The Mysterious Bell – Chapter 858
वो उठा। उसने मेरी तरफ़ एक बार देखा। फिर अपनी माँ के पीछे चल दिया। गुमटी से बाहर निकलते वक़्त उसने पीछे मुड़कर कहा, "उस्ताद, चार बजे आऊँगा। पक्का।"
और फिर वो चले गए। गली में उनकी चप्पलों की आवाज़ गई और धीमी पड़ गई।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अपनी कॉपी में कुछ लिख रही थी।
"क्या लिख रही है?" मैंने पूछा।
"लिख रही हूँ," उसने कहा, "कि आज सुबह सात बजे से पहले हमें एक और आदमी चाहिए। बाहर का, लिखित गवाह, जो इस बात को काग़ज़ पर कहे कि मशीन का काग़ज़ झूठा है। और मुझे लगता है वो आदमी अपने पैरों से चलकर नहीं आएगा। उसे हमें लाना पड़ेगा।"
कौशल्या दादी ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और कहा, "तो फिर चलो।"
मैंने देखा, आसमान में रोशनी बढ़ रही थी। सात बजे में अब ज़्यादा देर नहीं थी।
और ठीक उसी वक़्त, पुराने बिजलीघर की तरफ़ से, एक और आवाज़ आई। इस बार धड़ाम नहीं थी। इस बार ऐसी आवाज़ थी जैसे कोई बहुत पुराना बक्सा अपना ढक्कन खुद खोल रहा हो, और भीतर से कोई धीरे से कह रहा हो — "अब बारी मेरी है।"
मैंने घंटी जेब में रखी और उस्ताद की तरफ़ देखकर कहा, "उस्ताद, आपको एक बात पूछनी है। अगर हम वो गवाह आज सुबह सात बजे तक न ला पाए, तो क्या मशीन रुक सकती है?"
उस्ताद ने लाठी उठाई और धीरे से बोले, "मशीन नहीं रुकेगी। पर मशीन के सामने खड़ा आदमी रुक सकता है। और आज सुबह गली में एक नहीं, सौ आदमी खड़े होंगे। बस उन्हें यह बताना है कि झुकना किसके सामने है।"
मैंने गुमटी के बाहर देखा। गली जाग रही थी। किसी ने शटर उठाया, किसी ने बाल्टी रखी, किसी ने पानी डाला। रोज़ की आवाज़ें।
पर आज इन आवाज़ों में एक बात नई थी — कोई भी अपने दरवाज़े के पीछे नहीं छिप रहा था।
॥
उस आवाज़ के बाद गली में एक पल के लिए सब रुक गए। जैसे किसी ने पूरी गली के ऊपर ताला डाल दिया हो और फिर खोल दिया हो।
फिर धीरे-धीरे आवाज़ें लौटीं। किसी ने बाल्टी रखी, किसी ने शटर के कुंडे पर हाथ मारा, किसी ने पानी डाला। रोज़ की आवाज़ें। पर आज इन आवाज़ों में वो बात नहीं थी जो कल तक थी। आज कोई दरवाज़े के पीछे नहीं छिप रहा था।
मैं गुमटी के बाहर आया। सामने टिंकू खड़ा था। उसकी माँ का हाथ उसके कंधे पर था और टिंकू का बस्ता उसके हाथ में।
मैंने कहा था — सुबह स्कूल, शाम चार बजे के बाद दुकान। मैंने सोचा था कि बात खत्म हो गई। बच्चा बस्ता उठाएगा, माँ के साथ जाएगा, शाम को लौटेगा, और सब वैसा ही चलेगा जैसा चलता आया है।
पर टिंकू ने बस्ता नहीं उठाया।
वो एक पल अपनी माँ की तरफ़ देखता रहा। फिर मेरी तरफ़। फिर अचानक, बिना कुछ कहे, वो मुड़ा और दुकान के पीछे की तरफ़ भागा।
"टिंकू!" उसकी माँ ने आवाज़ दी।
पर वो नहीं रुका।
वो दुकान के पीछे वाले कमरे में घुसा। मैं उसके पीछे-पीछे गया। कमरा अंधेरा था, बल्ब जल नहीं रहा था, सिर्फ़ दरवाज़े से आती सुबह की हल्की रोशनी थी।
टिंकू औज़ारों के ट्रंक के पास बैठा था। अपने दोनों हाथ उस लोहे के बक्से पर रखे हुए, गाल उसकी सतह से चिपका हुआ, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की गोद में सिर रखकर बैठा हो।
मैं दरवाज़े पर रुक गया।
उसकी पीठ काँप रही थी। धीरे-धीरे। बिना आवाज़। वो रो रहा था, पर इस तरह कि किसी को सुनाई न दे।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने सिर्फ़ देखा — उस ट्रंक पर मेरी उँगलियों के निशान थे। ग्रीस के। सालों के। और टिंकू उन्हीं निशानों पर अपना हाथ रखे बैठा था, जैसे वो उन्हें पकड़कर रखना चाहता हो।
फिर मैंने अपनी आवाज़ को हल्का किया और मज़ाक की तरह कहा, "ओए, ट्रंक से चिपकने से कुछ नहीं होता। स्कूल में ग्रीस नहीं मिलती, ये बात सही है। वहाँ सिर्फ़ स्याही मिलती है। हाथ काला करेगा, बस।"
