The Mysterious Bell – Chapter 879
पर यही पल था जब टिंकू आगे आया।
वो सीधा सिपाही के सामने गया, अपनी नई कॉपी जो अभी सुबह रामलाल बाबा ने दी थी उसकी तरफ़ बढ़ाई।
“देखिए सर,” उसने कहा, आवाज़ बच्चों की नहीं — गली की थी। “ये मेरी नई कॉपी है। कल से मैं स्कूल जाऊँगा, रोज़। मैंने अपनी माँ को वादा किया है।”
सिपाही ने उसे देखा।
“पर सर,” टिंकू ने कहा, “मैं आज स्कूल नहीं जाऊँगा। क्योंकि आज मेरे उस्ताद की दुकान नहीं बंद होगी। और जब दुकान बंद नहीं होगी, तो कल मैं स्कूल जाऊँगा। अगर दुकान बंद हो गई — तो कल स्कूल भी बंद हो जाएगा।”
भीड़ में हँसी फूटी। कोई बोला “वाह टिंकू” तो कोई बोला “सही कहा”। पर उस हँसी में गुस्सा भी था — गुस्सा उस सफेद काग़ज़ पर, गुस्सा उस ताले पर, गुस्सा उस आदमी पर जिसने ये सब भेजा था। दोनों चीज़ें — हँसी और गुस्सा — एक ही हवा में फैल गईं।
सिपाही ने टिंकू को देखा। फिर भीड़ को। फिर मेरी तरफ़।
कुछ पल वो चुप रहा। उसका हाथ ताले पर था और मुझे लगा कि वो उसे पकड़कर वापस अपनी जेब में रख रहा है।
“फ़ोन करना पड़ेगा,” उसने कहा। आवाज़ पहले से धीमी थी।
“कर लो,” मैंने कहा। “पर एक बात याद रखना — जो फोन के उस पार है, वो इस गली में नहीं रहता। और जो इस गली में रहता है, उसका काग़ज़ तेरे सामने है।”
सिपाही ने एक लंबी साँस ली। उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला, थोड़ा दूर गया, और मुँह नीचा करके बात करने लगा।
हम सब इंतज़ार में रहे। पीपल के पत्ते सरसरा रहे थे। गुमटी पर चाय का चूल्हा बंद था। दूर कहीं स्कूल की घंटी बजी — छुट्टी की घंटी।
तीन मिनट बाद सिपाही लौटा। चेहरा पहले से ज़्यादा सख़्त था। पर आँखों में कुछ और था।
“मेरे उच्च अधिकारी से बात हुई,” उसने कहा। “उन्होंने कहा — रसीद की जाँच तक सील नहीं होगी।”
भीड़ में एक आवाज़ उठी। फिर दूसरी। फिर पूरी गली ने राहत की साँस ली। कोई ताली बजा रहा था, कोई हँस रहा था।
पर सिपाही ने हाथ उठाया और सब चुप हो गए।
“पर एक शर्त पर,” उसने कहा। “दुकान का लाइसेंस जाँच तक निलंबित रहेगा। दुकान खुलेगी, पर काम बंद रहेगा। काग़ज़ आपके हाथ में है — और जाँच के बाद ही दुकान फिर से पूरी तरह चालेगी।”
भीड़ में गुस्सा फैला — कोई कह रहा था “ये भी कोई राहत है?”, कोई कह रहा था “दुकान बंद तो रही”।
पर मैं चुप खड़ा था। मैं जानता था — आज का जीत छोटा जीत नहीं था। ताला नहीं लगा। बस इतना ही काफ़ी था।
“ठीक है,” मैंने कहा। “लाइसेंस जाँच तक निलंबित। काग़ज़ मेरे पास है। जाँच पूरी होगी — और तब हम सब देखेंगे।”
सिपाही ने गले में से ताला निकालकर हाथ में लिया, और फिर उसने रसीद की तरफ़ देखा।
“ये असली है?” उसने पूछा। आवाज़ में अब सिर्फ़ नौकरी नहीं थी — थोड़ी इंसानियत थी।
“जाँच करा लो,” मीरा ने कहा। “हमें खुशी होगी।”
सिपाही ने सिर हिलाकर अपनी जीप की तरफ़ जाने के लिए कदम बढ़ाया। भीड़ हट रही थी। लोग आपस में बातें कर रहे थे। शबनम आपा ने रज़िया के कंधे पर हाथ रखा था। टिंकू मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहा था।
पर मैंने जेब में घंटी को फिर हिलाया — और वो एक बार भी नहीं बजी। बस ठंडी थी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा।
“कुछ आने वाला है,” मैंने धीरे से कहा।
उसने सिर हिलाया। “मुझे भी लग रहा है।”
और तभी — गली के मुँह पर — एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी।
धूल उड़ी। भीड़ एक पल के लिए रुक गई। किसी ने कुछ नहीं कहा। सबने उस गाड़ी को देखा।
गाड़ी का शीशा नीचे हुआ। और उसमें से — एक चमकता सफ़ेद जूता बाहर आया। फिर धोती का पल्ला। फिर वो पूरा आदमी।
चंद्रेश सक्सेना।
सफ़ेद कुर्ता, छोटी मुस्कान, हाथ में सोने के रंग का किनारा वाली फ़ाइल, कलाई पर सफेद घड़ी, और बगल में — कुछ ऐसा जो देखते ही समझ आ गया — कि ये आदमी आज लड़ने नहीं, कुछ और करने आया है।
वो धीरे-धीरे चलकर आया। सिपाही जीप की तरफ़ जा रहा था — वो भी रुक गया। चंद्रेश ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। सिर्फ़ मेरी तरफ़ आया।
मैं सामने खड़ा था। मैंने घंटी को जेब में दबाया — और जैसे उसने इशारा किया हो — दबी रही। सब कुछ नहीं कहती, कभी-कभी।
चंद्रेश मेरे सामने दो कदम पहले रुका। उसने मुझे देखा — जैसे ऊपर से नीचे तक तौल रहा हो। फिर मुस्कुराया।
“अंकुश भाई,” उसने कहा। आवाज़ मीठी थी — इतनी मीठी कि कान में चुभने लगे। “मीरा जी से कहिए, कैमरा थोड़ा नीचा करें। हम तो कोई फ़िल्म नहीं बना रहे।”
“बना रहे हो,” मीरा ने कहा। “बस किरदार आप नहीं, हम हैं।”
चंद्रेश हँसा।
“तुम पत्रकार हो,” उसने कहा। “तुम्हारा काम तो है ही। पर अंकुश भाई — तुम तो साइकिल वाले हो। तुमने कब से काग़ज़ों में हाथ डालना शुरू किया?”
