The Mysterious Bell – Chapter 915
वो चाबी झूलती रही, और मैं देखता रहा।
धागा पतला था, सफ़ेद नहीं, हल्का पीला पड़ा हुआ, जैसे बरसों किसी की उँगली पर बँधा रहा हो और धूप में उतर गया हो। और उस धागे से जो चाबी लटक रही थी, उसका रंग, उसका आकार, उसका झुकाव — सब कुछ वैसा ही था जैसा मेरे गले में।
रणवीर ने चाबी को हथेली में लिया, धागे को उँगली पर दो बार लपेटा, और मुस्कुराया।
"आज कोई काग़ज़ नहीं, अंकुश," उसने कहा। "आज बस इतना बता दिया कि तेरे घर का सबसे बंद दरवाज़ा किसके पास है।"
"तो खोल क्यों नहीं देते?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मैं रखवाला हूँ," उसने कहा। "मालिक नहीं।"
और वो मुड़ा और चला गया। उसके जूतों की धूल पीपल की जड़ पर रह गई, और गली कुछ देर तक ऐसे खड़ी रही जैसे किसी के जाने के बाद कमरे में हवा भी नहीं हिलती।
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा था। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत। पापा कुछ नहीं बोले। उन्होंने सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो पिछले बाईस साल से उनके चेहरे पर रहता आया था — बस आज पहली बार वो डर शर्म से नहीं, सवाल से भरा था।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची और बोला, "उस्ताद, वो चाबी हमारी क्यों है?"
"पता नहीं, टिंकू," मैंने कहा। "आज रात पता करेंगे।"
और सच यह है कि उस वक़्त मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था। मेरे हाथ में एक बड़ी काली चाबी थी, जो तीसरी मंज़िल की दीवार के पीछे पड़े सात अंगूठों वाले शर्तनामे की थी। और मेरे गले में एक छोटी चाबी थी, जो पंद्रह साल की उम्र से मेरे सीने पर ठंडी लगती आई थी। और मेरे सामने एक तीसरी चाबी झूल रही थी — मेरी ही जैसी — जो मेरे दुश्मन की उँगली पर बँधी थी।
तीन चाबियाँ।
और उनमें से एक भी मेरे किसी दरवाज़े में नहीं लग रही थी।
रात ग्यारह बजे मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठा था।
बल्ब अब भी गुनगुना रहा था, पर आज उसकी आवाज़ पहले से धीमी लग रही थी, जैसे वो भी थक गया हो। दीवार पर मेरी परछाईं बैठी थी, और उसके साथ एक और परछाईं — औज़ारों के ट्रंक की, जिसका ढक्कन मैंने आज नहीं खोला था। कोने में पानी की बाल्टी रखी थी, जिसमें छत की एक बूँद हर कुछ देर में गिरती थी और आवाज़ करती थी। उस आवाज़ ने आज पूरे दिन मेरा पीछा नहीं छोड़ा।
मैंने मेज़ साफ़ की। ग्रीस के डिब्बे को एक तरफ़ रखा, पंचर वाले टब से आने वाली बदबू को हवा में उड़ने दिया, और फिर दोनों चाबियाँ मेज़ पर रख दीं।
एक तरफ़ छोटी चाबी। दूसरी तरफ़ बड़ी काली चाबी।
दोनों के बीच मैंने एक बालिश्त की जगह छोड़ी, जैसे दो आदमियों को आमने-सामने बैठा दिया हो और कहा हो — अब बात करो।
मैंने पहले छोटी चाबी उठाई।
उसे हथेली पर रखकर मैंने देखा। यह चाबी मेरे पास इतने साल थी कि मैंने इसे कभी ध्यान से देखा ही नहीं था। अब देखा तो लगा कि यह चीज़ नहीं, एक आदमी की आदत है। इसके दाँते घिस गए थे — इतने घिसे कि पहचानना मुश्किल था कि मूल में यह कैसी थी। जहाँ उँगली पकड़ती है, वहाँ लोहा पॉलिश खा गया था, चिकना हो गया था, जैसे नदी में पड़ा पत्थर। किनारों पर हल्की हरी ज़ंग बैठी थी, और उस ज़ंग में एक जगह कुछ खुदा था — या खुदा हुआ था और अब मिट गया था। मैंने नाखून से खुरचा, तो सिर्फ़ एक सीधी लकीर बची।
छोटी चाबी।
इतनी हल्की कि अगर इंसान कान न लगाए तो उसके गिरने की आवाज़ भी न आए।
फिर मैंने बड़ी काली चाबी उठाई।