वो नहीं हँसा।
वो मुड़ा भी नहीं।
बस उसने रुँधी आवाज़ में कहा, "उस्ताद…"
"हाँ।"
"तुम मुझे भूल जाओगे।"
एक पल मैं चुप रह गया।
"क्या?" मैंने कहा।
"जब मैं स्कूल जाऊँगा," उसने कहा, आवाज़ टूटती हुई, "तब तुम यहाँ अकेले रहोगे। फिर कोई और लड़का आएगा। छोटा होगा। तुम्हारे पास पंचर करवाने आएगा। तुम उसे पहले पेंच पकड़ना सिखाओगे। फिर पहिया खोलना। फिर चेन। और वो तुम्हारा शागिर्द बन जाएगा।"
उसने साँस ली।
"और फिर तुम उसे उस्ताद कहना शुरू कर दोगे। फिर मेरे पास 'टिंकू' बनकर ही रह जाएगा। और एक दिन तुम मेरा नाम भी ठीक से नहीं लोगे।"
मैं उसके पास गया। उसके बगल में फ़र्श पर बैठ गया। मेरी घुटनें चटकीं। मेरी जीन्स पहले से फटी हुई थी, अब और फट गई।
"सुन," मैंने कहा। "मेरे पास एक ही घंटी है। एक ही ट्रंक है। एक ही दुकान है। और एक ही शागिर्द है।"
वो चुप रहा।
"और तू सोचता है कि मैं इतनी जल्दी कोई दूसरा ढूँढ लूँगा?" मैंने कहा। "भाई, मुझे एक पेंच सिखाने में तीन महीने लगे थे। तुझे पहिया खोलना सिखाने में डेढ़ महीना लगा। तू सोचता है मैं ये सब फिर से शुरू करूँगा? मेरे पास इतना वक़्त कहाँ है?"
वो हल्का-सा हँसा। एक छोटी सी हँसी। फिर वो फिर चुप हो गया।
"पर तुम मुझे भूल जाओगे," उसने फिर कहा। इस बार ज़ोर से। जैसे यही उसका असली डर था और वो उसे बाहर निकालना चाहता था।
मैं कुछ कहता, उससे पहले गुमटी की तरफ़ से आवाज़ आई।
"टिंकू कहाँ गया?"
मैंने पीछे देखा। गुमटी के बाहर एक आदमी खड़ा था। पतला कद, लगभग मेरे जितना ही, पर कुछ साल बड़ा। सफ़ेद कमीज़ जिसके आस्तीन कोहनी तक मोड़े हुए, हाथ में पुरानी काली साइकिल पकड़े हुए। साइकिल पर जंग के धब्बे थे और उसकी घंटी भी नहीं थी।
उसके चेहरे पर उम्र के निशान थे, पर आँखें अभी भी स्कूल के मास्टर जैसी — जो बच्चे को देखकर सिर्फ़ उसका नाम नहीं देखती, उसका डर भी देखती हैं।
मैंने पहचाना।
मास्टर इरफ़ान।
मैंने उनके बारे में सुना था। स्कूल में पढ़ाते हैं। बच्चे कहते हैं कि वो सबसे कड़क मास्टर हैं, पर सबसे कम डाँटते हैं। उनकी साइकिल पर कोई घंटी नहीं है, क्योंकि वो कहते हैं कि जो घंटी खुद बजाता है वो बच्चों को चुप कराने के लिए होती है, और वो बच्चों को चुप नहीं कराना चाहते, सुनना चाहते हैं।
वो कमरे तक आए और दरवाज़े पर रुके। उन्होंने टिंकू को ट्रंक से चिपका देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। सिर्फ़ मेरा नाम। कोई औपचारिकता नहीं।
"मास्टर जी," मैंने कहा और उठने लगा।
"बैठा रह," उन्होंने कहा। "मैं आया हूँ, कोई इंस्पेक्शन नहीं।"
वो अंदर आए। उन्होंने साइकिल दीवार से टिका दी। फिर वो हमारे सामने वाले पुराने स्टूल पर बैठ गए।
"टिंकू," उन्होंने कहा।
टिंकू ने सिर नहीं उठाया।
"टिंकू," मास्टर इरफ़ान ने फिर कहा, इस बार धीरे से। "मैं तेरी माँ की बात सुनकर आया हूँ। और मैं सीधे स्कूल से आया हूँ। दफ़्तार से भी नहीं, गेट से।"
तब टिंकू ने सिर उठाया।
"मास्टर जी?" उसकी आवाज़ सूखी थी।
"स्कूल में शाम की क्लास शुरू हो रही है," मास्टर इरफ़ान ने कहा। "पाँच बजे से सात बजे तक। उस वक़्त दुकान का काम खत्म हो जाता है। मैंने सोचा, क्यों न तेरा नाम लिख दूँ।"
टिंकू ने मुँह फेर लिया।
"मास्टर जी, अब मुझे क्या पढ़ना," उसने कहा। आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो पंद्रह साल के बच्चे की आवाज़ में नहीं होनी चाहिए, पर होती है। "मैं तो पिछली क्लास में ही रह गया था। मेरे साथ के बच्चे दो साल आगे निकल गए। मैं अब उनके साथ बैठूँगा तो सब हँसेंगे।"
"हँसेंगे," मास्टर इरफ़ान ने कहा। "और फिर हँसना बंद कर देंगे। फिर एक दिन तू जवाब देगा और वो चुप हो जाएँगे। ये सब ऐसे ही होता है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno