The Mysterious Bell869 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 869

6 min read November 5, 2026

फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ा और कुछ ऐसा बोला जो मुझे अंदर तक लगा।

“उस्ताद,” उसने कहा, “अब मैं भी स्कूल का नाम रखूँगा ना? मतलब — काग़ज़ पर, दफ़्तर में, जैसे सब लोग होते हैं।”

“रखेगा,” मैंने कहा।

“और जब कोई पूछेगा कि तू कहाँ पढ़ता है,” उसने कहा, “तो मैं कहूँगा — पीपल वाले स्कूल में। और यह भी कहूँगा कि मेरा उस्ताद वहीं गली में साइकिल ठीक करता है।”

मैं कुछ नहीं बोला।

फिर अचानक उसका चेहरा बदला।

“उस्ताद,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब छोटी थी। “आज ग्यारह बजे तेरी दुकान पर सील लगेगी।”

मैंने सिर हिलाया।

“तो फिर स्कूल के नाम का क्या फ़ायदा?” उसने कहा। “अगर दुकान ही नहीं रहेगी, तो मैं किसे दिखाऊँगा कि मैं क्या हूँ?”

गुमटी के पास खड़े मास्टर इरफ़ान ने उसकी तरफ़ देखा, और फिर बहुत धीरे से बोले, “बेटा, स्कूल का नाम दुकान से नहीं आता। दुकान का नाम स्कूल से आता है।”

टिंकू ने उन्हें देखा।

“मतलब?” उसने पूछा।

मास्टर ने साइकिल का हैंडल छोड़ा और गुमटी की बेंच पर बैठ गए, जैसे कोई बड़ी बात करने से पहले आदमी बैठ जाता है।

“मतलब ये,” उन्होंने कहा, “कि तुम्हारे उस्ताद को आज एक काग़ज़ चाहिए। जो मशीन को रोक सके। और मैं सोच रहा हूँ कि वो काग़ज़ इसी स्कूल में पड़ा है।”

मैंने उनकी तरफ़ देखा। “कहाँ?”

“रिकॉर्ड रूम,” मास्टर ने कहा। “स्कूल की पुरानी इमारत के पीछे, जहाँ दो कमरे हैं। एक में परीक्षा के काग़ज़ रहते हैं, और दूसरे में — उसके पीछे — शहर के पुराने काग़ज़। किराया, दुकान, ज़मीन, सब। पचास साल का हिसाब पड़ा है वहाँ। धूल में, बिना हिले।”

“और उसमें किराये की रसीद का सबूत मिलेगा?” मैंने पूछा।

“मिल सकता है,” उन्होंने कहा। “अगर उस दुकान की एंट्री कभी डाली गई हो। हर दुकान की नहीं डलती — पर तेरी गुमटी जैसी दुकान, जो पचास साल से एक ही जगह है, वो ज़रूर किसी रजिस्टर में होगी। और अगर एक बार नाम मिल गया, तो उस रसीद का दूसरा सबूत खुद बोल उठेगा।”

मीरा ने ठीक उसी वक़्त गली में कदम रखा। उसके हाथ में कैमरा था और कंधे पर वो फटा बैग, जिसमें कोई जादुई कुआँ होता है — जो चाहिए, निकल आता है।

“मैंने सुना,” उसने कहा। “रिकॉर्ड रूम।”

“तू हमेशा सुन लेती है,” मैंने कहा।

“कारण है,” उसने कहा। “जब तू चिल्लाता है, पूरी गली सुनती है।”

और फिर बच्चे आ गए।

सानिया आगे थी, उसके पीछे गुड्डू, और सबसे पीछे चिंटू और रफ़ीक़, दोनों के हाथ में समोसा।

“उस्ताद,” सानिया ने कहा, “हमने सुना कि हमें स्कूल जाना है।”

“रिकॉर्ड रूम में,” चिंटू ने कहा, और उसकी आँखें चमक रही थीं।

“तुम लोग स्कूल जाओ,” मैंने कहा। “पढ़ने।”

“पढ़ने वाली बात बाद में,” सानिया ने कहा। “पहले बताओ — रिकॉर्ड रूम में जासूसी होगी या नहीं?”

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने कंधे उठाए, जैसे कहे — बच्चों के सामने झूठ मत बोलना। मैंने मास्टर इरफ़ान की तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रहे थे।

“अगर चाबी मिल जाए,” मैंने कहा, “तो कुछ जासूसी हो सकती है।”

“हम स्कूल के जासूस बनेंगे!” गुड्डू चिल्लाया।

“पहले यह बताओ,” रफ़ीक़ ने कहा, और समोसे का आधा टुकड़ा उसके मुँह में था, “चाबी किसके पास है?”

यही वो सवाल था जो मैं भी पूछने वाला था।

मैंने मास्टर की तरफ़ देखा।

उनका चेहरा बदला। बहुत ज़्यादा नहीं — बस इतना कि जो आदमी उन्हें जानता हो, वो पहचान जाए।

“चाबी,” उन्होंने कहा, और साइकिल का हैंडल फिर पकड़ लिया, जैसे सहारा चाहिए, “स्कूल के मुंशी के पास है।”

“तो उनसे माँग लेंगे,” सानिया ने कहा। “क्या बड़ी बात है?”

