The Mysterious Bell – Chapter 881
“अंकुश भैया!”
वो दरवाज़े के फ्रेम में इस तरह झुका खड़ा था जैसे दौड़कर आया हो और अब साँस नहीं ले पा रहा हो। उसके माथे पर ग्रीस की काली लकीर थी — कहीं फिर गाड़ी की चेन में हाथ डाला होगा — और हाथ में एक नई कॉपी थी, भूरे काग़ज़ में लिपटी हुई, जिस पर उसने अपना नाम खुद लिखा था। वो कॉपी उसने मेरी तरफ़ ऐसे बढ़ाई जैसे कोई सनद लेकर आया हो।
“देखो,” उसने कहा। “ये रामलाल बाबा की दी हुई। मैंने पहला पन्ना खुद खोला। फिर नाम लिखा। दो बार लिखा, क्योंकि पहली बार हाथ काँप रहा था और नाम टेढ़ा लगा। फिर सोचा, टेढ़ा नाम भी नाम ही होता है न?”
“होता है,” मैंने कहा। “पर अभी तू बता, इतनी देर कहाँ था?”
वो गंभीर हो गया। उसकी आवाज़ उसकी उमर से बड़ी हो गई।
“मैंने मास्टर इरफ़ान से पूछा,” उसने कहा, “कि काग़ज़ पर सच लिखने से क्या होता है। तो मास्टर ने कहा — सच बोलने से काग़ज़ नहीं टूटता, डर टूटता है। और डर टूटने की आवाज़ किसी को सुनाई नहीं देती, पर उसके बाद आदमी के हाथ सीधे चलने लगते हैं।”
पापा ने पहली बार उस शाम किसी की तरफ़ पूरा देखा। उन्होंने टिंकू को देखा, फिर उसकी कॉपी को, फिर उन अक्षरों को जो एक तेरह साल के लड़के ने काँपते हाथ से लिखे थे।
माँ ने टिंकू की तरफ़ रोटी बढ़ाई। “खा ले बेटा।”
“खा लिया आंटी,” टिंकू ने कहा। “आज जल्दी खाया, क्योंकि आठ बजे पीपल पर उस्ताद का हिसाब खुलेगा। मैंने कहा है सबको — जो नाम सामने आएगा, मैं उसे अपनी कॉपी में लिखूँगा। सोचो, इतिहास बन रहा है और उसमें मेरा हाथ है।”
मैं हँसा। पर वो हँसी आधी ही निकली।
क्योंकि पापा उठ रहे थे।
उनके घुटनों से वो आवाज़ आई जो अब मुझे घर की हर आवाज़ से ज़्यादा पहचानी लगती है। वो दीवार पर टँगी कील तक गए, और उस पर से अपनी पुरानी नीली शर्ट उतारी — वही शर्ट जिसकी आस्तीन के किनारे घिस गए थे और जिसे वो महीनों से नहीं पहनी थी, क्योंकि वो कहते थे कि दुकान पर ज़्यादा धूल लगेगी। उन्होंने शर्ट पहनी, बटन लगाए — ऊपर का बटन भी, जो वो कभी नहीं लगाते — और उस टूटे दर्पण के सामने खड़े होकर अपना चेहरा देखा, जिसमें उनका चेहरा दो हिस्सों में दिखता था।
फिर उन्होंने कान पर टेप से बँधा चश्मा पहना। टेप का एक कोना फिर खुल रहा था और वो उसे दबाकर चिपका ही रहे थे।
“पापा,” काजल ने कहा। “इतनी रात कहाँ?”
माँ ने पानी का गिलास फिर बढ़ाया। इस बार पापा ने पूरा पी लिया। पूरा।
“आज मेरे हाथ नहीं काँप रहे,” पापा ने कहा। जैसे खुद को ही बता रहे हों।
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। और मैं — मैं बिना सोचे उनके सामने खड़ा हो गया। मेरा हाथ दरवाज़े के फ्रेम पर रखा था। मेरे पीछे माँ थीं, एक तरफ़ काजल, और दरवाज़े के बाहर चबूतरी पर टिंकू, जो अपनी कॉपी दोनों हाथों से पकड़े ऐसे खड़ा था जैसे कोई तमाशा शुरू होने वाला हो।
“कहाँ जा रहे हो?” मैंने पूछा।
पापा मेरे सामने रुके।
और उन्होंने पहली बार मेरी आँखों में सीधा देखा। सीधा। बिना उस झुकी हुई नज़र के, जो उनके चेहरे पर बाईस साल से रही थी। मुझे लगा कि मेरे भीतर कोई पुरानी दीवार हिल गई है।
“अंकुश,” उन्होंने कहा। “अब मैं चुप नहीं रहूँगा।”
मेरा हाथ फ्रेम से खिसक गया।
“मैं आज आठ बजे पीपल पर खुद बोलूँगा,” पापा ने कहा। “गली को मेरी बात सुननी होगी। पर उससे भी ज़रूरी एक काम है।”
उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा — जहाँ घंटी रखी थी — और मैंने महसूस किया कि घंटी एक बार ठंडी हो गई, जैसे किसी ने उसे छूकर कहा हो, सुन रही हूँ।
“सुबह पहले मुझे थाने ले चलो,” पापा ने कहा।
काजल की किताब उसके हाथ से फ़र्श पर गिर गई। माँ ने बैसाखी पर अपनी पकड़ कस ली। टिंकू ने कॉपी को सीने से लगा लिया।
मैंने कहा, “थाने क्यों, पापा?”
