The Mysterious Bell – Chapter 916
यह सोचकर मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने उठकर खिड़की खोली। बाहर गली सो रही थी। पीपल का पेड़ अंधेरे में इतना बड़ा लग रहा था कि उसकी छाया गली की आधी चौड़ाई नाप रही थी। कहीं दूर किसी के घर से रेडियो की आवाज़ आ रही थी — कोई पुराना गीत, जो शब्द समझ नहीं आ रहे थे, पर धुन ऐसी थी जैसे कोई बैठकर अपने ही घर की बात गा रहा हो।
और ठीक तब, बारह बजे के करीब, दरवाज़े पर दस्तक हुई।
नहीं, दस्तक नहीं थी। दौड़ थी।
दरवाज़ा खुला कि काजल अंदर गिरी। उसकी साँस फूली हुई थी, पैरों में चप्पल भी ठीक से नहीं थी — एक पैर में थी, दूसरी हाथ में। और उसके हाथ में नर्सिंग की किताब दबी थी, जिसे वो भूल गई थी कि पकड़े हुए है या नहीं।
"भैया," उसने कहा, और आवाज़ ऐसी निकली जैसे गला सूखा हुआ हो। "सीढ़ी।"
"क्या सीढ़ी?"
"अस्पताल की सीढ़ी।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। "बंद हो गई।"
मैं एक पल के लिए चुप रहा।
"बारह बजे की बात थी," मैंने कहा। "आज रात बारह बजे।"
"लग गई। ठीक बारह बजे।" वो हाँफ रही थी। "नया ताला। और उसके ऊपर सरकारी मुहर — लाल मोहर, काग़ज़, सब। डॉक्टर इसरानी साहब वहीं खड़े थे और उनके हाथ में लालटेन थी। बंसीलाल बाबा रो रहे थे। भैया, अब मरीज़ ऊपर कैसे जाएँगे? पहली मंज़िल पर जो बूढ़ी माँ हैं, उनका ऑक्सीजन…"
"रुक," मैंने कहा। "पहले पानी पी।"
"मुझे पानी नहीं चाहिए।"
"तो मैं पी लूँगा," मैंने कहा, और उसे गिलास थमा दिया।
वो एक पल मुझे घूरती रही, फिर हारकर पी गई। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"अब धीरे बता।"
"डॉक्टर इसरानी साहब ने कहा कि ये काग़ज़ साफ़ नहीं है, पर ताला सरकारी है। और जो सरकारी ताला है, उसे तोड़ने पर सीधा मुकदमा बनेगा। उन्होंने कहा कि आज रात सिर्फ़ पिछली सीढ़ी से काम चलाओगे, और वो सीढ़ी भी पीछे के फाटक से जाती है, जो रात में बंद रहता है।"
"तो अंदर कौन फँसा है?"
"कोई नहीं फँसा," उसने कहा। "पर अगर किसी को रात में तकलीफ़ हुई, तो हम उसे ऊपर नहीं ले जा सकते। भैया, वो सीढ़ी पिछले तीस साल से खुली थी।"
और फिर वो थोड़ी देर चुप रही, और उसकी आँखें भर आईं।
"और भैया, वहाँ दीवार पर भी कुछ लिखा है।"
"क्या?"
"मैंने पढ़ा नहीं पूरा। डर लगा। किसी ने उस मुहर के नीचे भी कुछ चिपकाया है, छोटा सा काग़ज़। जाते वक़्त देखा, पर पढ़ने की हिम्मत नहीं हुई।"
मैंने मेज़ से बड़ी काली चाबी उठाई और जेब में डाली। फिर छोटी चाबी उठाई और गले में पहनने के बजाय मुट्ठी में पकड़ ली — क्योंकि उस वक़्त मुझे लगा कि अगर मैं उसे गले में डालूँगा, तो वो मेरी ही नहीं रहेगी।
"चल," मैंने कहा।
हम दौड़े।
गली में अंधेरा था, और पीपल के नीचे जलती तपेरी अब बुझ चुकी थी। हमारी चप्पलों की आवाज़ से एक कुत्ता जगा और हमारे साथ चलने लगा, फिर आधी गली बाद रुक गया। अस्पताल का गेट खुला था। भीतर लालटेन की पीली रोशनी थी और उस रोशनी में डॉक्टर इसरानी खड़े थे, अपनी उम्र से भी ज़्यादा झुके हुए।
"आ गए," उन्होंने कहा, मुझे देखकर।
मैंने सीढ़ी देखी।
उसकी पहली उड़ान के ऊपर नया ताला लगा था — चमकदार, मोटा, बिल्कुल नया। उसके ऊपर एक काग़ज़ चिपका था जिस पर लाल मुहर लगी थी, और उस काग़ज़ के कोने हवा में हिल रहे थे। नीचे, ताले के ठीक बगल में, एक और छोटा सफ़ेद काग़ज़ चिपका था, जिस पर किसी ने हाथ से कुछ लिखा था।
मैंने झुककर पढ़ा।
"जो सीढ़ी चढ़ेगा, वो नाम लेकर उतरेगा।"
मेरे पीछे काजल ने साँस खींची।
"किसने लिखा?" मैंने पूछा।
"कोई नहीं जानता," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "मैं यहाँ बारह बजे से पहले आया था। तब सीढ़ी खुली थी। ताला लगाने वाले दो आदमी आए, काग़ज़ दिखाया, मुहर लगाई, ताला लगाया, और चले गए। उन्होंने एक शब्द नहीं बोला।"
"और ये छोटा काग़ज़?"