“बात यह है,” मास्टर ने कहा, “कि वो मुंशी मामूली मुंशी नहीं है। उसका नाम है रामअवतार। और रामअवतार — ”

वो रुके।

“क्या?” मैंने कहा।

“वो चंद्रेश सक्सेना का दूर का रिश्तेदार है,” मास्टर ने कहा।

गली में एक पल के लिए चुप्पी छा गई। मीरा ने अपना कैमरा नीचे किया।

“दूर का?” उसने पूछा।

“दूर का,” मास्टर ने कहा। “और दूर के रिश्तेदार सबसे ज़्यादा काम आते हैं, क्योंकि उन्हें कोई देखता नहीं।”

मैंने गुमटी की तरफ़ देखा। शबनम आपा के हाथ में चिमटी थी और वो उसे उठाए हुए रुकी थीं, जैसे किसी आवाज़ का इंतज़ार कर रही हों। रज़िया ने अपना कपड़ा पकड़ लिया था।

“यानी चाबी मिलेगी नहीं,” मैंने कहा।

“मिलेगी तो नहीं,” मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में तेज़ चिढ़ थी। “और अगर चाबी नहीं मिली, तो रजिस्टर नहीं मिला। और अगर रजिस्टर नहीं मिला, तो गुमटी की रसीद का दूसरा सबूत नहीं बना। और अगर सबूत नहीं बना — ”

“तो शाम छह बजे तक सब कुछ तय करना है,” मैंने कहा।

“हाँ,” उसने कहा। “और अभी नौ बजे हैं। तेरे पास नौ घंटे हैं।”

मैंने मास्टर इरफ़ान की तरफ़ देखा। वो अब भी चुप बैठे थे, और उनके चेहरे पर कुछ था — ऐसा कुछ जो कहा नहीं गया था।

“मास्टर,” मैंने कहा, “आप कुछ छिपा रहे हैं।”

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

“तुझे कैसे पता?” उन्होंने पूछा।

“क्योंकि आप मुँह से सब बताते हैं,” मैंने कहा। “पर आपका हाथ अभी भी साइकिल का हैंडल पकड़े है। जब आदमी सच बोल रहा होता है, तो चीज़ छोड़ देता है।”

मास्टर इरफ़ान ने अपना हाथ हैंडल से हटा लिया और अपनी जाँघ पर रख दिया। फिर उन्होंने सामने देखा, जैसे कोई नाप ले रहे हों कि कितनी बात बतानी है।

“बीस साल पहले,” उन्होंने कहा, “रिकॉर्ड रूम की एक खिड़की टूटी हुई थी।”

मैंने कुछ नहीं कहा। मीरा ने भी कुछ नहीं कहा। सानिया ने आगे कदम बढ़ाया, पर रफ़ीक़ ने उसका कुर्ता खींच लिया।

“उस खिड़की पर लोहे की जाली है,” मास्टर ने कहा। “पर उस जाली का एक कोना उखड़ा हुआ था। छोटा सा। इतना कि कोई आदमी नहीं, पर कोई बच्चा… या कोई दुबला आदमी…”

वो रुके।

“मैंने उस वक़्त मुंशी को बताया भी था,” उन्होंने कहा। “तो उन्होंने कहा कि वो कमरा बीस साल से बंद है और वहाँ कुछ रखा ही नहीं है। पर मैंने अपनी आँखों से देखा था कि बंद कमरे की खिड़की में पर्दा हिल रहा था।”

“हवा से,” मीरा ने कहा।

“हवा पर्दा हिलाती है,” मास्टर ने कहा, “पर पर्दा बाहर धक्का नहीं खाता। बाहर से धक्का खाने का मतलब है कि अंदर से कोई खींच रहा था।”

मैं एक पल के लिए खामोश रहा।

फिर मैंने घंटी जेब से निकाली। उसे हथेली पर रखा। वो ठंडी थी।

“अभी नहीं,” मैंने घंटी से कहा, बहुत धीरे से, जैसे कोई कहे — जानता हूँ तू जवाब दे सकती है, पर अभी नहीं। “अभी मैं खुद थोड़ी मेहनत कर लेता हूँ।”

घंटी ने कोई आवाज़ नहीं की। मैंने उसे वापस जेब में रख दिया। शबनम आपा ने यह देख लिया था कि मैंने क्या किया, और उनकी आँखें मिलने पर वो बोलीं, “अच्छा किया। हर बात घंटी से नहीं पूछनी चाहिए। कुछ बातें अपने औज़ार से निकलती हैं।”

“औज़ार?” मैंने कहा।

“तेरे सिर में जो है,” उन्होंने कहा, और चिमटी फिर उठा ली।

मीरा ने अपना कैमरा बैग में रखा और सीधी मेरी तरफ़ देखा।

“एक बात सुन,” उसने कहा। “अगर खिड़की बीस साल से टूटी है, तो मुंशी उसे ठीक क्यों नहीं करवाया? स्कूल में पैसा है। प्रिंसिपल पैसा देता है।”

“क्योंकि मुंशी को डर है,” मास्टर ने कहा।

“किससे?”

“इससे कि जो काग़ज़ अंदर पड़े हैं, वो कहीं उसका नाम न ले लें।”

मैंने सानिया की तरफ़ देखा। सानिया ने मेरी तरफ़ देखा। हम दोनों एक ही पल में समझ गए।

“तो अगर खिड़की अभी भी टूटी है,” सानिया ने कहा, “तो चाबी की ज़रूरत ही नहीं।”

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