The Mysterious Bell – Chapter 854
बच्चे पीछे बैठे थे।
टिंकू अपने जले हाथ पर पट्टी बाँधे बैठा था और पट्टी पर मैली गति से एक छोटी मुस्कान सी बनी हुई आ रही थी। सानिया अपनी लाल कवर वाली कॉपी में कुछ लिख रही थी। गुड्डू और रफ़ीक़ दूर खड़े उन लोगों की बातें सुन रहे थे जो बैठे थे, और चिंटू ने मेरे कुल्हड़ के पास आकर अपना कुल्हड़ रखा, जिसमें सिर्फ़ झाग था।
कौशल्या दादी एक लोहे की कुर्सी पर बैठी थीं, सीधी, दोनों हाथ लाठी पर रखे। उनकी लाठी ज़मीन पर टिकी थी और उसकी नोक के नीचे एक चपटा पत्थर था, ताकि मिट्टी में गड़े नहीं।
मैंने चाय का कुल्हड़ रख दिया।
जेब से घंटी निकाली।
पीतल की रोशनी लालटेन की रोशनी से अलग होती है। मुझे हमेशा से लगता है कि लालटेन पीली है और पीतल सफ़ेद, और उस रात मेरी जेब से निकली घंटी का रंग थोड़ा और सफ़ेद लग रहा था, जैसे कोई उसे नाखून से रगड़कर साफ़ कर गया हो।
मैंने उसे मेज़ पर रखा।
मेज़ पुरानी थी और उस पर जगह-जगह से गरम कुल्हड़ों के गोल निशान बन गए थे।
मैंने घंटी पर हाथ रखा।
ठंडी थी।
नहीं, ठंडी नहीं — पत्थर जैसी ठंडी। जबकि गुमटी के चूल्हे की गरमी सब तरफ़ फैली हुई थी। मैंने उँगली के पोर से उसका छल्ला छुआ और मुझे लगा कि छल्ले से कोई नस चल रही है, बहुत पतली, बहुत धीमी, जैसे दूर से किसी ने धागा खींच दिया हो।
मैंने आवाज़ धीमी रखी, क्योंकि बहनों की बात में खलल नहीं डालना चाहता था।
"सुन," मैंने कहा, "अब वक़्त है। बता।"
घंटी कुछ देर चुप रही।
और जब बोली, तो उसकी आवाज़ पहले से बहुत धीमी थी। पहले वो आवाज़ कान के अंदर आती थी, साफ़, जैसे कोई मेरे कान के पास बैठा हो। आज वो आवाज़ दूर से आ रही थी। जैसे कोई सड़क के उस पार से मेरा नाम बुला रहा हो और मैं गली की आवाज़ में उसे समझ रहा हो।
"मेरा एक हिस्सा," घंटी ने कहा, "उस तरफ़ जा रहा है।"
"उस तरफ़ किधर?"
घंटी ने थोड़ी देर ली।
"जहाँ पीतल फिर से चमक रहा है।"
मेरी कमर सीधी हो गई। मेरे जबड़े में जो भी चल रहा था, थोड़ी देर के लिए रुक गया।
"मतलब," मैंने कहा, "मैं कुछ जोड़ता हूँ, और उसका आधा तू मुझे दे देती है और आधा…?"
"आधा उस तरफ़ जाता है," घंटी ने कहा। "तूने पूछा था ना कि मैं कहाँ जाती हूँ।"
"मैंने पूछा था कि खाता कहाँ बनता है, तूने कहा था — ज़मीन में।"
"ज़मीन भी है," घंटी ने कहा। "पर सब ज़मीन नहीं है।"
मैंने उसे उठाया और अपनी बाँह पर रख लिया। पीतल ठंडा था, पर उस ठंडक में एक बात थी जो मुझे परेशान कर रही थी — वो ठंडक बाहर से आ रही थी, अंदर से नहीं। जैसे किसी ने इसे किसी दूसरी जगह रखकर वापस लाकर मेरी जेब में डाल दिया हो।
कौशल्या दादी ने लाठी टिका दी और उसकी टक से सबने उनकी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू उस छोटी चीज़ को ऐसे पकड़ता है जैसे किसान बीज पकड़ता हो। और बीज का यही नियम है — जो बीज में जाता है, वो अकेले उसका नहीं होता। न मिट्टी का, न पानी का, न उस आदमी का जो बो रहा है। उसे लोगों के साथ बाँटना पड़ता है।"
"अगर मैं न बाँटूँ?" मैंने पूछा।
उन्होंने मुझे देखा।
"तो बीज सूख जाता है। और सूखा हुआ बीज खुद खाने के काम आता है, बोने के नहीं।"
मैंने अपना सिर हिलाया।
मेरी जेब में एक और चीज़ थी — काग़ज़ का एक टुकड़ा, जिस पर मैंने रात में अपने हिसाब लिखे थे। एक सौ अड़सठ अंक। अट्ठावन बचे थे, एक सौ दस बहनों की सुलह पर जुड़े थे, फिर चालीस कटे थे, फिर हिसाब बदलता रहा। लेकिन घंटी के नए सच ने उस हिसाब को अधूरा बना दिया था। अगर हर जोड़ का आधा हिस्सा उस तरफ़ जाता है, तो मेरा हिसाब क्या है? मेरा हिसाब भी आधा है।
मीरा उसी वक़्त गुमटी के पीछे से आई। उसके हाथ में एक मोटा काग़ज़ों का बंडल था और उसके मुँह में पेंसिल दबी थी। उसने पेंसिल निकाली, बेंच पर बैठकर काग़ज़ फैलाए, और उसके माथे की सिलवटें बता रही थीं कि इसे रात भर नींद नहीं आएगी।
"दस दिन," उसने कहा।
"क्या दस दिन?"
