The Mysterious Bell – Chapter 868
“उस्ताद,” उसने कहा, जैसे ही मैं आया। “मैं स्कूल जाऊँगा।”
“अच्छा किया,” मैंने कहा।
“पर एक शर्त है,” उसने कहा।
“अब तू मुझसे शर्त पूछ रहा है?” मैंने कहा, और मैं हँसा।
“हाँ,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ सच में गंभीर थी। “मैं स्कूल जाऊँगा, पर सिर्फ़ इस शर्त पर — कि तू मुझे हर शाम बुलाएगा। हर शाम। पाँच बजे फ़ॉर्म जमा होगा, सात बजे मैं यहाँ होऊँगा। और अगर तू उस दिन कोई बड़ा जोड़ कर रहा हो, तो तू मेरा इंतज़ार करेगा।”
मैंने उसे देखा।
“तुझे पता है,” मैंने कहा, “मैंने पचास साल पहले के उस्तादों की बात सुनी है, और आज तुझसे पहली बार लगा कि मैं किसी उस्ताद से नहीं, किसी साथी से बात कर रहा हूँ।”
“तो मान गया?” उसने कहा।
“मान गया,” मैंने कहा।
और मैंने अपना हाथ आगे किया।
उसने अपना छोटा हाथ मेरे हाथ पर रख दिया, उस पर ग्रीस लग गई, और उसने उसे पोंछा नहीं।
उस रात, जब सब जा चुके थे और मैं दुकान में पीछे की तरफ़ औज़ार समेट रहा था, घंटी अपने आप बजी।
बहुत धीमे से। एक छोटी सी आवाज़, जैसे कोई दूर से साँस छोड़ रहा हो।
“क्या?” मैंने पूछा।
घंटी ने कहा, “अब तू अकेला नहीं है।”
“तो?” मैंने कहा।
“तो,” घंटी ने कहा, “जो अब होगा, वो तेरे ही हिसाब से नहीं होगा।”
मैं एक पल रुका।
“अच्छा है,” मैंने कहा।
और मैंने दुकान का शटर आधा गिराया, और फिर रुककर, उसे वापस ऊपर कर दिया।
क्योंकि अब जो अकेला नहीं है, वो शटर पहले नहीं गिराता।
॥
उस रात मैं सोया तो बहुत देर से। पर नींद आई भी तो हल्की — ऐसी नींद जिसमें आधा दिमाग़ जागता रहता है और हर आवाज़ पर कान खड़े हो जाते हैं। दुकान के बाहर पीपल की पत्तियाँ खड़खड़ाती रहीं। एक बार लगा कि कोई शटर के नीचे से कुछ सरका रहा है। मैं उठकर देखने आया, पर नीचे सिर्फ़ धूल थी और एक कुत्ते के पंजे का निशान।
सुबह छह बजे मेरी आँख अपने आप खुल गई। गली में अभी उजाला पूरा नहीं हुआ था, बस पीपल की छतरी के ऊपर से एक पीली लकीर आ रही थी। शबनम आपा की गुमटी से चूल्हे की आवाज़ आ रही थी — उन्होंने कहा था सात बजे मशीन के सामने पोटली खोलेंगी, और उससे पहले वो अपनी तरफ़ की सारी तैयारी कर रही थीं।
मैंने मुँह धोया, आधी चाय पी और घंटी उठाई।
“सुन,” मैंने कहा, “आज का दिन भारी है। तुझे कुछ बताना है?”
घंटी चुप रही।
“जानता हूँ,” मैंने कहा, “तू पूरी बात कभी नहीं कहता। पर मैं आज कम से कम यह जानना चाहता हूँ कि सबसे पहले किससे डरना है। काग़ज़ से, मशीन से या उस औरत से जो कल उस बक्से में मिली थी?”
घंटी हिली, बहुत हल्की, और एक छोटी सी आवाज़ आई।
“सबसे पहले,” उसने कहा, “किसी से मत डरना।”
फिर चुप।
मैं हँस पड़ा। “बहुत काम की सलाह है,” मैंने कहा। “जैसे कोई कहे — भूख लगे तो रोटी खा लेना।”
घंटी ने कुछ नहीं कहा, और मैंने उसे जेब में डाल दिया।
शटर उठाया तो सामने रफ़ीक़ और चिंटू खड़े थे। दोनों की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे रात भर सोए ही न हों।
“उस्ताद,” रफ़ीक़ ने कहा, “आज हम स्कूल जाएँगे?”
“तू स्कूल ही जा रहा है,” मैंने कहा। “आज तो सबको स्कूल जाना है।”
“नहीं, मतलब — हम भी?” चिंटू ने कहा। “मतलब जासूसी वाले काम में?”
“पहले चाय,” मैंने कहा।
“पर उस्ताद — ”
“चाय,” मैंने कहा। “भूखे जासूस से कोई काम नहीं होता।”
वो दोनों गुमटी की तरफ़ भागे, और मैंने पीछे से देखा कि दोनों एक ही साथ, एक जैसे कदम रखकर भाग रहे थे, जैसे कोई पुरानी फ़िल्म का जोड़ा हो।
शबनम आपा गुमटी पर थीं और रज़िया उनके पास स्टूल पर बैठी थी। रज़िया के हाथ में एक कपड़ा था और वो उसे बार-बार मोड़ रही थी। शबनम आपा जब भी उनकी तरफ़ देखतीं, उनका चेहरा थोड़ा नरम हो जाता — ऐसा नरम जो पंद्रह साल बाद आया हो, इसलिए अभी तक टिकता नहीं था।
“अंकुश,” शबनम आपा ने कहा, “सात बजे मैं तेरी दुकान पर होऊँगी।”
“पोटली लेकर?”
