The Mysterious Bell – Chapter 891
कमरे में पंखा घूम रहा था। उसकी आवाज़ अचानक बहुत तेज़ लगने लगी।
"काटकर?" मैंने कहा।
"काटकर," गोविंद भाई ने कहा। "ब्लेड से। मैं उस वक़्त दरवाज़े के पास खड़ा था, हाथ में चाय का प्याला लिए। उन्होंने पन्ना काटा, मोड़ा, जेब में डाला, और फिर मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए और कहा — गोविंद जी, यह पुराना हिसाब था। पुराना हिसाब फाड़ देना चाहिए।"
"और आपने कुछ नहीं कहा?" दरोगा जी ने पूछा।
"मैंने कुछ नहीं कहा, साहब," गोविंद भाई ने कहा। "मैंने डर के मारे कुछ नहीं कहा। पर…"
वो रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखें फैल गईं, जैसे कोई चीज़ अब भी उनके अंदर बंद हो और बाहर आने को बेचैन हो।
"…पर उस दिन," उन्होंने कहा, "पन्ना काटते वक़्त ज़मीन पर काग़ज़ का एक टुकड़ा गिरा था। और मैंने उसे उठाकर झाड़ू के नीचे डाल दिया था।"
मैंने उनका हाथ पकड़े हुए ही पूछा, "क्यों?"
"क्योंकि उस टुकड़े पर नाम था," गोविंद भाई ने कहा। "और मैं जानता था कि उस नाम के बिना वो पूरा पन्ना किसी काम का नहीं। मैंने सोचा — किसी दिन, किसी दिन काम आएगा। बाईस साल में वो दिन नहीं आया। आज आया।"
"और वो पन्ना?" दरोगा जी ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार बेचैनी आई। "वो पन्ना कहाँ है?"
गोविंद भाई ने अपनी जेब की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"वो पन्ना," उन्होंने कहा, "अभी भी मेरे पास है।"
उनकी उँगलियाँ कमीज़ की जेब में गईं, और काँपते-काँपते बाहर आईं। उनके हाथ में एक मुड़ा हुआ पीला पन्ना था। बहुत पुराना। ऐसा पीला जैसे उस पर बरसों की धूप पड़ी हो। किनारे से एक जगह ज़रा-सा फटा हुआ, और बीच से ऐसा मुड़ा हुआ जैसे उसे बार-बार जेब में रखा गया हो।
"इस पर सिर्फ़ एक नाम है," गोविंद भाई ने कहा।
"किसका?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मुझे अपनी ही नहीं लगी। सूखी, पतली, जैसे किसी और का गला हो।
गोविंद भाई ने पन्ना खोला। उनके टूटे चश्मे के पीछे उनकी आँखें छोटी हो गईं। उन्होंने पन्ने पर देखा, और फिर उन्होंने वो नाम पढ़ा।
मैं उनके होंठ हिलते हुए देख रहा था। मैं उनकी आवाज़ सुन रहा था।
और वो नाम मेरे कान तक पहुँचा।
और उसी वक़्त मेरे हाथ से घंटी छूट गई।
वो मेरी जेब में थी। मेरी उँगलियाँ उसे दबाए हुए थीं। पर जैसे ही वो नाम मेरे कान में पड़ा, मेरी उँगलियाँ अपने आप खुल गईं, जैसे किसी ने उन्हें अंदर से खोल दिया हो।
घंटी जेब से निकली, मेरे घुटने से टकराई, और फिर फ़र्श पर गिरी।
और उसके गिरने की आवाज़ ने उस नाम को ढँक दिया। धड़ाम। फिर खड़खड़ाती हुई वो मेज़ के पैर तक लुढ़क गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैं ज़मीन पर बैठा रह गया। घुटनों के बल। हाथ हवा में, खाली। और मेरे कान में वो नाम बज रहा था, बार-बार, जैसे किसी ने घंटी की जगह मेरे अंदर एक और घंटी बजा दी हो।
माँ ने कुछ कहा, पर मुझे समझ नहीं आया क्या कहा।
पापा की कुर्सी की टाँग फ़र्श पर सरसराई। वो उठकर खड़े हो गए थे। उनका चश्मा अब भी तिरछा था और उन्होंने उसे ठीक नहीं किया।
दरोगा जी ने कलम मेज़ पर रखी और उसकी आवाज़ सख़्त हो गई।
"गोविंद जी, आपने जो नाम पढ़ा, वो मैंने सुना है। और मैं आपको साफ़ बता दूँ, यह नाम अब रजिस्टर में लिखा जाएगा। आप चाहें या न चाहें।"
गोविंद भाई ने सिर हिलाया। उनकी आँखों से आँसू गिर रहे थे और वो गिरते ही सफ़ेद कुर्ते पर गोल निशान बना रहे थे।
"मैं जानता हूँ, साहब," उन्होंने कहा। "मैं बाईस साल से यही सोचता रहा कि यह नाम कभी नहीं बोलूँगा। पर आज जब आप रजिस्टर में मेरा नाम पढ़ रहे थे, तब मुझे लगा कि अगर मैं इस पन्ने को छिपाकर रखूँगा, तो यही पन्ना मुझे खा जाएगा। और मुझे आप लोगों से पहले ही नहीं…"
वो रुक गए। उन्होंने अपनी टूटी आँखों से मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश बेटा, उठो," उन्होंने कहा। "घंटी उठाओ। उसका फ़र्श पर पड़ा रहना अच्छा नहीं।"
मैं हिला नहीं।
दुबे अंकल ने छड़ी ज़मीन पर टिकाई और झुककर… नहीं, उनके झुकना मुश्किल था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"ले, बेटा," वो बोले। "उठा। ये घंटी सिर्फ़ आवाज़ नहीं करती। ये तेरे पास रहती है तो लगता है कि गली ज़िंदा है। और अगर ये फ़र्श पर पड़ी रही, तो मुझ जैसे बूढ़े को बुरा लगता है।"
मैंने अपने हाथ आगे बढ़ाए। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं, जैसे अभी-अभी मैंने कोई बहुत भारी चीज़ उठाई हो और रखी हो।
घंटी मेज़ के पैर के पास पड़ी थी। पीतल उस पर से उतरा हुआ, पर एक कोना ऐसा चमक रहा था जैसे उसी कोने ने रोशनी पकड़ ली हो।
मैंने उसे उठाया।
वो ठंडी थी। ठंडी नहीं—गुनगुनी। जैसे अभी-अभी किसी हाथ में रखी हो।
मैंने उसे हथेली पर रखा और मैंने देखा कि वो हिली नहीं।
न आवाज़। न झनझनाहट। न वो धीमी सी सरसराहट जो अब मुझे इस कमरे में सबसे ज़्यादा पहचानी लगती थी।
घंटी चुप थी।
पहली बार। पूरी तरह। जैसे उसने भी वो नाम सुन लिया हो और अब बोलना भूल गई हो।
"गोविंद चाचा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी, पर मैं रुका नहीं। "इस पन्ने पर… जो नाम है… वो अभी इस कमरे में है? या हम सब उसे जानते हैं?"
गोविंद भाई ने पापा की तरफ़ देखा। फिर माँ की तरफ़। फिर मेरी तरफ़।
और उन्होंने वो पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"तू खुद देख ले, बेटा," उन्होंने कहा। "मेरे मुँह से बार-बार नहीं निकलेगा। दो बार बोल चुका। तीसरी बार मुझसे नहीं बोला जाएगा।"
मैंने पन्ना लिया।
पीला काग़ज़। उस पर नीली स्याही, जो अब काली पड़ गई थी। किनारे पर एक तारीख़। और बीच में, बड़े अक्षरों में, एक ही नाम।
मैंने उसे देखा।
और उस वक़्त मुझे लगा कि यह कमरा नहीं है जिसमें मैं बैठा हूँ। यह बरामदा है, यह थाना है, यह चाय की गुमटी है, यह पीपल की चबूतरी है — और सब एक-एक करके गिर रहे हैं, जैसे किसी पुराने मकान में एक ईंट हटा दी गई हो और उसके पीछे का पूरा बोझ हिलने लगा हो।
दरोगा जी ने कहा, "अंकुश, क्या है उसमें? पढ़कर सुनाओ।"
मैंने मुँह खोला।
और मेरे मुँह से एक भी अक्षर नहीं निकला।
सिर्फ़ मेरी हथेली में पीतल की घंटी थी, जो चुप थी, और मेरे सामने मेरे पापा खड़े थे, और मेरी माँ के हाथ मेज़ पर जमे हुए थे, और गोविंद चाचा चुपचाप रो रहे थे, और दरवाज़े के बाहर धूप धीरे-धीरे कम हो रही थी, जैसे दिन भी यह सुनकर थक गया हो कि उस काग़ज़ पर किसका नाम लिखा है।
पर गोविंद चाचा ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत धीरे से, इतना धीरे से कि जैसे वो कब्र पर फूल रख रहे हों, उन्होंने वो नाम फिर बोला।
और अंकुश यादव — जो अब तक इस गली में हर टूटी चीज़ जोड़ने का दावा करता रहा था — अपने ही हाथ में पीतल की घंटी को ऐसे देखता रह गया जैसे वो अब उसकी हो ही न हो।
॥
पन्ना मेरे हाथ में था, और मैं उसे देख रहा था, पर मेरी आँखें उस पर टिक ही नहीं रही थीं।
सुशीला यादव।
दो शब्द। नीली स्याही जो अब काली पड़ चुकी थी, उतनी ही टेढ़ी जितनी कोई बुज़ुर्ग अपनी ज़ुबान से निकलती लकीर बनाता है। और उसके नीचे, बहुत छोटी सी एक लाइन।
यह ज़मीन नूर अस्पताल के नाम पर है।
मैंने दो बार पढ़ा। तीन बार। चार बार। पर हर बार वही नाम आया। वही नाम, जो मुझे सुबह चाय देता है, जो मेरी जेब में पैसे रखता है और कहता है, बाहर के पैसे गिनकर मत खा। वही नाम, जिसने मेरे लिए तेरह साल की उम्र से ज़िदगी के सारे हिसाब किए हैं और एक बार भी अपना हिसाब मेरे सामने नहीं खोला।
माँ।
मैंने पन्ना नीचे किया।
कमरे में कोई नहीं बोला।
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