The Mysterious Bell856 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 856

7 min read November 5, 2026

रात भर वो आवाज़ आती रही।

कभी धड़ाम। कभी लोहे का लोहे पर खिसकना। कभी ऐसी लंबी खींच, जैसे कोई बहुत भारी चीज़ अपनी जगह से ज़रा सी सरककर फिर वापस बैठ जाती हो। और बीच में खामोशी — ऐसी खामोशी जो खाली नहीं लगती थी, भरी हुई लगती थी। जैसे कोई साँस रोककर कान लगाए बैठा हो कि अब कौन पहले हिलता है।

गुमटी के बाहर लालटेन जलती रही। शबनम आपा ने उसमें दो बार तेल डाला। रज़िया ने एक बार कहा, "दीदी, तू बैठ जा," और शबनम आपा ने वही कहा जो वो पंद्रह साल से कहती आई थीं — "मेरी गुमटी है, इसमें बैठने का हक़ भी मेरा और खड़े रहने का भी।" पर इस बार वो बात गुस्से की नहीं थी। इस बार वो डर को ढकने की बात थी।

कौशल्या दादी बेंच पर सीधी बैठी रहीं। लाठी उनके घुटनों के बीच खड़ी थी और दोनों हाथ उसके ऊपर। रात भर उन्होंने एक बार भी आँख नहीं बंद की। एक बार सिर्फ़ इतना कहा, "डर को बैठने की जगह मत देना। वरना वो तेरी कुर्सी ले लेगा और तू खड़ा रह जाएगा।"

याकूब चाचा की लाठी की नोक फ़र्श पर टक-टक करती रही। पहले तेज़, फिर धीमी, फिर बंद। जब आवाज़ आती, तो वो टक-टक फिर शुरू हो जाती, जैसे बूढ़ा अपनी उँगलियों से वक़्त गिन रहा हो और वक़्त उसकी बात न मान रहा हो।

बच्चे पहले जागते रहे। चिंटू ने दो बार पूछा, "भैया, भूत है क्या?" और मैंने कहा, "भूत नहीं, बक्सा है।" तो उसने कहा, "बक्सा भूत से ज़्यादा डरावना है, क्योंकि भूत दिख जाता है, बक्सा नहीं।" सानिया ने उसका कान खींचा और कहा, "चुप कर, कॉपी में लिख।" और चिंटू ने सच में कॉपी निकाल ली। बच्चे हैं। जब समझ नहीं आता, तो लिखने लगते हैं।

रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा एक आँख पर लगाकर पूरी रात अंधेरे को देखा, जैसे उस एक काँच में बिजलीघर दिख जाएगा। गुड्डू दो बार सो गया और दो बार जागा, और दोनों बार पहला सवाल यही था — "आवाज़ आई?" टिंकू ने एक बार भी नहीं पूछा। वो बस मेरे पास बैठा रहा, पट्टी वाले हाथ को घुटने पर रखे, और हर आवाज़ पर ज़रा सा सिकुड़ जाता था। वो डर नहीं रहा था। वो शर्मिंदा था — कि अब वो "बहादुर" नहीं, "सच्चा" बनना चाहता है, और सच्चा होने के लिए पहले यह सहना पड़ता है कि दुनिया इतनी आसान नहीं है।

मीरा ने कैमरा बंद नहीं किया। वो बीच-बीच में उठकर गली के मुँह तक जाती, लौट आती, और अपनी कॉपी में कुछ लिखती। एक बार उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा, "अंकुश, अगर ये सब किसी ने सुना हो तो पागल समझेगा।" मैंने कहा, "सुनने वाला पागल ही होगा, तभी तो सुनेगा।" वो हँसी नहीं।

सुबह चार बजे के बाद आवाज़ें धीमी पड़ने लगीं। पाँच बजे तक लालटेन बुझ चुकी थी — तेल खत्म, बत्ती काली। आसमान में वो पहली फीकी रोशनी आ रही थी जो रात को रात नहीं रहने देती, पर सुबह भी नहीं कहलाती। गली में ठंड थी और गुमटी के चूल्हे की राख से अब भी हल्की गंध आ रही थी।

कोई सोया नहीं था।

मैंने जेब से घंटी निकाली। पीतल ठंडा था। मैंने उसे हथेली पर रखा और देखा — उस पर कोई निशान नहीं, कोई नई लकीर नहीं। जैसे रात भर कुछ हुआ ही न हो।

"अब हिसाब खोल," मैंने कहा।

कौशल्या दादी ने सिर उठाया। उस्ताद ने लाठी पकड़ी। याकूब की टक-टक बंद हो गई।

घंटी ने कहा, "हिसाब?"

"हाँ," मैंने कहा। "तूने कहा था, अगले बड़े जोड़ तक हर जोड़ का हिसाब बताएगी। अब बताने का वक़्त है। रात भर वो बक्सा बोलता रहा और मैं यहाँ बैठा रहा।"

एक पल चुप्पी रही। फिर घंटी बोली, बहुत धीमे, "आधा।"

मैंने पूछा, "क्या आधा?"

"हर जोड़ का आधा," घंटी ने कहा। "तेरे हाथ में जोड़ आता है। आधा उधर जाता है।"

मेरे पीछे किसी ने साँस भरी। मैंने देखा, उस्ताद थे। उनका चेहरा वैसा था जैसे कोई बहुत पुराना हिसाब जो वो पचास साल से गलत जोड़ रहे थे, अचानक सामने खुल गया हो।

"किसको जाता है?" मैंने पूछा।

"उसको।"

"किसको उसको?"

