The Mysterious Bell – Chapter 857
मैंने तुरंत पूछा, "सबके सामने?"
"सबके सामने," उन्होंने दोहराया। "जब दो लोग जुड़ते हैं और दस लोग देखते हैं, तो आधा कहीं और नहीं जाता। मैंने उन्हें इतना ही कहते सुना। पर मैं उस वक़्त नौ साल की थी। मुझे लगा बूढ़े बातें बना रहे हैं।"
मेरे मन में एक चीज़ कौंधी। एक लौ की तरह नहीं, एक तिनके की तरह — हिली और बुझ गई। "मतलब जो जोड़ सबके सामने होता है, उसका आधा उसके पास नहीं जाता?"
कौशल्या दादी ने कहा, "मैंने यही सुना था। पर मैं काग़ज़ नहीं हूँ। मुझे नहीं पता कि यह सच है या बूढ़ों की बात।"
मैंने घंटी को हथेली पर उठाया। "तू क्या कहती है?"
घंटी ने कहा, "मैंने कहा था — जोड़ सबके सामने हों।"
मैं चुप हो गया। क्योंकि यह बात उस्ताद ने कल रात ही कही थी, और मैंने उसे एक सलाह समझकर छोड़ दिया था। सलाह नहीं थी। वो नियम की पहली सीढ़ी थी।
मीरा ने अपनी कॉपी बंद की और कहा, "अंकुश।"
मैंने देखा, वो बहुत काम की आवाज़ में बोल रही थी। वो आवाज़ जो वो तब निकालती है जब वो भावुक होती है और उसे भावुक दिखना नहीं है।
"मैं मानती हूँ," उसने कहा। "मुझे तुझ पर भरोसा है। पर याद रख — जिस सभा में हम कल जा रहे हैं, वहाँ कहानी नहीं चलेगी। वहाँ काग़ज़ चलेगा। अगर तू खड़े होकर कहेगा कि मेरी घंटी कहती है कि मेरे जोड़ का आधा उसके पास जाता है, तो सक्सेना एक मिनट में कह देगा कि लड़का थका हुआ है, दिमाग़ पर बोझ है, अस्पताल में माँ है। और सब उसकी बात मान लेंगे।"
मैंने कहा, "मेरे पास तेरा कैमरा है।"
"मेरे कैमरे में रणवीर के पीछे एक काला साया है," उसने कहा। "एक साया। जिसमें आँख नहीं, नाक नहीं, मुँह नहीं। कोई जज इसे सबूत नहीं मानेगा। इसका नाम भी नहीं है। इसे मैं काग़ज़ पर कैसे लिखूँ?"
"तो हमें सबूत चाहिए," मैंने कहा।
"हमें ताबीज़ चाहिए," उसने कहा। "और ताबीज़ उसके गले पर है।"
मैंने कहा, "ताबीज़ उसके गले से उतरवाना है — बिना हाथ लगाए।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही, फिर बोली, "यही तो बात है। तेरी सारी बातें इसी तरह खत्म होती हैं — कुछ करना है, बिना हाथ लगाए।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार उस रात हँसा। "तू भी तो चैनल चलाती है, बिना सच लिखे।"
उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, फिर नीचे कर दी। "चल। चाय पी।"
चाय आई। कुल्हड़ गरम थे और चाय में अदरक तेज़ थी। शबनम आपा ने ट्रे रखी और बोलीं, "बच्चों, पहले पी लो। फिर जो करना है करना।"
चिंटू ने कुल्हड़ पकड़ा और कहा, "आपा, आज स्कूल जाना है क्या?"
शबनम आपा ने कहा, "स्कूल का पता मुझे नहीं।"
और तभी मैंने देखा कि गली के मुँह से कोई आ रहा है।
लाल-पीली साड़ी, कंधे पर फटा थैला, सिर पर तेल लगाकर सँवारे बाल, चेहरे पर वो थकान जो सुबह चार बजे उठने वाली औरतों के चेहरे पर होती है — नींद की नहीं, बेचैनी की। टिंकू की माँ। वो सीधी गुमटी की तरफ़ आईं, हम सबको देखा, टिंकू को देखा, और फिर उसका चेहरा वैसा हो गया जैसा किसी माँ का उस वक़्त होता है जब वो अपने बेटे को ऐसी जगह बैठा देखे जहाँ से उसे उठाना पड़ेगा और उठाना उसके बस में न हो।
"तू यहीं है," उन्होंने कहा। टिंकू के नाम से नहीं, बस "तू"।
टिंकू उठ खड़ा हुआ। "माँ—"
"बैठ।"
वो बैठ गया।
उन्होंने थैले से एक काग़ज़ निकाला। मैंने देखा — हल्का पीला, मुड़ा हुआ, कोने से फटा। उन्होंने उसे गुमटी की मेज़ पर रख दिया, मेरे सामने, ऐसे जैसे कोई अदालत में काग़ज़ रखती हो।
"ये काग़ज़ आज सुबह सात बजे स्कूल के गेट पर लगा मिला," उन्होंने कहा। "नाम कटने की सूचना है। कहता है, जो बच्चा एक महीने से स्कूल नहीं आया, उसका नाम कट जाएगा। मेरे बेटे का नाम।"
