलना उनके लिए किसी झूठ से भी ज़्यादा मुश्किल था।
"मेरे पास ये चाबी तेरे दादा ने रखी थी," उन्होंने कहा। "जब वो बीमार पड़े, तो उन्होंने मुझे बुलाया और कहा — ये रख, पर किसी ताले में मत लगाना। मैंने पूछा कि क्यों, तो वो बोले — क्योंकि ये अभी खुलने के लिए नहीं आई है। और फिर वो कभी नहीं बोले।"
"और तूने कभी नहीं लगाई?"
"कभी नहीं।"
मैंने उनके हाथ में पड़ी चाबी देखी।
"पर तूने मुझे क्यों दी?"
पापा ने रिंच ज़मीन पर रख दी।
"क्योंकि उस रात मुझे लगा कि मैं तुझे कुछ ऐसा दे रहा हूँ जो मेरे पास रहने से तेरे पास ज़्यादा सुरक्षित रहेगा," उन्होंने कहा। और फिर धीरे से जोड़ा, "और क्योंकि मैं डर गया था।"
"किससे?"
"पता नहीं।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "बाईस साल से मुझे यह डर रहता आया है कि कहीं मुझे कोई पूछ न ले कि ये क्या है। और मैं उस वक़्त बता नहीं पाऊँगा। तू बच्चा था। तुझसे कोई पूछता नहीं।"
मेरा गला भर आया, पर मैंने आवाज़ नहीं बदली।
"अब पूछ रहा हूँ," मैंने कहा। "तू अब बता।"
पापा ने चाबी उठाई, आँख के पास ले गए, और उसे रोशनी में देखा। फिर उसे पलटा। फिर उसे नाखून से खुरचा।
"मेरे पुरखों के एक लोहे के संदूक की चाबी लगती है," उन्होंने कहा।
"कौन सा संदूक?"
"वो जो दुकान के पीछे वाले कमरे के कोने में पड़ा है," उन्होंने कहा। "तूने कभी ध्यान नहीं दिया। वहाँ औज़ारों के ट्रंक के पीछे, आधी दीवार की तरफ़, एक पुराना संदूक है। बरसों से बंद। ऊपर बोरी पड़ी है, उस पर धूल। मैंने उसे कभी खोला नहीं।"
मैं सीधा हो गया।
"मैंने उस संदूक को देखा है," मैंने कहा। "मुझे लगा बक्सा है।"
"वही है।" पापा ने कहा। "और उस पर पीतल की पट्टियाँ हैं। मेरे पुरखों का हिसाब उसमें रहता था — यही सुना था। मगर जबसे मुझे होश आया, वो हमेशा बंद रहा।"
"तूने कभी खोलने की कोशिश नहीं की?"
"एक बार की।" पापा ने अपना चश्मा उतारा और टेप वाली जगह को सहलाया, जो अब काली पड़ चुकी थी। "तेरे दादा के रहते। मैं चाबी लेकर गया, ताले में लगाई, तो ताला हिला भी नहीं। मैंने तेरे दादा से कहा तो वो हँसे और बोले — वो चाबी नहीं है। मैंने कहा कि फिर क्या है? तो वो चुप हो गए। तेरे दादा चुप होने में उस्ताद थे।"
मैं हँस नहीं पाया।
"तो ये चाबी किस चीज़ की है?" मैंने पूछा।
पापा ने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
और जब मैंने लेने के लिए हाथ बढ़ाया, तो उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली — हल्के से, पर पकड़ ऐसी थी जैसे वो कुछ रोक रहे हों।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये चाबी उस संदूक में नहीं लगती।"
"फिर?"