“जब काग़ज़ ने मेरी दुकान में हाथ डाला,” मैंने कहा। “तब से।”
वो मेरे पास और करीब आया — यहाँ तक कि भीड़ के पीछे वाले लोग भी उसकी आवाज़ सुन सकें।
“मैंने सिपाही से बात कर ली है,” उसने कहा। “तुमने आज जीत लिया।”
“अभी तो जाँच बाकी है,” मैंने कहा।
“जाँच भी पूरी हो जाएगी,” उसने कहा। “और रसीद असली निकलेगी — मुझे पता है। वो पचास साल पुरानी है। खेलू मियाँ के वालिद की है। मुझे हिसाब लगा लेना चाहिए था — पर मुझे लगा था कि इतना पुराना काग़ज़ किसी के पास बचा नहीं होगा।”
“तुमने हिसाब लगाया,” मैंने कहा। “पर खेलू काका को हिसाब में नहीं लिया।”
वो एक पल के लिए चुप हुआ।
“अच्छा,” उसने कहा। “तो अब सुनो। अगर कल सुबह तक जाँच में रसीद असली निकली — तो तुम्हारी दुकान दुबारा खुल जाएगी। लाइसेंस बहाल।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“पर अंकुश भाई,” उसने अपनी सोने के रंग वाली फ़ाइल खोली और उसमें से एक काग़ज़ निकाला — सिर्फ़ एक शीट, पर उसका रंग मुझे पहले से पता था। “तुमने मीरा जी को रसीद दी। तुमने सिपाही से लड़ लिया। तुमने ये जीत लिया।”
उसने काग़ज़ को मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“अब ये देखो। ये अस्पताल की ज़मीन का नया नोटिस है। इसमें तुम्हारा नाम नहीं, गली का नाम नहीं, सिर्फ़ तारीख़ है — ग्यारह दिन बाद। उस दिन अगर अस्पताल की ज़मीन सार्वजनिक हित में अधिग्रहित होती है, तो तुम गली बचाकर भी क्या करोगे? क्योंकि जिस अस्पताल में तुम्हारी माँ का इलाज चल रहा है — वो ज़मीन मेरी होगी। माँ का इलाज मेरी शर्तों पर होगा। और तुम आज दुकान बचाकर खुश हो रहे हो।”
मैंने काग़ज़ देखा। उस पर सच में वही लिखा था — नूर अस्पताल की ज़मीन, ग्यारह दिन, सार्वजनिक विकास हेतु। नीली मोहर, चंद्रेश के हस्ताक्षर, और नीचे — एक लाइन — “अधिग्रहण के पश्चात पुनर्वास सुनिश्चित किया जाएगा”।
पर ‘पुनर्वास’ का मतलब क्या, वो मैं जानता था। कुछ भी नहीं।
चंद्रेश ने काग़ज़ वापस लिया। मुस्कुराया।
“अंकुश भाई,” उसने कहा। “आज तुमने दुकान बचाई। कल कोई और चीज़ बचानी पड़ेगी। फिर कोई और। फिर कोई और। ये सिलसिला कब तक चलेगा?”
“जब तक सिलसिला नहीं रुका,” मैंने कहा।
वो हँसा — ठंडी, कम मज़ाक वाली हँसी।
“बहादुर बेटा,” उसने कहा। “मुझे ऐसे बच्चे पसंद हैं। इसीलिए मैं तुमसे कहता हूँ — जब ग्यारह दिन बाद वो नोटिस आए, उस वक़्त तुम्हारी दुकान खुली हो या बंद, तुम्हारी माँ अस्पताल में हो या गाँव में — उस दिन तुम मुझे गली के मोड़ पर मिलना। अकेले।”
वो मुड़ा, अपनी गाड़ी की तरफ़ चला। फिर रुका — जैसे किसी पुरानी आदत से — और उसने मीरा की तरफ़ देखा।
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