The Mysterious Bell – Chapter 885
उस्ताद अली बक्श आगे आए। उनके हाथ में वो पुरानी लाल जिल्द वाली कॉपी थी जो कल पीपल पर खुली थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "अंकुश, तीसरी मंज़िल तक जाने का रास्ता आसान नहीं होगा। भवानी प्रसाद की शर्त है — उसके बेटे का नाम कहीं नहीं आना चाहिए।"
"मुझे पता है, उस्ताद।"
"तो?"
मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे हथेली पर रखा। वो अब ठंडी थी, पर उस पर उँगली का निशान बना रह गया था — धूल में जैसे कोई लकीर खींच दे।
"तो मैं उनसे यह कहूँगा," मैंने कहा, "कि मैं उनके बेटे का नाम नहीं लूँगा। पर उनका बेटा जो कर रहा है, वो भी ग़लत है। और जो आदमी अपने बेटे को इस डर से बचाने के लिए दूसरों के बेटों का घर गिरने देता है, वो अपने बेटे को बचा नहीं रहा — वो उसे इसी डर में बंद कर रहा है।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो कल पीपल पर थी — शर्म। और उसके नीचे, हल्की-सी उम्मीद।
"अच्छा कहा," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रखना। तीसरी मंज़िल पर कोई चीज़ ऐसी रखी है जो बोलती है। और वो जो बोलती है, वो किसी काग़ज़ की आवाज़ नहीं है।"
मैंने पूछा, "उस्ताद, आपको कैसे पता?"
वो मुस्कुराए। पहली बार उस दिन।
"क्योंकि पचास साल पहले," उन्होंने कहा, "मैंने उसी कमरे में एक बात सुनी थी जो मैं आज तक खुद को नहीं बता पाया।"
वो चले गए।
उनके जाने के बाद भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी, पर लोग घर की तरफ़ नहीं गए। वो गुमटी की तरफ़ गए। शबनम आपा ने चूल्हा फिर जलाया, और मैंने देखा कि चूल्हे की पहली लौ पर उन्होंने एक कटोरी पानी रखा — जैसे किसी की आत्मा को।
माँ ने काजल से कहा, "दवा दे दे।"
काजल भागी। यह बहुत छोटी बात लगेगी, आपको। एक औरत कहती है, दवा दे दे। पर मेरे लिए यह वही था जो घंटी की सबसे बड़ी आवाज़ से बड़ा था। क्योंकि बाईस साल से माँ की ज़िंदगी एक शर्त पर टिकी थी — सच बोलो, तो मैं ज़िंदा रहूँगी। और आज सच बोला गया था। इसलिए अब दवा।
मैं गुमटी के बाहर बेंच पर बैठ गया। पापा अंदर बैठे थे, हाथ में चाय का गिलास, जिसे वो पी नहीं रहे थे, बस पकड़े हुए थे।
दुबे अंकल आए। वो बिना कुर्सी के आए — मैंने पहली बार देखा। उन्होंने मेरे पास बैठकर कहा, "अंकुश, अब एक बात मेरी सुन।"
"कहिए।"
"पच्चीस साल पहले जगदीश यादव मेरे पास आए थे। उस दिन भी धूप ऐसी ही थी। वो थाने के बाहर खड़े थे और अंदर नहीं आए। मैंने कहा, अंदर आइए। उन्होंने कहा, नहीं, मैं इस दरवाज़े के अंदर नहीं आऊँगा, क्योंकि मुझे डर है कि कहीं मैं शिकायत करने आया लगूँ, और मेरा सच शिकायत बनकर सिर्फ़ एक काग़ज़ में बंद हो जाए।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"फिर क्या हुआ?"
"फिर वो चले गए।" दुबे अंकल ने कहा। "और मेरी कॉपी में उनका नाम ही रह गया। बस एक लाइन। न आने की वजह नहीं लिखी, क्योंकि मुझे पता नहीं थी। अब पता है। आज सुबह पता चला।"
उन्होंने अपनी जेब से एक पीला लिफ़ाफ़ा निकाला। वही जिसकी बात सब कह रहे थे।
"यह कल खोलना था," उन्होंने कहा। "पर कल वाली सभा में देर हो गई। अब यह तुम रख लो। मत खोलना। जब सभी काग़ज़ खुलेंगे, तब सबके सामने खुलेगा।"
"इसमें क्या है, अंकल?"
