The Mysterious Bell – Chapter 853
"क्या?"
"मैंने अभी सुना," मैंने कहा, "कि तेरे हाथ में जो काग़ज़ है, उसकी तारीख़ आज रात की है।"
बबलू की उँगलियाँ काग़ज़ पर कस गईं।
मैंने आगे कहा, "और मुझे यह भी पता है कि आज रात दफ़्तार बंद था। तो यह काग़ज़ किस दफ़्तार में बना? या तेरे साहब के कमरे में बना?"
अब बबलू हँसा नहीं।
वो उठा। उसने काग़ज़ मोड़ा और जेब में डाल दिया। फिर उसने अपनी चेन पकड़ी और उसे उँगली पर घुमाया।
"अंकुश," उसने कहा, "तू अभी छोटा है। तूने आज मुझे बहुत सुना दिया, पर तू एक बात नहीं समझता। यह झगड़ा काग़ज़ का नहीं है। यह झगड़ा वक़्त का है। तेरे पास वक़्त नहीं है, और साहब के पास बहुत है।"
"तो फिर तेरे साहब को इतनी जल्दी क्यों है?"
बबलू रुक गया।
यही बात मैं पूछना चाहता था। अगर उसके पास वक़्त है, तो वो रात में काग़ज़ क्यों बनवा रहा है? अगर वो जीत रहा है, तो वो इतनी जल्दी क्यों कर रहा है?
इसका जवाब बबलू के पास नहीं था। और उसके चेहरे पर जो पल भर के लिए दिखा, वो मैंने देखा।
डर।
बबलू को भी डर लग रहा था।
और ठीक उसी पल, पीछे से आवाज़ें आईं। मैंने पलटकर देखा।
टिंकू आगे आ रहा था, ताली बजा रहा था। पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। पाँचों ताली बजा रहे थे और एक साथ नारा लगा रहे थे, "आपा की गुमटी, आपा की गुमटी।"
चिंटू सबसे छोटा था, पर सबसे तेज़। वो बबलू के ठीक सामने आकर रुका और ऊपर देखने लगा।
"चाचा," उसने कहा।
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"आपका पान का पत्ता भी बोल रहा है," चिंटू ने कहा।
भीड़ में हँसी फूट पड़ी।
"क्या बोल रहा है?" बबलू ने पूछा, और उसका मुँह थोड़ा तिरछा हो गया।
"बोल रहा है कि आप झूठ बोल रहे हैं," चिंटू ने बड़े सीधे मुँह से कहा। "वो भी अंदर से लाल हो गया है, ठीक वैसे जैसे आपका काग़ज़।"
नारे तेज़ हो गए। रफ़ीक़ ने ताली के साथ पैर पटकना शुरू कर दिया और गुड्डू ने अपनी टाट की पोटली से एक काग़ज़ निकालकर हवा में लहरा दिया, जिस पर उसने पेंसिल से कुछ लिखा था — मैंने पढ़ा नहीं, पर भीड़ हँस पड़ी।
शबनम आपा की आँखों में अब आँसू नहीं थे। अब उनका जबड़ा कसा हुआ था। उन्होंने अपनी चिमटी उठाई, बेंच पर रखी और रज़िया का हाथ पकड़े खड़ी रहीं।
"सुन ले, बबलू," उन्होंने कहा। "मैं बीस दिन में नहीं जाऊँगी। और तू जब आएगा मशीन लेकर, तो मेरी गुमटी का चूल्हा जल रहा होगा। और मैं तेरे लिए भी एक कुल्हड़ चाय रखूँगी।"
भीड़ गरमा गई।
बबलू ने सबको देखा — बच्चों को, शबनम को, रज़िया को, और फिर मुझे।
वो मुड़ा और जाने लगा। गली के मुँह की तरफ़ बढ़ा, पाँच कदम चला, और फिर रुक गया।
मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ, क्योंकि मुझे पता था कि जब बबलू इस तरह रुकता है, तो उसके पास कोई बात होती है जो उसने अभी तक नहीं बोली।
वो पलटा।
और मुस्कुराया।
वो मुस्कान मुँह पर नहीं थी, वो आँखों में थी, और आँखों की मुस्कान सबसे बुरी होती है।
"आपा," उसने कहा, "एक बात बताना भूल गया था। साहब ने खास तौर पर पूछा था। कहने को कहा था कि शबनम आपा से जाकर कहना — बहन से मिलकर चाय कैसी लगी?"
गली में आधी हँसी रह गई और आधी हवा में अटक गई।
शबनम आपा के हाथ से रज़िया का हाथ छूट गया।
कौशल्या दादी ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिका दी, और वो टक की आवाज़ मुझे बहुत दूर तक सुनाई दी।
बबलू हँसा। एक बार। छोटी हँसी।
"आपा," उसने कहा, "साहब उस रात की सब बात जानते हैं। हर बात।" उसने अपनी जेब में रखे काग़ज़ पर हाथ फेरा। "यह झगड़ा काग़ज़ का है, यह मैंने कहा था ना? यह झगड़ा यह भी नहीं है कि किसकी ज़मीन है। यह झगड़ा इस बात का है कि साहब क्या जानते हैं — और तुम सब क्या जानते हो।"
"और तुम जो जानते हो," शबनम आपा ने कहा, आवाज़ बहुत धीमी, "वो?"