“पोटली लेकर,” उन्होंने कहा। “और एक बात — जो उसमें निकलेगा, वो सिर्फ़ ਮੇਰਾ नहीं है। उसमें माँ का भी है। और माँ अब नहीं है, इसलिए आज मैं उसकी तरफ़ से बोलूँगी।”
“ठीक है,” मैंने कहा।
रज़िया ने धीरे से कहा, “मैं भी साथ रहूँगी।”
शबनम आपा ने उनकी तरफ़ देखा। पहले तो कुछ नहीं बोलीं, फिर कहा, “रहना।”
और यह इतना छोटा शब्द था, पर रज़िया की आँखें भर आईं।
मैं वापस दुकान की तरफ़ मुड़ा ही था कि गली के मुँह से मास्टर इरफ़ान आते दिखे। वो जल्दी-जल्दी चल रहे थे, एक हाथ में उनकी काली जंग लगी साइकिल थी और दूसरे हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़।
“अंकुश भाई!” उन्होंने दूर से ही कहा। “एक मिनट।”
मैं रुका।
वो पास आए, साइकिल टिकाई, और साँस लेकर बोले, “शाम की क्लास। नाम लिख दिया गया।”
“क्या?”
“टिंकू का नाम,” उन्होंने कहा, और काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “कल शाम को पाँच बजे वाली सूची में नाम जोड़ दिया। मैंने खुद पुरानी इमारत के दफ़्तर में जाकर मिलाया। तुम सोच रहे होगे कि इतनी जल्दी कैसे — तो सुनो, वहाँ एक बाबू हैं जो अभी तक टहलते हैं, और उन्हें मैं पुराने ज़माने से जानता हूँ।”
मैंने काग़ज़ खोला। ऊपर स्कूल की मुहर थी — हल्की नीली, थोड़ी धुँधली — और नीचे स्याही से लिखा था: टिंकू कुमार, कक्षा, शाम की क्लास, समय पाँच से सात।
“ये पक्का है?” मैंने पूछा। “बाद में ये न कहे कि ग़लती से लिख गया?”
“मैंने उसी वक़्त कह दिया,” वो बोले। “कह दिया कि ये काग़ज़ किसी के दबाव में नहीं बना। और मज़े की बात सुनो — डर के मारे उस बाबू ने अपनी कुर्सी भी मेरे लिए खिसका दी।”
मैं हँसा। “डर कहाँ से आया?”
“ये कि मैं उनके पास बैठकर उनके पुराने काग़ज़ों की बात करूँगा,” मास्टर ने कहा, और उनकी आँखों में शरारत आई। “पुराने बाबू सबसे ज़्यादा उसी से डरते हैं कि कोई उनसे उनका हिसाब न पूछ ले।”
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। “टिंकू को कब पता चलेगा?”
“अभी।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। टिंकू गुमटी की बेंच पर बैठा था, उसके सामने चाय रखी थी और वो उसे छू भी नहीं रहा था। उसका चेहरा ऐसा था जैसे रात भर की जागी हुई हिम्मत अभी भी उसके कंधों पर बोझ की तरह रखी हो।
“टिंकू!” मैंने कहा।
वो चौंका। “हाँ उस्ताद?”
“इधर आ।”
वो दौड़कर आया। उसने पहले मेरी जेब देखी, फिर मेरा चेहरा, फिर मास्टर इरफ़ान का चेहरा। बच्चा उम्र से ज़्यादा समझदार हो गया था, और ये सबसे ज़्यादा दुख देने वाली बात थी।
मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया।
“ये क्या है?” उसने पूछा।
“पढ़,” मैंने कहा।
“उस्ताद, मैं…”
“पढ़, टिंकू।”
वो काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़कर पढ़ने लगा। उसके होंठ हिल रहे थे। फिर वो रुका। फिर दोबारा पढ़ा। फिर तीसरी बार अपना ही नाम देखा, इस तरह जैसे उसे यक़ीन न हो रहा हो कि अपना नाम भी पढ़ा जा सकता है।
फिर उसने अचानक एक छलाँग लगाई।
सच में — एक छोटी सी हवाई छलाँग, गुमटी की बेंच के सामने, जैसे कोई बच्चा होली के दिन नाचता है।
“मेरा नाम लिखा है!” वो चिल्लाया। “उस्ताद! मेरा नाम स्कूल के काग़ज़ पर लिखा है!”
“बहुत ज़ोर से मत चिल्ला,” मैंने कहा। “आधी गली सो रही है।”
“सोने दो!” उसने कहा, और फिर मुड़कर गुमटी की तरफ़ चिल्लाया, “शबनम आपा! मेरा नाम लिख गया!”
शबनम आपा ने चिमटी नीचे रखी और मुस्कुराते हुए कहा, “तो अब मेरी गुमटी पर एक और बड़ा आदमी हो गया।”
“मैं बड़ा आदमी नहीं हूँ,” टिंकू ने कहा, और फिर सोचकर बोला, “अभी नहीं हूँ। पर हो जाऊँगा।”
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