यह अलग जाति की चीज़ थी। भारी। मुट्ठी में आते ही हाथ झुक जाए। इसके दाँते मोटे थे, ऊँचे थे, और उनके बीच की दरारों में पुरानी ज़ंग बैठी थी — काली नहीं, गहरी भूरी, जैसे मिट्टी सूखकर लोहे पर चढ़ गई हो। इसके छल्ले में मोटी रस्सी बँधी थी, पीली पड़ चुकी, और उस रस्सी पर उँगली की पकड़ के निशान तक दिख रहे थे।
मैंने दोनों चाबियाँ उठाकर पास-पास रखीं, दाँते से दाँते मिलाए।
खट।
नहीं मिले।
मैंने पलटकर मिलाए। उलटा-सीधा। फिर मिलाए। फिर।
कुछ नहीं।
छोटी चाबी का दाँता पतला था, बड़ी वाली का मोटा। छोटी की लंबाई कम, बड़ी की ज़्यादा। छोटी का छल्ला गोल और पतला, बड़ी का छल्ला मोटा और चपटा। कोई मेल नहीं।
"अरे," मैंने खुद से कहा, "तुम दोनों की शादी तो नहीं करवा रहा मैं।"
फिर भी मैं मिलाता रहा। आदमी की आदत है। जब कुछ समझ न आए तो हाथ काम करता रहता है। मैंने दोनों को कान के पास ले जाकर हिलाया, पर आवाज़ नहीं आई। भूत नहीं थे ये। लोहा थे। ठंडा, चुप, बेज़ुबान।
और फिर, धीरे-धीरे, मुझे वो बात याद आई।
रणवीर की छोटी उँगली।
वो धागा।
वो चाबी।
मैंने आँखें बंद कीं और दिमाग़ में उस चाबी को फिर से देखा। वो धागे से झूल रही थी और हवा में हिल रही थी — और जब हिलती है तो चाबी एक पूरा चक्कर लेती है, और उस चक्कर में उसका असली आकार दिखता है। मुझे याद था कि उसका छल्ला पतला था — ठीक मेरी चाबी जैसा। उसका रंग गहरा था — ठीक मेरी चाबी जैसा। और उसके दाँते — उसके दाँते भी घिसे हुए थे, ऊँचे-मोटे नहीं।
मेरा पेट ठंडा हो गया।
बड़ी काली चाबी अलग बात है। वो किसी भारी ताले की है, किसी संदूक की, किसी दरवाज़े की। पर वो जो धागे पर झूल रही थी — वो घिसी हुई चीज़ थी। बरसों इस्तेमाल में रही चीज़।
और जो चीज़ बरसों इस्तेमाल में रहती है, उसका एक जोड़ा भी होता है। घर में ऐसा नहीं होता कि एक चाबी रोज़ घूमे और दूसरी कहीं पड़ी सोए।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
पीतल ठंडा था। मैंने उसे हथेली में रखा, दो पल गरम किया, और फिर हल्का सा हिलाया।
टन।
आवाज़ कमरे में फैली और बल्ब की गुनगुनाहट उसके नीचे दब गई।
"सुन," मैंने कहा। "ये बड़ी काली चाबी मेरे हाथ में है। रणवीर ने आज सबके सामने फेंकी थी। ये ठीक है, ये मुझे पता है। पर मैं तुझसे कुछ और पूछना चाहता हूँ।"
घंटी चुप रही।
"मेरे गले वाली चाबी," मैंने कहा। "वो किस ताले की है?"
एक पल।
दो पल।
और फिर आवाज़ आई — धीमी, पर साफ़, जैसे किसी ने मेरे कान के बहुत पास खड़े होकर कहा हो।
"तेरे गले वाली की जोड़ी कहीं और है।"
मेरी साँस रुक गई।
"कहाँ?" मैंने पूछा। "कहाँ है?"
"आज तेरी आँखों के सामने झूल रही थी।"
"तो वो रणवीर के पास थी," मैंने कहा। "वो मुझे क्यों दिखा रहा था? वो क्या चाहता है?"
इस बार घंटी ने जवाब नहीं दिया।
"अरे, बोल ना थोड़ा और।"
"अकेली चाबी ताले से नहीं बोलती।"
"मतलब?"
"जोड़ा चाहिए।"
मैंने घंटी को मेज़ पर रखा और उसी वक़्त मेरे मुँह से एक गाली निकलने को आई, पर मैंने रोक ली, क्योंकि माँ सुन लेतीं तो आज रात ही मेरा दूसरा जन्म हो जाता।
मैं कुर्सी पर पीछे टिका और छत की तरफ़ देखा। बल्ब के चारों ओर पतली काली परछाईं घूम रही थी, जैसे कोई चीज़ अंदर फँसी हो।
अब तक मुझे सिर्फ़ इतना पता था — बड़ी काली चाबी शर्तनामे की है, और वो मेरे हाथ में है। छोटी चाबी मेरे गले में है, और उसका ताला कहीं नहीं दिखता। और एक तीसरी चाबी — जो मेरी छोटी चाबी की जोड़ी है — रणवीर के पास है।
मतलब साफ़ था, और साफ़ बात हमेशा डरावनी होती है — जो ताला मेरी चाबी खोलती है, वो मेरे घर में है, और उसकी दूसरी चाबी मेरे दुश्मन के पास है।
मेरे घर में एक ऐसा ताला है जिसे मैं आज तक नहीं जानता, और रणवीर जानता है।
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