शबनम आपा ने कुल्हड़ रख दिया। रज़िया ने उनका हाथ पकड़ा।
मैंने काग़ज़ उठाया। पढ़ा। सच था। एक महीने की हद। तारीख़ भी लिखी थी, और नीचे स्कूल की मुहर। मेरे हाथ में ये काग़ज़ मेरे अपने काम से भारी लग रहा था।
"माँ," मैंने कहा, "ये काग़ज़—"
"तू चुप रह," उन्होंने कहा। सख़्त नहीं, थकी हुई आवाज़ में। "तू मेरे बेटे को उस्ताद बना रहा है। मैंने कुछ नहीं कहा। जब ये तेरी दुकान पर पंचर करने आया था, मैंने कुछ नहीं कहा। जब इसने घुटने पर पट्टी बाँधकर कहा कि आज उस्ताद के साथ जाना है, मैंने कुछ नहीं कहा। समझा था बड़ा हो रहा है, आदमी बन रहा है।"
उन्होंने एक साँस ली और फिर वो बात कही जो उन्होंने शायद रात भर सोचकर तय की थी।
"पर आदमी बनने और स्कूल छोड़ने में फ़र्क़ है।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आज ही तय होगा। स्कूल या दुकान। दोनों नहीं।"
गुमटी में ऐसी चुप्पी छाई कि चूल्हे की आवाज़ भी बंद लगी।
टिंकू ने कहा, "माँ, मैं स्कूल जाऊँगा, पर पहले ये—"
"पहले कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "तू तेरह साल का है। तेरे पापा छह महीने पहले गए और उसके बाद ये घर मैं चला रही हूँ। मेरे पास दो रुपये का भी हिसाब है और उसमें ये जगह नहीं है कि मेरा बेटा सुबह चार बजे उठकर बक्सों के पीछे जाए और मुझे स्कूल से खबर आए कि नाम कट रहा है।"
रफ़ीक़ ने धीरे से सानिया की तरफ़ देखा। सानिया ने कॉपी बंद कर दी। चिंटू ने अपने कुल्हड़ में देखना शुरू कर दिया, जैसे उसमें दुनिया का सबसे ज़रूरी जवाब लिखा हो।
मैं उठ खड़ा हुआ। मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से समेटकर मेज़ पर सीधा रखा।
"आप सही कह रही हैं," मैंने कहा।
वो ज़रा ठिठकीं। "क्या?"
"मैं कह रहा हूँ, आप सही कह रही हैं," मैंने कहा। "टिंकू को स्कूल जाना चाहिए। और सिर्फ़ इसलिए नहीं कि काग़ज़ आ गया। इसलिए कि वो अपने पापा के बाद सबसे ज़्यादा जिस चीज़ का हक़दार है, वो है पढ़ाई, और मैं उस हक़ को अपनी दुकान की धूल में नहीं दबा सकता।"
टिंकू ने कहा, "उस्ताद—"
"चुप," उनकी माँ ने कहा, और फिर भी वो खुद चुप नहीं रह पाईं। "पर एक बात सुन ले।"
मैंने कहा, "कहिए।"
"आज सुबह सात बजे तेरी दुकान के पीछे मशीन आने वाली है," उन्होंने कहा। "पूरी गली को पता है। मुझे भी पता है। मैं डरने नहीं आई। मैं सिर्फ़ ये बताने आई हूँ कि अगर तू आज से मेरे बेटे को स्कूल नहीं भेजता, तो अगली बार जब तू अपनी दुकान का शटर उठाएगा, वो खाली मिलेगा। क्योंकि मैं खुद इसे दुकान से हटा ले जाऊँगी। तेरे पास कोई सफ़ाई नहीं, कोई तर्क नहीं, कोई घंटी नहीं चलेगी। माँ हूँ, अपनी चीज़ ले जाऊँगी।"
उनके हाथ काँप रहे थे। मैंने देखा — वो काग़ज़ जिसे वो मेज़ पर रख गई थीं, उसका कोना उनकी उँगली से दबा हुआ था, जैसे वो उसे वापस लेना चाहती हों और नहीं ले सकती हों।
मैंने घंटी निकाली।
सब हाँफ़ते हुए मेरी तरफ़ देखने लगे — शबनम आपा, उस्ताद, याकूब, मीरा, कौशल्या दादी, पाँचों बच्चे। सब सोच रहे थे कि मैं कुछ कहूँगा, कोई चमत्कार करूँगा, घंटी बजेगी और काग़ज़ जल जाएगा।
मैंने घंटी उनकी तरफ़ बढ़ाई और कहा, "ये घंटी नहीं, आपका काग़ज़ सच है।"
फिर मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू मेरा शागिर्द है। पर आज से तू दो जगह नहीं रहेगा। सुबह स्कूल, शाम को दुकान। चार बजे के बाद। और अगर एक दिन भी स्कूल की शिकायत आई, तो मैं खुद तेरे पीछे दरवाज़ा बंद कर दूँगा।"
टिंकू की आँखें भर आईं। वो कुछ कहना चाहता था, पर उसकी माँ ने उससे पहले कहा, "अभी के अभी चल। बस्ता उठा।"
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