"पता नहीं," उन्होंने कहा। "बस इतना पता है कि जगदीश यादव ने मुझे देते वक़्त कहा था — अगर मैं लौटकर न आऊँ, तो इसे मेरे बेटे को देना।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। वो हल्का था — इतना हल्का कि लगा अंदर कुछ नहीं है। पर मेरे हाथ में वो भारी था। जैसे पच्चीस साल की धूल उसमें भरी हो।
मैंने उसे अपनी कमीज़ की अंदरूनी जेब में, घंटी के ठीक ऊपर रखा।
और तभी मुझे लगा कि घंटी ने बहुत हल्का-सा कुछ कहा। मैंने कान लगाया।
"दो हाथ," उसने कहा। "एक काग़ज़ पकड़ेगा, एक ज़ुबान।"
मैंने आँखें बंद कीं और मन में कहा — ठीक है। आज मैं अकेला नहीं जाऊँगा। आज मेरे साथ पूरी गली है, और गली के साथ मेरा पापा है, और पापा के साथ वो बाईस साल जो अब काग़ज़ों में लिखा हुआ है।
सामने से टिंकू दौड़कर आया। उसके हाथ में कॉपी थी और आँखों में वो बेतरतीबी जो सिर्फ़ तेरह साल के लड़के की होती है।
"उस्ताद! मीरा दीदी ने कहा कि आज शाम तक रजिस्टर चाहिए। और सानिया ने कहा कि भारद्वाज भवन के गेट पर कोई दो आदमी दिन भर खड़े रहते हैं।"
"दो नहीं," मैंने कहा। "तीन। एक गेट पर, एक लिफ़्ट पर, और एक सीढ़ी पर।"
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि मैं वहाँ एक बार गया था," मैंने कहा, "और मैंने देखा था कि जिस दफ़्तर में सिर्फ़ काग़ज़ रखे हों, वहाँ तीन आदमी क्यों खड़े रहते हैं। उसका जवाब यही है कि वहाँ काग़ज़ से ज़्यादा कुछ है।"
टिंकू ने कुछ सोचा, फिर कॉपी में कुछ लिखा और सिर उठाकर बोला, "तो फिर हम सीढ़ी से जाएँगे नहीं।"
"हाँ।"
"तो कहाँ से?"
मैं मुस्कुराया। उस दिन पहली बार मेरी मुस्कान में हल्कापन था। "उसी जगह से जहाँ से काग़ज़ बाँटने वाला लड़का जाता है। छत के रास्ते।"
टिंकू की आँखें चमकीं, और वो फिर कॉपी में झुक गया। मैंने उसे देखा और सोचा — यह लड़का पिछले महीने तक स्कूल छोड़कर छिपता था। आज यह अपनी कॉपी में योजना लिख रहा है। दुनिया में अगर कुछ ठीक होता है, तो ऐसे होता है। किसी बड़े धमाके से नहीं। किसी छोटे लड़के की कॉपी में एक लाइन से।
मैं उठा। मेरी जेब में घंटी थी, घंटी के ऊपर पीला लिफ़ाफ़ा, और लिफ़ाफ़े के ऊपर वो काग़ज़ जिस पर लिखा था — अगली बार।
मैंने चलते-चलते पापा की तरफ़ देखा। वो गुमटी के अंदर बैठे थे, और शबनम आपा उनसे कुछ कह रही थीं। मुझे सुनाई नहीं दिया, पर मैंने होंठ पढ़े। शबनम आपा कह रही थीं — अब चाय पी लो, शंकर भाई। आज चीनी दो चम्मच डाली है।
पापा हँसे।
मैंने आज तक उन्हें इतना बड़ा हँसते नहीं देखा।
और मुझे लगा कि मेरे अंदर जो गुस्सा सुबह उठा था, वो खत्म नहीं हुआ — वो बस जगह बदल गया। वो थाने से निकलकर तीसरी मंज़िल की तरफ़ मुड़ गया।
भीड़ के बाहर, पीपल की छाया में कुछ खड़ा था। मैंने देखा तो वो एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी था — न पास आया, न बोला। बस मुझे देखा, और मुड़कर चला गया। उसके जूते गली की धूल में भी चमक रहे थे।
मैंने घंटी जेब में कसकर पकड़ी और धीरे से कहा, "देख लिया।"
घंटी ने कहा, "अभी नहीं। पहले तीसरी।"
मैंने सिर हिलाया। ठीक है। पहले तीसरी। पहले वो काग़ज़ जो सबको नाम देगा। पहले वो रजिस्टर जो बताएगा कि किसने किसका घर किस तारीख़ को बेचा था, और किसके अंगूठे के नीचे उसका नाम दब गया था।
पहले वो।
और उसके बाद — उसके बाद जो बचेगा, वो हम देख लेंगे।
क्योंकि अब मैं अकेला नहीं हूँ। और जिस दिन आदमी अकेला नहीं रहता, उस दिन उसके डर भी आधे रह जाते हैं।
सूरज सिर पर आ गया था। चौक में धूल उड़ रही थी। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर लौट गए थे, और उनकी नीली शर्ट हवा में हिल रही थी। थाने के अंदर सिपाही अब भी वही रजिस्टर लिख रहा था — मैंने खिड़की से देखा। उसकी कलम चल रही थी। और मुझे लगा, बाईस साल बाद आज पहली बार, इस शहर में कुछ ऐसा लिखा जा रहा है जो किसी के खिलाफ़ नहीं, किसी के लिए है।
मैंने पापा की तरफ़ आख़िरी बार देखा, फिर टिंकू का कंधा थपथपाया, और कहा, "चल, तीसरी मंज़िल का रास्ता देखने चलते हैं।"
टिंकू ने कॉपी बंद की और पीछे-पीछे चल दिया।
और पीछे, गुमटी के चूल्हे पर, चाय की केतली बज रही थी — जैसे पूरी गली ने आज पहली बार सुबह की चाय का स्वाद लिया हो।
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