"जो काग़ज़ हमारे हाथ में है, वो दस दिन बाद बेकार हो जाएगा। अगर हम सकीना बी के शर्तनामे और रजिस्ट्री के असली रिकॉर्ड को किसी वकील के दफ़्तर में ले जाना चाहते हैं, तो तीन चीज़ें चाहिए।"
उसने पेंसिल से बेंच पर चक्र बनाया, फिर उसके अंदर एक-एक करके तीन बिंदु बनाए।
"पहली — नक़्शे का गवाह। जो काग़ज़ पर ये साबित कर सके कि नक़्शे में जो लकीरें हैं, वो ज़मीन से मिलती हैं और जो इमारत जहाँ बन रही है, वो वहाँ नहीं बननी थी। यह गवाह हमारे गली का नहीं हो सकता, क्योंकि साहब के वकील एक ही बात बोलेंगे — मोहल्ले की बात मोहल्ले में। इसे बाहर का आदमी होना पड़ेगा, जिसकी लिखाई टाइप में छपी हो, हाथ से नहीं।"
"दूसरी?"
"रसीदों का बंडल। जो चीज़ माँ और रज़िया ने अस्पताल में दी है, हर रसीद, हर अंगूठा, हर तारीख़। काग़ज़ में हर पंक्ति की एक जगह होती है। साहब के दफ़्तर में ये पंक्तियाँ अलग हैं और हमारे पास अलग। जो जीतेगा, वो वही जीतेगा जिसके पास बंडल पूरा हो।"
"और तीसरी?"
मीरा ने सिर उठाया।
"ज़ुबैर चाचा की वो तस्वीर। आग की रात वाली तस्वीर। बिना उसके कोई वकील बात नहीं सुनेगा। क्योंकि उस तस्वीर में वो शाम है जो सारी कहानी की जड़ है।"
कौशल्या दादी ने कहा, "और इसकी चौथी चीज़?"
मीरा रुकी।
"चौथी?"
"हाँ," दादी ने कहा। "हर चीज़ जो दस दिन में पूरी होनी हो, उसकी एक चौथी चीज़ होती है जो काग़ज़ में नहीं लिखी जाती। और वो चीज़ होती है — गवाह का डर न बिकना।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"वो," उसने कहा, "सबसे महंगी है।"
टिंकू ने तभी अपना पट्टी बँधा हाथ उठाया।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैं एक बात कहूँ?"
"कह। पर छोटी रख, चाय ठंडी हो रही है।"
टिंकू ने पट्टी को ऊपर उठाया और उसे ऐसे दिखाया जैसे कोई इनाम दिखा रहा हो।
"अब मैं बहादुर नहीं रहूँगा," उसने कहा, "सिर्फ़ सच्चा रहूँगा। बहादुर बनने में हाथ जलते हैं, सच बोलने में सिर्फ़ डाँट पड़ती है, और डाँट पट्टी से हल्की होती है।"
गली हँसी।
गुड्डू ने कहा, "फिर तो तू सबसे सस्ता आदमी हो गया।"
चिंटू ने कहा, "नहीं, सबसे महंगा। सच बोलने वाला अब मोहल्ले में एक ही है।"
और शबनम आपा ने गुमटी से बाहर आकर कहा, "बकवास बंद करो और चाय लो। ठंडी हो गई तो मैं दोबारा नहीं बनाऊँगी। मैं एक बात साफ़ कहती हूँ — आज रात के बाद मेरी गुमटी की चाय में कोई चीनी नहीं घटाएगा।"
रज़िया ने कहा, "कम डाली है, घटाई नहीं।"
"वही बात है," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ में जो था, वो पंद्रह साल से बंद था।
कुल्हड़ बँट गए। लालटेन के नीचे सब बैठ गए। उस्ताद अली बक्श भी आए, लाठी से नहीं, धीरे-धीरे पैर रखकर। उनके पीछे याकूब थे और याकूब के हाथ में एक छोटी पीतल की डिब्बी थी जिसे वो ऐसे दबाए हुए थे जैसे उसमें उनकी साँस रखी हो।
उस्ताद ने कुल्हड़ लिया, एक घूँट पिया, और फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैंने आज तक किसी से ये बात नहीं कही, क्योंकि मैं खुद इसे झेल नहीं पाता था। पर तू बेटा है, तुझे पता होना चाहिए।"
"बोलिए, उस्ताद।"
"पचास साल पहले हम जोड़ तोड़ते थे। मैं, इलियास, तेरे परदादा, याकूब का बाप। हमें लगता था कि हम दुनिया सुधार रहे हैं। किसी का घर बसता था और हमें लगता था कि ये हमने किया।" उन्होंने कुल्हड़ रखा। "और हमें ये नहीं दिखा कि हर बार हमारे साथ कहीं कुछ और मोटा हो रहा था। जब हम एक घर बसाते थे, तब कहीं कोई दूसरा घर टूटता था। और हम उसे संयोग कहते। हर बार। पचास साल तक संयोग। ये अब भी संयोग हो सकता है, अंकुश। पचास बार संयोग को संयोग नहीं कहते।"
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