The Mysterious Bell – Chapter 882
"शंकर," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में हैरानी थी, पर उससे ज़्यादा कुछ और — जैसे किसी पुराने हिसाब का पन्ना अचानक खुल गया हो। "तू आज बोलने आया है?"
पापा ने कहा, "हाँ उस्ताद। और मेरी बात पहले सुननी पड़ेगी। सबकी बात बाद में।"
भीड़ में सन्नाटा फैल गया। इतना गहरा कि पीपल के पत्तों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
तभी भीड़ में से एक आदमी आगे आया। सफ़ेद कुर्ता, मोटी मूँछें, और हाथ में एक फ़ाइल। मैंने उसे पहचाना — डॉक्टर राठी का मुंशी, जो अस्पताल के काग़ज़ात संभालता था।
"शंकर जी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो शहद में घोली ज़हर जैसी लगती है। "इस भीड़ में क्या बात करनी है? आप चलिए, थाने में चलकर बात करते हैं। वैसे भी आपके अंगूठे के निशान वाले कुछ काग़ज़ वो चाहते हैं।"
मुझे लगा पापा पीछे हटेंगे।
वो नहीं हटे।
"थाने मैं सुबह जाऊँगा," पापा ने कहा। "अभी पहले मेरी गली सुनेगी।"
मुंशी ने फ़ाइल खोली। "शंकर जी, अच्छा नहीं लगेगा। आप समझदार आदमी हैं। जो काग़ज़ आपने सील किया था, वो आपका अपना है। उसे खोलने का मतलब ये नहीं कि…"
"रुक जाओ," पापा ने कहा।
मुंशी रुक गया।
पापा ने भीड़ की तरफ़ देखा। माँ की तरफ़ देखा, जो बैसाखी पर खड़ी थीं और जिनका चेहरा उस बत्ती की रोशनी में किसी पुराने मंदिर की मूर्ति जैसा शांत था। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "तुझे पता है मैंने बाईस साल क्या किया?"
मेरा गला सूख गया। मैंने सिर हिलाया — नहीं।
"मैंने हर महीने डॉक्टर राठी की दुकान पर एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ भीड़ तक पहुँच रही थी, बिना बढ़ी हुई, बिना चीखी हुई। "पहले साल मुझे लगा कि ये दुकान का हिसाब है। फिर मैंने पढ़ना सीखा। फिर मुझे पता चला कि ज़मीन के काग़ज़ ऐसे सील होते हैं।"
भीड़ में कुछ लोगों ने एक साथ साँस ली।
"मैंने पूछा तो कहा गया कि ये सिर्फ़ शक्ल है, कुछ नहीं होता। और मैंने मान लिया। क्योंकि मैं डरता था। क्योंकि मेरे पास दुकान थी, बच्चे थे, और मैं सोचता था कि अगर मैं चुप रहूँगा तो सब ठीक चलता रहेगा।"
उनका हाथ काँपा — पर सिर्फ़ एक पल। फिर वो अपनी जेब में गया, और वहाँ से उन्होंने एक काग़ज़ निकाला। मुड़ा हुआ, पुराना, किनारों से फटा हुआ।
"ये उस काग़ज़ की कॉपी है," पापा ने कहा। "जो मैंने सील किया था, उसकी पहली कॉपी। मैंने इसे बाईस साल दुकान की एक लोहे की पेटी में छिपाकर रखा। हर रात डरता था कि कोई देख न ले। और आज सुबह मैंने इसे निकाला, क्योंकि मेरे बेटे ने एक पेड़ के नीचे खड़े होकर मुझसे पूछा था कि सच किसने दबाया।"
मेरी आँखों में पानी आ गया। मैंने पलक झपकी ताकि कोई देख न ले।
मुंशी ने आगे कदम बढ़ाया। "शंकर जी, ये सब…"
"उस्ताद," पापा ने कहा, मुंशी को अनसुना करके। "काग़ज़ पढ़िए। गली सुने।"
उस्ताद ने काग़ज़ लिया। उनके हाथ धीरे-धीरे खुले, जैसे कोई बहुत भारी चीज़ उठा रहे हों। उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया। फिर पढ़ा।
भीड़ इंतज़ार कर रही थी। मैंने देखा — टिंकू ने कॉपी खोली, और उसकी पेंसिल काँप रही थी। काजल ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया।
उस्ताद ने पढ़ना बंद किया। उन्होंने काग़ज़ मोड़ा। और फिर उन्होंने अपना सिर उठाया, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने उनमें कभी नहीं देखी थी — शर्म।
"ये ज़मीन अस्पताल के नाम पर है," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी थी। "पर नीचे की तीन लाइनें किसी और के नाम पर हैं। और इस पर अंगूठा शंकर का है।"
भीड़ में हलचल मच गई। किसी ने कहा, "कौन है वो?" किसी ने कहा, "पढ़ो पूरा।"