बबलू ने कुछ नहीं कहा।
वो मुड़ा और चला गया। गली के मुँह पर उसका स्कूटर खड़ा था। उसने किक मारी, इंजन खाँसा, और फिर वो निकल गया और उसके जाने के बाद सिर्फ़ धूल बची।
गली में लोग खड़े रह गए।
रज़िया ने शबनम आपा को बेंच पर बैठाया। शबनम आपा बैठीं और उन्होंने अपना मुँह हाथों में छिपा लिया। रज़िया ने उनके सिर पर हाथ रखा और फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस हाथ रखा रहने दिया।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
पीतल अब भी ठंडा था।
"सुन," मैंने धीरे से कहा, "तेरी बात सही थी। दो खाते हैं। एक मेरा, एक उसका। और आज रात उसके खाते में जो जमा हुआ, वो मेरी मेहनत से हुआ।"
घंटी हिली।
"अब?" उसने कहा।
"अब," मैंने कहा, "मुझे उसका खाता देखना है।"
घंटी कुछ देर चुप रही।
फिर बहुत धीरे हिली। और जो बोली, वो छोटा था, पर मुझे लगा कि उसने कमरे का सारा पीतल उतार दिया।
"रास्ता है," उसने कहा। "आसान नहीं।"
मैंने पीछे देखा। पीपल के नीचे कौशल्या दादी खड़ी थीं और उनकी लाठी की नोक ज़मीन पर टिकी थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर बस एक बार सिर हिलाया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने कैमरा उठाया और उसकी लाल बत्ती जल गई। उसने कुछ नहीं पूछा। उसे पूछने की ज़रूरत नहीं थी, वो मुझे पाँच साल से कम समय में पढ़ना सीख गई थी।
टिंकू ने मेरे पास आकर खड़े होकर कहा, "उस्ताद, कल सात बजे?"
"हाँ," मैंने कहा। "कल सात बजे।"
"और आज रात?"
मैंने घंटी को जेब में डाला।
"आज रात," मैंने कहा, "मैं उसका हिसाब देखने जा रहा हूँ जो मेरी मेहनत खा रहा है।"
॥
उस रात गुमटी के बाहर लालटेन जल रही थी।
वो पुरानी लालटेन थी, जिसका शीशा एक तरफ़ से चटका हुआ था और जिसकी लौ हवा में नाचती रहती थी। शबनम आपा ने उसे बेंच के पास वाले खूँटे पर टाँग दिया था और उसकी पीली रोशनी में गली की मिट्टी सोने जैसी दिख रही थी। गुमटी का चूल्हा जल रहा था और उस पर पीतल की केतली रखी थी, जिसकी ढक्कन से भाप ऐसे निकल रही थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी गुनगुना रहा हो।
मैं बेंच के एक सिरे पर बैठा था। मेरे हाथ में चाय का कुल्हड़ था और वो ठंडा हो रहा था, क्योंकि मैं एक बात सोच रहा था और जब मैं सोचता हूँ तो चाय ठंडी हो जाती है। ये मेरी सबसे पुरानी और सबसे बेकार आदत है।
गुमटी के अंदर चूल्हे के पास दो लोग खड़े थे।
शबनम आपा और रज़िया।
पंद्रह साल बाद।
शबनम आपा के हाथ में लोहे की चिमटी थी और रज़िया के हाथ में कुल्हड़ों की ढेरी। दोनों चुप थीं, पर उस चुप्पी में कोई डर नहीं था। वो चुप्पी उस तरह की थी जैसे लंबी बारिश के बाद खिड़की खोल दी जाए और हवा खुद बात करने लगे।
रज़िया ने चाय के प्याले में चीनी डाली।
फिर वो रुकी।
उसने प्याले में झाँका, फिर चम्मच से हल्का-सा हिलाया, और फिर शबनम आपा ने बिना देखे कहा, "ज़्यादा डाल दिया।"
रज़िया हँसी।
"नहीं," उसने कहा, "इस बार कम डाली।"
"कम?"
"हाँ। पहले मैं हमेशा ज़्यादा डालती थी, तुझे पता है ना। तू कहती थी कि तेरी चाय में चीनी ऐसे घुली है जैसे गुड़।"
शबनम आपा ने चम्मच रख दिया।
"तो आज क्यों कम?"
रज़िया ने कुल्हड़ उठाया, दोनों हाथों में लिया, और भाप उसके चेहरे पर लगी। उसने आँखें झपककर कहा, "क्योंकि पंद्रह साल पहले तूने कहा था, और मैंने उस दिन बहस कर ली थी। अब दोबारा नहीं करनी।"
शबनम आपा कुछ नहीं बोलीं।
उन्होंने बस हाथ बढ़ाया और रज़िया का एक हाथ पकड़ कर अपने दोनों हाथों में ले लिया। और मुझे क्या पता, वो चाय का प्याला था या आँसू, पर उस रोशनी में दोनों का एक ही रंग था।
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