The Mysterious Bell – Chapter 845
घंटी बजी।
बजती रही।
बजती रही।
कोई नहीं उठाया।
रज़िया आपा ने रिसीवर अपने माथे से लगा लिया और आँखें बंद कर लीं। और दृश्य में मुझे वो दिखा जो मुझे नहीं दिखना चाहिए था — उस रात, उसी वक़्त, गली में, हमारे घर की रसोई में, माँ ने टेलीफ़ोन की घंटी सुनी थी और उन्होंने अपना हाथ उस पर रख दिया था। बस हाथ रख दिया था।
और घंटी बजती रही।
फिर दृश्य बदला।
और ये वो दृश्य था जिसके लिए मैं तैयार नहीं था।
रात। हमारी गली। गुमटी का शटर बंद।
रज़िया आपा गुमटी के सामने खड़ी थीं। प्लास्टर वाली टाँग। एक हाथ में बैग, और दूसरे हाथ में एक पुराना मिट्टी का कटोरा — वही कटोरा जिसमें उन्होंने एक बार ताज़ा दूध भरकर माँ के लिए लाया था, पंद्रह साल पहले।
उन्होंने शटर पर हाथ रखा।
फिर उन्होंने उस शटर पर दो बार धीरे से थपकाया।
अंदर से आवाज़ आई — चूल्हा बुझाने की, बर्तन रखने की।
और फिर अंदर से शबनम आपा की आवाज़ आई।
"कौन?"
रज़िया आपा ने कुछ नहीं कहा।
वो बस खड़ी रहीं। उनका मुँह खुला था। और उनके हाथ से कटोरा काँप रहा था।
अंदर से फिर आवाज़ आई। "कौन है? बोलो।"
और रज़िया आपा ने कहा, बहुत धीमे, बहुत छोटे से, "दीदी।"
उसके बाद बहुत लंबा वक़्त चुप रहा। इतना लंबा कि मैं सुन सकता था — मैं सच में सुन सकता था — अंदर शबनम का एक हाथ शटर की तरफ़ बढ़ना। और फिर रुक जाना।
और फिर अंदर से आवाज़ आई।
"जा। मैं नहीं बोलूँगी।"
बस इतना।
तीन शब्द।
और रज़िया आपा जगह से हिलीं नहीं। वो वहीं खड़ी रहीं, एक हाथ शटर पर, प्लास्टर वाली टाँग पर सारा वज़न, और उन्होंने एक बार भी दोबारा दस्तक नहीं दी।
फिर वो पलटीं और चलीं।
और जाते वक़्त उन्होंने वो कटोरा नाली के किनारे रख दिया।
फिर दृश्य बदला।
अब एक छोटा कमरा था, जिसकी खिड़की से रेल की पटरी दिख रही थी। रज़िया आपा मेज़ पर झुकी हुई थीं और लिख रही थीं। तीन लिफ़ाफ़े सामने रखे थे। उन्होंने पहला लिफ़ाफ़ा भरा। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
फिर उन्होंने तीनों उठाए, खिड़की खोली और नीचे फेंक दिए।
और फिर वो बैठ गईं और बहुत देर तक बस अपने हाथों को देखती रहीं।
फिर एक आख़िरी दृश्य।
बारिश। रज़िया आपा एक स्टेशन पर खड़ी हैं। उनका प्लास्टर उतर चुका है, पर वो अब भी लंगड़ाती हैं। सामने ट्रेन आ रही है। और उनके हाथ में एक टूटा हुआ बस टिकट है, जिसकी पीठ पर कोई लिख रहा है — माँ।
और धुँधला होते-होते मैंने उनका मुँह सुना, जो किसी से नहीं, खुद से कह रहा था, "मैंने तीन बार सुना। मैंने तीन बार दरवाज़ा खटखटाया। तीन बार। मुझे बस चौथी बार नहीं सुनना।"
लालटेन की रोशनी फिर पीली हो गई।
काई लौट आई। पत्थर लौट आया। दीवार लौट आई।
और शबनम आपा वहीं खड़ी थीं।
उनके दोनों हाथ अब भी खुले थे। लेकिन उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे — दोनों से — और वो ख़ामोश थे, बिना आवाज़, जैसे शरीर भूल गया हो कि रोना कैसे होता है। उनका मुँह खुला था और उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। और फिर उन्होंने अपना हाथ अपने मुँह पर रखा और पलट गईं, दीवार की तरफ़, और उनकी कमर झुक गई।