मुंशी ने अपनी फ़ाइल दबाकर पकड़ ली। उसका चेहरा पसीने से चमक रहा था। "ये सब झूठ है," उसने कहा। "शंकर यादव पर दबाव है, वो…"
"मुझ पर दबाव नहीं है," पापा ने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने घर के दरवाज़े पर सुनी थी। "दबाव तो बाईस साल मुझ पर था। अब हटा है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वही चीज़ थी जो घर में थी — पानी नहीं, कुछ और। जैसे बाईस साल बाद पहली बार साँस लेना।
उस्ताद ने भीड़ की तरफ़ देखा। "कल सुबह नौ बजे सब लोग यहीं आ जाएँ। जो काग़ज़ हैं, सब खुलेंगे।"
भीड़ बिखरने लगी — पर कोई भी दूर तक नहीं गया। सब पास-पास खड़े रहे, जैसे कोई अधूरा वाक्य सुन लिया हो और उसका आख़िरी शब्द बाकी हो।
मैंने पापा का हाथ थामा।
उनका हाथ ठंडा था। पर काँप नहीं रहा था।
"पापा," मैंने धीरे से कहा। "अब क्या?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उस टूटे दर्पण वाला चेहरा अब पूरा दिख रहा था — नीली शर्ट में, पीपल की छाया में, अपनी गली के सामने।
"अब?" पापा ने कहा। "अब सुबह पहले मुझे थाने ले चलो।"
मेरे हाथ से घंटी फिसलने को थी। मैंने उसे कसकर पकड़ा।
"क्योंकि जो काग़ज़ मैंने अंगूठा लगाकर सील किया था," शंकर यादव ने कहा, और उनकी आवाज़ पूरी गली ने सुनी, "वो अस्पताल की ज़मीन का था।"
पीपल के पत्ते एक साथ हिले, जैसे पूरी गली ने साँस ली हो।
॥
रात भर मैंने छत को देखा। ऊपर आसमान में बादल थे, नीचे गली में अंधेरा, और बीच में मैं — चारपाई पर लेटा, आँखें खुली, हाथ में घंटी। घंटी कभी गरम होती, कभी ठंडी। जैसे कोई बूढ़ा आदमी बुखार में करवट बदल रहा हो।
मैंने उससे कुछ पूछा नहीं। डर था कि कहीं वो कुछ ऐसा कह दे जो मैं सुनना नहीं चाहता।
सुबह चार बजे मुर्गे ने आवाज़ दी। पाँच बजे माँ के हाथ की कड़ाही की आवाज़ आई — चूल्हा जल गया था। मैं उठकर बैठा और सोचा, आज चूल्हा जलना नहीं चाहिए था। आज तो कुछ और जलना था।
काजल दरवाज़े पर खड़ी थी, हाथ में दवा का पत्ता।
"माँ, एक गोली। बस एक।"
माँ ने कड़ाही नहीं छोड़ी। "थाने से लौटकर।"
"माँ…"
"काजल, मैं बाईस साल से एक ही बात पर ज़िंदा हूँ — कि एक दिन सच बाहर आएगा। आज वो दिन है। उससे पहले मैं कोई चीज़ अपने अंदर नहीं डालूँगी।"
काजल की आँखें भर आईं। मैंने उसका कंधा थामा और धीरे से कहा, "रख दे फ्रिज पर। लौटकर देंगे।"
वो गई। माँ ने पीठ से कहा, "अंकुश, पापा को अकेला मत छोड़ना।"
"मैं कब छोड़ता हूँ, माँ?"
"आज मत छोड़ना।"
पापा बरामदे में खड़े थे। वही नीली शर्ट, वही टेप वाला चश्मा, हाथ में कोई औज़ार नहीं। यही सबसे अजीब था। पचपन साल के आदमी के हाथ में अगर औज़ार न हो तो लगता है वो नंगा खड़ा है।
"चलें?" मैंने कहा।
"चलें।"
हम निकले। गली में लोग पहले से खड़े थे। शबनम आपा ने गुमटी का चूल्हा बंद कर दिया था — मैंने आज तक उन्हें चूल्हा बंद करते नहीं देखा। उनके पीछे रज़िया खड़ी थी, टेप से बँधा सूटकेस पैरों के पास, मुँह पर वो सख्ती जो औरतें तभी ओढ़ती हैं जब अंदर कुछ काँप रहा हो।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान का ताला लगा रहे थे। हाथ रुका। उन्होंने ताला जेब में डाला और चल पड़े। पीछे-पीछे याकूब, लाठी की नोक से फ़र्श पर टक-टक करते हुए।
टिंकू दौड़कर आया, हाथ में रामलाल बाबा की दी हुई नई कॉपी। कवर पर उसका नाम — टिंकू कुमार। नीली स्याही, थोड़ा टेढ़ा।
"उस्ताद, मैं भी चलूँगा।"
"स्कूल?"
"आज स्कूल बाद में। पहले ये।"
मैं हँसा नहीं। हँसी आज जेब में ही रह गई। मैंने उसका सिर थपथपाया और कहा, "चल। पर एक बात — वहाँ मुँह बंद रखना। बोलना मेरा काम है।"
"और मेरा?"
"तेरा काम है सब कुछ याद रखना। जो-जो कहे, सब।"
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