"जिसके पास दूसरा खाता है।"

मैंने घंटी को उँगलियों में कसा। "मतलब रणवीर?"

घंटी चुप रही। वो चुप्पी भी जवाब थी।

"तो जब मैं दो लोगों को जोड़ता हूँ," मैंने कहा, "तो उसका आधा हिस्सा उसके पास जाता है? उसका ताबीज़ चमकता है क्योंकि मैं यहाँ कुछ जोड़ता हूँ?"

"हाँ।"

मैं बैठ गया। मैंने सोचा कि इस बात पर मुझे गुस्सा आना चाहिए, पर पहले जो आया वो ठंड थी। एक अलग तरह की ठंड। जैसे तुम साल भर मेहनत करके दीवार बनाओ और फिर पता चले कि तुम्हारी तरफ़ की आधी ईंटें उस घर में लग रही हैं जिसे कोई तुम्हारे सामने बना रहा है।

"अब समझ आया," मैंने कहा। "शबनम आपा और रज़िया आपा जब जुड़ीं, तो चालीस अंक खर्च हुए और साथ में एक सौ दस भी जुड़े। पर उस एक सौ दस का आधा भी उसकी तरफ़ गया। इसीलिए कल रात ताबीज़ चमका। जितना मैं गली में जोड़ूँगा, उतना वो ऊपर उठेगा। मैं उसकी सीढ़ी बना रहा हूँ।"

तभी शबनम आपा ने कुल्हड़ पटका। "बस।"

सबने उनकी तरफ़ देखा।

"सुबह के पाँच बजे हैं," उन्होंने कहा। "और तुम सब ऐसे बैठे हो जैसे क़यामत आ गई। पहले चाय बनेगी। चूल्हा मेरा है, चाय मेरी, और इस गली में जब तक ये चूल्हा जलता है, यहाँ डर की बैठक नहीं होगी।"

रज़िया ने उनका हाथ पकड़ा और कहा, "मैं बनाती हूँ।"

"तू बैठ," शबनम आपा ने कहा। "आज मैं बनाऊँगी।"

वो उठीं और चूल्हे की तरफ़ गईं। उनकी चप्पल की आवाज़ गली में गई और लौटी, और मुझे लगा कि आज सुबह यही सबसे अच्छी आवाज़ है। बिजलीघर से आती धातु की आवाज़ से हजार गुना अच्छी।

उस्ताद अली बक्श ने चश्मा उतारा। उन्होंने उसे अपनी कमीज़ के कोने से पोंछा, फिर पहना, फिर फिर उतारा। फिर बोले, "पचास साल पहले हमने भी यही सोचा था कि हम जोड़ रहे हैं। बंसी को उसके भाई से जोड़ा, हाफ़िज़ को उसके हिस्से से जोड़ा। हम समझते रहे कि हम दरवाज़े जोड़ रहे हैं।"

"और?" मैंने पूछा।

"और वो खिड़कियाँ खोल रहा था," उन्होंने कहा। "हर जोड़ पर वो एक खिड़की खोलता था, और उस खिड़की से हवा उसके पास जाती थी। हमें लगा हम बाज़ार बसा रहे हैं। असल में हम रास्ता बना रहे थे।"

"तो फिर एक ही रास्ता बचता है," याकूब चाचा ने कहा, अपनी लाठी की नोक से फ़र्श पर लकीर खींचते हुए। "जोड़ बंद कर दो। एक दिन भी कुछ मत जोड़ो।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा और फिर उस्ताद की तरफ़। उस्ताद ने सिर हिलाया, ना में।

"नहीं," उस्ताद ने कहा। "जोड़ बंद करना सबसे बड़ी ग़लती है। जो टूटन खा रहा है, उसका खाना जोड़ नहीं, टूटन है। पर अगर तुम जोड़ना बंद कर दोगे, तो गली में जो थोड़ा भरोसा बचा है वो भी सूख जाएगा और वो अपना खाना न मिलने पर खुद गली को खाने लगेगा।"

"तो करना क्या है?" रज़िया ने पूछा। वो पहली बार इस बातचीत में बोलीं, और उनकी आवाज़ में वही सीधापन था जो शबनम आपा में है, बस धीमा।

उस्ताद ने कहा, "ऐसा जोड़ बनाना है जिसका आधा हिस्सा उसके पेट में न जाए।"

"वो कैसे होगा?" मैंने पूछा।

"मुझे नहीं पता," उस्ताद ने कहा, और यह कहते हुए उन्होंने मेरी तरफ़ सीधे देखा, बिना शर्म के। "मैंने पचास साल पहले यह नहीं खोजा। मैंने उस वक़्त अपनी दुकान बचानी थी। तू खोज।"

उस वक़्त कौशल्या दादी ने कहा, "पुराने हिसाब में यह बात छिपी होगी।"

सब उनकी तरफ़ मुड़े।

"क्या मतलब?" मैंने पूछा।

"मैंने तेरे परदादा के मुँह से एक बात सुनी थी," उन्होंने कहा, "जब मैं छोटी थी। उन्होंने शिवनारायण जी से कहा था कि घंटी अकेले का हिसाब नहीं रखती। वो कहते थे — जो सबके सामने जुड़ता है, उसका आधा रास्ता भूल जाता है।"

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