"वो उनके जाने के बाद चिपका मिला।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, ये किसी सरकारी आदमी का काम नहीं है। सरकारी आदमी चुपचाप ताला लगाकर जाता है, दीवार पर धमकी नहीं लिखता।"
मैंने उस काग़ज़ को नाखून से उतारा और जेब में रखा। मेरे हाथ में छोटी चाबी थी और उस वक़्त मुझे कुछ अजीब सा लगा — जैसे यह चाबी इस ताले के लिए नहीं बनी, पर इस ताले के आगे लाई गई है। जैसे किसी ने मुझे यह दिखाने के लिए भेजा हो कि देख, तेरे घर के बाहर भी ताले लगने लगे हैं।
मैंने छोटी चाबी उस नए ताले में लगाने की कोशिश की।
हाथ काँपा।
और चाबी मेरी उँगलियों से छूटकर ज़मीन पर गिरी।
टन।
आवाज़ इतनी तेज़ थी कि डॉक्टर इसरानी ने लालटेन ऊपर उठा दी। काजल झुकी और चाबी उठाकर मेरी हथेली पर रख दी।
"भैया," उसने धीरे से कहा, "तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"
"ठंड है," मैंने कहा।
"झूठ मत बोलो।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं नर्स हूँ। काँपना मैं पहचानती हूँ।"
मैंने चाबी मुट्ठी में भींच ली।
"ये ताले की नहीं है," मैंने कहा। "मुझे लग रहा है ये किसी और ताले की है, और वो ताला मेरे ही घर में है।"
डॉक्टर इसरानी ने कुछ देर मुझे देखा, फिर धीरे से बोले, "अंकुश, मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ जो मैंने किसी को नहीं बताई। इस अस्पताल की हर सीढ़ी, हर दरवाज़ा, हर ताला मैंने अपने हाथ से देखा है। पर एक दरवाज़ा ऐसा है जिसका ताला मैंने आज तक नहीं खोला।"
"कौन सा?"
"वो नीचे वाला, डिस्पेंसरी के पीछे।" उन्होंने कहा। "मेरी बीवी कहती थी कि वहाँ पुराना सामान रखा है, कोई नहीं जाता। उसके जाने के बाद मैंने उसे कभी नहीं छुआ।" वो रुके। "आज तुम्हारी चाबी देखकर मुझे वो दरवाज़ा याद आ गया। पता नहीं क्यों।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। बूढ़े आदमी की आँखें लालटेन की रोशनी में चमक रही थीं, और मुझे पता नहीं था कि वो उम्र की वजह से था या कुछ और।
"कल देखेंगे," मैंने कहा।
"कल," उन्होंने धीरे से दोहराया, जैसे वो शब्द उन्हें भारी लग रहा हो।
हम लौट आए।
और सुबह पाँच बजे, जब गली में अब भी अंधेरा था और पक्षी बस जाग रहे थे, माँ का चूल्हा जल गया।
मैं उस आवाज़ से जगा — मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी रखने की आवाज़, फिर फूँक मारने की आवाज़, फिर पहली लौ की वो हल्की फड़फड़ाहट जो माँ के हाथ में हमेशा बने रहती है। मैं चारपाई से उठा, और मेरी पीठ ऐसी टूट रही थी जैसे मैंने रात भर साइकिल के पहिए ठोके हों।
माँ चूल्हे के सामने बैठी थीं। बैसाखी उनके बगल में दीवार से टिकी थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर कुछ नहीं कहा, बस आँख से इशारा किया कि बैठ जाओ।
मैं बैठ गया।
"दवा?" मैंने पूछा।
"कल खत्म हो गई," उन्होंने कहा। "आज की सुबह की भी नहीं है।"
"मैं अस्पताल जाऊँगा।"
"तू पहले ये बता," उन्होंने कहा, और चूल्हे की लौ पर रोटी रख दी, "कि रात भर जागकर क्या सुलझाया?"
"कुछ नहीं।"
"तो सुलझाने की ज़रूरत क्या है? जो सुलझता है, वो अपने आप सुलझ जाता है। जो नहीं सुलझता, उसे जागकर सुलझाने से सिर्फ़ आँखें लाल होती हैं।"
"माँ, तेरी दवा कल खत्म हो गई, दुकान आज ग्यारह बजे सील हो सकती है, अस्पताल की सीढ़ी पर रात में ताला लग गया, और मेरी चाबी का जोड़ा रणवीर की जेब में है। और तू मुझसे पूछ रही है कि सुलझाने की ज़रूरत क्या है?"
माँ ने रोटी पलटी।
"हाँ," उन्होंने कहा। "क्योंकि ये चारों बातें सुलझेंगी नहीं। ये चारों बातें लड़ी जाएँगी। और लड़ने वाले को नींद चाहिए।"
मैं कुछ नहीं बोला।
वो उठीं, बैसाखी पकड़ी, और मेरी तरफ़ आकर मेरे बालों में हाथ फेरा — वैसे ही जैसे मैं दस साल का होऊँ और स्कूल से मुँह लटकाकर आया होऊँ।
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