शंकर यादव ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो डर से नहीं, बल्कि उस चीज़ से आती है जो बहुत दिन दबी रहने के बाद अचानक रास्ता पा जाती है।
“क्योंकि जो काग़ज़ मैंने अंगूठा लगाकर सील किया था,” उन्होंने कहा, “वो अस्पताल की ज़मीन का था।”
मुझे लगा घर की छत नहीं, मेरे भीतर की छत गिरी है।
मैंने सुना — दूर कहीं पीपल की तरफ़ से किसी ने पत्थर पर पत्थर रखा हो, जैसी आवाज़। मैंने देखा — माँ की आँखों में पानी नहीं था, उसमें कुछ और था, जैसे बाईस साल बाद पहली बार साँस लेना। और मैंने अपनी जेब में घंटी को फिर गरम होते महसूस किया।
पापा ने दरवाज़े की चौखट पार की।
“चल,” माँ ने कहा। “जल्दी चलो। आठ बजे से पहले ये बात गली को पता होनी चाहिए।”
और मैं उनके पीछे चला, ये सोचते हुए कि आज तक मैंने जिन टूटी चीज़ों का हिसाब जोड़ा, उनमें सबसे बड़ी टूटी चीज़ मेरे ही घर के दरवाज़े के भीतर रखी थी — और उसे जोड़ने वाला आदमी मेरे सामने, नीली शर्ट पहने, चबूतरी की तरफ़ जा रहा था।
चबूतरी से गली के नुक्कड़ तक सिर्फ़ पचास कदम हैं। पर उस रात वो पचास कदम मुझे पचास साल लंबे लगे।
पापा आगे चल रहे थे। नीली शर्ट, कान पर टेप से बँधा चश्मा, और वो चाल जो मैंने कभी नहीं देखी थी — न घसीटती हुई, न झुकी हुई। सीधी। जैसे कोई आदमी बाईस साल बाद पहली बार अपने ही पैरों पर खड़ा हुआ हो।
माँ बैसाखी के सहारे पीछे थीं। काजल उनका हाथ पकड़े थी। और मैं सबसे पीछे, ये सोचते हुए कि आज रात मैंने जितनी बातें सुनीं, उनमें से एक भी मुझे समझ नहीं आई — सिर्फ़ ये पता था कि अब पीछे मुड़ना बाकी नहीं रहा।
नुक्कड़ पर चाय की दुकान थी। दुकान बंद थी, पर उसके बाहर रखी बेंच पर दो आदमी बैठे बीड़ी पी रहे थे।
एक ने पापा को देखा। दूसरे ने आँखें सिकोड़ीं।
"ये शंकर यादव हैं न?" पहले ने धीरे से कहा।
"अरे, ये तो महीनों से बाहर नहीं निकले।"
"और ये शर्ट…"
मैंने सुना। पापा ने भी सुना। पर वो रुके नहीं।
फिर पहला आदमी उठा। बीड़ी ज़मीन पर पटकी और पापा के सामने आ गया।
"शंकर भाई, सुनो।"
पापा रुके।
"अंदर की बात है," उसने कहा। "तुम्हारे बारे में गली में बहुत कुछ कहा जा रहा है। कहा जा रहा है कि तुम जो काग़ज़ों पर अंगूठा लगाते थे, वो सब ठीक नहीं था। डॉक्टर राठी के आदमी कल से कुछ लोगों को बुला रहे हैं। कह रहे हैं कि जो लिखा है, वो पढ़वा लो।"
मेरी साँस रुक गई।
पर पापा ने सिर्फ़ इतना कहा, "अच्छा किया। पढ़वा लें। सबको पढ़वा लेनी चाहिए।"
वो आदमी हक्का-बक्का रह गया। जैसे उसने सोचा था कि शंकर यादव डर जाएगा। जैसे पूरी गली ने सोचा था कि शंकर यादव डर जाएगा।
हम आगे बढ़ गए।
पीपल का पेड़ गली के आख़िर में है, उस जगह पर जहाँ से तीन गलियाँ मिलती हैं। रात आठ बजे वहाँ हमेशा भीड़ होती है — कोई शादी की बात करता है, कोई बिजली का मीटर पढ़ता है, और उस्ताद हिसाब खोलता है।
आज भीड़ दुगनी थी।
मैंने दूर से देखा — पेड़ के नीचे टिमटिमाती एक बत्ती, और उसके नीचे उस्ताद की मेज़। मेज़ पर वही लाल कपड़े में लिपटी उनकी डायरी। आज वो डायरी खुली थी, और उसके पन्ने पलटते हुए मुझे लगा कि किसी ने गली के सारे राज़ एक जगह बाँधकर रख दिए हैं।
भीड़ में से आवाज़ें आ रही थीं — "शंकर यादव आ रहे हैं", "देखो, नीली शर्ट…"
टिंकू मेरे बगल से फिसलकर आगे निकल गया। वो सीधा पेड़ के नीचे गया और अपनी कॉपी खोलकर खड़ा हो गया, जैसे कोई चौकीदार हो जिसे पता हो कि आज रात बहुत कुछ लिखा जाएगा।
उस्ताद ने अपना चश्मा सरका कर पापा को देखा।
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