"मुझे याद है सब कुछ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी। "बाईस साल की हर बात याद है — रसीदें, तारीख़ें, किस दिन कौन आया, किस दिन मैंने कहाँ अंगूठा लगाया, किस दिन मैंने किससे नज़र नहीं मिलाई। सब याद है।" वो रुके। "पर मुझे याद नहीं है कि मैंने ये चाबी कभी किसी ताले में लगाई हो।"
छत पर सुबह की हवा चल रही थी, और पानी की टंकी के पीछे कबूतर फड़फड़ाए।
"मतलब?" मैंने पूछा।
"मतलब ये है कि जब मैंने तुझे ये दी थी, तो मुझे पता था कि किसकी है। और उस वक़्त मेरे दिमाग़ में कोई ताला था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "डर आदमी का दिमाग़ ऐसे बंद कर देता है कि बाद में याद ही नहीं आता कि दरवाज़ा कब बंद हुआ।"
मैंने चाबी अपनी हथेली पर रखी।
और फिर पापा ने वो बात कही, जिसने मेरे अंदर कुछ ऐसा हिलाया जो बरसों से सो रहा था।
"एक बात याद आ रही है," उन्होंने कहा। "जब मैं छोटा था, तो तेरे परदादा शिवनारायण के बारे में लोग बातें करते थे। मैंने एक बार तेरे दादा को सुना था, जब वो मेरे पीछे खड़े थे और सोचा था कि मैं सो गया हूँ।"
"क्या कहा था?"
पापा ने रिंच उठाई और उसे अपनी हथेली पर सीधा रखा।
"उन्होंने कहा था — जो उस संदूक को खोलेगा, उसे पहले अपना कुछ खोना पड़ेगा।"
कुछ देर कमरे में सन्नाटा रहा।
"और," पापा ने कहा, "उसके बाद तेरे परदादा ने बूढ़े शांत रहने की शपथ खाई थी। बोले थे कि अगर उस संदूक की बात फिर किसी ने बोली, तो वही संदूक उसके हिस्से की आख़िरी चीज़ माँगेगा।"
फिर हम दोनों चुप बैठे रहे।
नीचे माँ की आवाज़ आई — "चाय ठंडी हो रही है।" और फिर चूड़ियों की आवाज़, और फिर काजल की तेज़ पर ढीली आवाज़, जो कह रही थी कि टिंकू दरवाज़े पर खड़ा है और उसके मुँह पर मुद्रा है, क्योंकि उसे आज स्कूल जाना है और वो नहीं बता रहा कि वो जाएगा या नहीं।
मैं उठा। चाबी जेब में रखी — छोटी चाबी। और दूसरी जेब में बड़ी काली चाबी थी, जिससे मुझे अभी कुछ नहीं करना था।
"पापा," मैंने सीढ़ी से पहले कहा, "वो संदूक मैं आज देखूँगा।"
पापा ने रिंच जेब में डाली और सिर हिलाया।
"देखिए," उन्होंने कहा, "देखिए बस देखिए। खोलिए मत।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज हमारे पास जो है वो बहुत कम है," उन्होंने कहा। "और जिस चीज़ को मैंने बाईस साल में कभी नहीं खोला, उसको खोलने के लिए मुझे अपने बेटे से माफ़ी माँगनी पड़ सकती है — इस डर से नहीं, इस हिसाब से कि उसके अंदर क्या है।"
मैं सीढ़ी से उतरने लगा।
"पापा," मैंने रुककर कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तुम्हें क्या लगता है कि संदूक में क्या है?"
पापा ने वो चश्मा पहना, जिसका टेप कान पर बँधा था और जो हर बार फिसलता था।
"मुझे लगता है," उन्होंने कहा, "कि उसमें वो चीज़ है जो तेरे परदादा ने कभी बेची नहीं। और जिसे बेचे बिना वो मर गए।"
नीचे गली में, इस समय, टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था — स्कूल का बस्ता इस बार लटक रहा था कंधे पर, और मुँह पर वो मुद्रा थी जो बच्चे तब बनाते हैं जब उन्हें पता न हो कि किससे क्या पूछें। मैं नीचे उतरा और उसके बाल बिगाड़ दिए।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno