The Mysterious Bell – Chapter 884
सिपाही ने पापा की तरफ़ देखा।
"शंकर जी," उसने कहा, "अंदर चलिए। बयान दर्ज होगा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा।
"मैं साथ चलता हूँ," मैंने कहा।
"गवाह बाहर रहते हैं, बेटा," दरोगा ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई सख्ती नहीं थी। थकान थी।
"मैं गवाह नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं बेटा हूँ।"
दरोगा ने मुझे देखा। फिर उसने सिपाही की तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
हम अंदर चले।
थाने के अंदर की हवा बाहर से अलग होती है। बाहर धूप और पीपल, अंदर काग़ज़ और सीलन। मेज़ पर रजिस्टर, पुराने मुकदमों के बंडल, एक टूटी कुर्सी, और दीवार पर लगा वो कैलेंडर जिसका आख़िरी पन्ना किसी ने पलटना भूल दिया था। मेरे पैरों के नीचे फ़र्श पर सफ़ेद चूना था जो पुराने ज़माने के थानों में डाला जाता है, शायद इसलिए कि कोई पैर का निशान न बचे।
पापा बैठे। सिपाही ने कलम उठाई।
"नाम?"
"शंकर यादव।"
"पिता का नाम?"
पापा रुके।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और मुझे लगा वो किसी ऐसी चीज़ का नाम लेंगे जो मैंने कभी नहीं सुना। और सचमुच उन्होंने वही नाम लिया, धीरे से, जैसे किसी पुराने औज़ार की धूल झाड़ रहे हों।
"जगदीश यादव।"
कलम रुकी। सिपाही ने ऊपर देखा।
"जगदीश यादव," उसने दोहराया, और कुछ लिखा।
मेरे हाथ में घंटी गरम हुई। ज़ोर से गरम। मैंने उसे जेब में कस लिया।
पापा बोलते रहे। धीरे-धीरे, वाक्य-वाक्य, जैसे रास्ता बनाते हुए। कि कैसे पहली बार एक आदमी उनकी दुकान पर आया और बोला कि दुकान का लाइसेंस रिन्यू कराना है, बस एक अंगूठा चाहिए। कि वो उस वक़्त अस्पताल से लौटे थे, माँ की जाँच की परची जेब में थी, और उनके हाथ में कलम पकड़ने की ताक़त नहीं थी। कि पहली बार अंगूठा लगाया तो सिर्फ़ एक काग़ज़ था। दूसरी बार तीन थे। तीसरी बार उन्हें पढ़ने की हिम्मत नहीं हुई। कि साल-दर-साल आदमी बदलता गया — कभी सफ़ेद कुर्ता, कभी मीठी ज़ुबान, कभी एक चुपचाप आदमी जो सिर्फ़ काग़ज़ खोलकर आगे बढ़ा देता था और बोलता कुछ नहीं था।
"वो चुपचाप आदमी," सिपाही ने कहा, "कौन था?"
"नाम नहीं पता," पापा ने कहा। "बस हाथ याद है। बहुत काँपता था। मेरे से भी ज़्यादा।"
और मेरे अंदर एक तस्वीर बनी। एक आदमी अस्पताल के बाहर नींबू-मिर्ची का हार लेकर खड़ा है, घंटों खड़ा रहता है, और जब मैं निकलता हूँ तो अपनी जेब से एक काग़ज़ निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाता है जिस पर लिखा होता है — यादव का अंगूठा।
गोविंद भाई।
मैंने मुँह खोला। पापा ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत हल्का सिर हिलाया — रुको।
मैं रुक गया। पर मेरे अंदर कुछ बोल रहा था।
सिपाही लिखता रहा। उसकी कलम की आवाज़ कमरे में लगातार चल रही थी, जैसे कोई दीवार पर लकीर खींच रहा हो। मैंने बाहर झाँककर देखा — खिड़की से भीड़ दिख रही थी। माँ बैसाखी पर टिकी थीं, काजल उनके कंधे पर हाथ रखे थी, और माँ के होंठ हिल रहे थे। मैंने बहुत ध्यान से देखा तो समझ आया — वो कुछ गिन रही थीं। अपने होंठों से, चुपचाप। जैसे बाईस साल की साँसें गिन रही हों।
डॉक्टर इसरानी भी आ गए थे। सफ़ेद कोट नहीं पहना था, साधारण कमीज़ में थे, हाथ में वो पुराना टेप लिपटा स्टेथोस्कोप। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा और बिना कुछ कहे उनके हाथ पर उँगली रख दी — नाड़ी देखने के लिए नहीं, बस यह बताने के लिए कि मैं यहाँ हूँ।
आधे घंटे बाद सिपाही ने कलम रख दी।
"इतना लिख लिया है," उसने कहा। "बाकी काग़ज़ जो आप बाद में लाएँ, वो अलग से लगेगा।"
पापा उठे। उनकी कमर झुकी थी — उम्र से ज़्यादा बोझ से। और तभी, जब वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े, दरोगा ने कहा, "शंकर जी, एक बात।"
पापा रुके।
"आपके बेटे की दुकान पर कल ताला लगने वाला था। मैंने रोक दिया है, पर हमेशा के लिए नहीं। काग़ज़ पूरा हो, गवाही पक्की हो, तब बात करेंगे। समझे?"
पापा ने सिर हिलाया।
"समझा।"
"और यह अंगूठे वाले काग़ज़ जो आपने सील किए थे — वो कहाँ हैं?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मेरे बेटे के पास," उन्होंने कहा। "और उससे पहले जो काग़ज़ मैंने कभी नहीं पढ़े, वो उस आदमी के पास हैं जिसने मुझसे अंगूठा लिया।"
दरोगा ने कुछ सोचा। फिर बोला, "नाम?"
पापा ने कहा, "गोविंद।"
दरोगा की कलम रुकी। उसने सिपाही की तरफ़ देखा। सिपाही ने धीरे से कहा, "दरोगा जी, गोविंद… वो जो भारद्वाज भवन में मुनीम का काम करता है?"
दरोगा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी मेज़ का दराज़ खोला और बंद कर दिया, जैसे किसी चीज़ को अंदर धकेल रहा हो।
मैंने पापा का हाथ पकड़ा और उन्हें बाहर लाया।
दरवाज़े पर खड़े होकर मैंने एक बार पीछे देखा। सिपाही अपने रजिस्टर पर झुका था और उसकी उँगली उस लाइन पर थी जहाँ पापा का नाम लिखा था। उसकी उँगली हल्की काँप रही थी — ठीक वैसे ही जैसे पापा की उँगली काँपती थी। मुझे लगा, इस शहर में कितने हाथ हैं जो काग़ज़ पर निशान लगाते वक़्त काँपते हैं। और कितने लोग उन काँपते हाथों का फ़ायदा उठाते हैं।
बाहर निकले तो धूप आँखों में लगी। भीड़ वैसी ही खड़ी थी, जैसे हम गए ही न हों।
पापा सीढ़ी के आख़िरी पत्थर पर रुके।
और फिर उन्होंने वो किया जो मैंने उनसे उम्मीद नहीं किया था — वो मुड़े और सिपाही की तरफ़ देखा, जो अभी दरवाज़े पर आया था।
"बेटा," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी पर साफ़। "एक बात और लिख लो।"
सिपाही ने कलम उठाई।
"गोविंद भाई का नाम उस काग़ज़ पर नहीं है जो मैंने सील किया।"
भीड़ चुप हो गई।
"वो नाम उस रजिस्टर में लिखा है," पापा ने कहा, "जिसमें भारद्वाज भवन की हर मोहर का हिसाब है। और वो रजिस्टर — भारद्वाज भवन की तीसरी मंज़िल पर है।"
कुछ नहीं हुआ।
कोई हिला नहीं। कोई बोला नहीं।
पर मेरी जेब में घंटी इतनी गरम हो गई कि मुझे लगा कपड़ा जल जाएगा। मैंने हाथ जेब में डाला और उसे उँगलियों में लिया। वो ज़ोर से नहीं बजी। बस एक हल्की, दबी हुई आवाज़ आई — जैसे दूर किसी ताले में कोई चाबी घूमी हो।
और फिर उसने एक शब्द कहा। बस एक।
तीसरी।
मैंने सिर उठाया। पापा अब भी सीढ़ी पर खड़े थे, और उनकी शर्ट की आस्तीन में हवा भरी थी। माँ ने बैसाखी आगे बढ़ाई और अपना हाथ उनकी तरफ़ किया — और पापा ने, पहली बार, मुझे पता है पहली बार, उनका हाथ इतनी जल्दी पकड़ा जितनी जल्दी मैंने कभी किसी का नहीं पकड़ा।
मीरा मेरे पास आई। उसका कैमरा अब भी जल रहा था।
"तीसरी मंज़िल," उसने कहा, बहुत धीरे, सिर्फ़ मेरे लिए। "कल तुमने मुझे बताया था कि वहाँ भवानी प्रसाद का बेटा काग़ज़ बाँटता है।"
"हाँ।" मेरा गला सूख रहा था। "और वहाँ एक नीले कपड़े से ढका बक्सा भी है, जिसे कोई नहीं छूता। सनी ने बताया था।"
मीरा ने कैमरा बंद किया। पहली बार उसने अपनी मर्ज़ी से बंद किया।
"तो आज हमें दो चीज़ें चाहिए," उसने कहा। "एक, वो रजिस्टर। और दो, गोविंद भाई की ज़ुबान।"
"गोविंद भाई रोज़ सुबह अस्पताल के बाहर खड़े रहते हैं," मैंने कहा। "नींबू-मिर्ची का हार लेकर। जैसे खुद को सज़ा दे रहे हों।"
टिंकू ने कॉपी बंद की। उसकी आवाज़ छोटी थी पर साफ़।
"उस्ताद, उन्होंने पापा का अंगूठा लिया। वो भी डर के मारे।"
"पता है," मैंने कहा।
"तो फिर…"
"तो फिर हम उनसे लड़ेंगे नहीं," मैंने कहा। "हम उनसे सच माँगेंगे। लड़ाई में आदमी चुप होता है। माँगने में बोलता है।"
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