और मैं कुछ नहीं बोला।
मैं जानता हूँ कि तुम सोच रहे होगे — अंकुश, यही तो वक़्त था। तू बोलता, कुछ कहता, "आपा वो ग़लती थी, वो डर था" कहता।
नहीं।
उस वक़्त बोलना सब बिगाड़ देता। मैंने ये सीखा है — बहुत महँगा सीखा है — कि इंसान जब अपने सबसे गहरे दर्द से पहली बार मिलता है, तो उसे शब्द नहीं चाहिए। उसे बस यह चाहिए कि कोई वहाँ खड़ा रहे और चला न जाए।
तो मैं चुप खड़ा रहा।
मैंने पीछे मुड़कर गुमटी के टब के पास रखा स्टील का गिलास उठाया। पानी का नल खोला। गिलास भरा। और पलटकर उनके पास रख दिया — यह कहकर कुछ नहीं, बस हाथ बढ़ाकर।
शबनम आपा ने बहुत देर तक उस गिलास की तरफ़ देखा। जैसे समझ नहीं आ रहा हो कि ये क्या है।
फिर उन्होंने दोनों हाथों से गिलास पकड़ा और पी लिया। पूरा।
और फिर उन्होंने गिलास मेरे हाथ में वापस रखा और बिना एक शब्द कहे गुमटी के अंदर चली गईं।
मैं बाहर खड़ा रहा।
गुमटी के अंदर बत्ती जल गई। मैंने उन्हें टेबल के पास खींची लकड़ी की स्टूल पर बैठते देखा। उन्होंने अपना सिर छत की तरफ़ उठाया।
और बस देखती रहीं।
बहुत देर।
छत पर पुरानी टिन की चादर है, जिस पर पानी की लकीरें हैं। मुझे नहीं पता वो क्या देख रही थीं। मैं नहीं जानता कि छत पर सच में कुछ था या वो अपने अंदर कुछ देख रही थीं।
मैं बाहर खड़ा रहा और मैंने अपनी घंटी को जेब में वापस नहीं रखा। मैंने उसे हाथ में पकड़े रखा।
गुमटी के आगे, नाली के उस पार, हमारे बच्चे बैठे थे।
मुझे पता था। मुझे शुरू से पता था।
चिंटू ने अपनी चप्पल उतारी थी, रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा सामने रख दिया था, सानिया अपनी लाल कवर वाली कॉपी खोले बैठी थी, और गुड्डू — गुड्डू अपनी टाट के टुकड़े को सीने से चिपकाए बैठा था, जैसे कहीं कोई आवाज़ आए तो वो उसे लिख लेगा।
और टिंकू सबसे आगे था। दबे पाँव। मुँह पर हाथ।
जब शबनम आपा ने पानी पिया और अंदर जाकर बैठ गईं, तब टिंकू ने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। और उसने देखा कि चारों अपनी-अपनी जगह पर जमे हुए हैं, आँखें बड़ी करके, एक शब्द नहीं।
तो टिंकू ने अपने दोनों हाथ हवा में उठाए और पूरी टोली को पीछे धकेलना शुरू किया।
बिना आवाज़।
बस होंठों से — "चलो। चलो हटो। उठो।"
चिंटू ने हाथ हिलाया — "अभी तो कुछ हुआ नहीं।"
और टिंकू ने अपना जला हुआ हाथ ऊपर उठाया। वही हाथ जिस पर मैंने मरहम लगाया था। और उसने होंठों से बहुत धीरे, बहुत साफ़, इतना कहा कि मैं सुन सकूँ —
"ये वक़्त गवाही का नहीं है। ये दुआ का है।"
और बच्चे उठ खड़े हुए।
पाँचों — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — गुमटी के पीछे से निकले, नाली का पुल पार किया और अंधेरे में घुल गए।
सानिया जाते-जाते रुकी और उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं।
मैंने सिर हल्का सा हिलाया। बस इतना कि — तुमने ठीक किया।
वो चली गई।
और मुझे लगा कि अब मुझे भी जाना चाहिए। मैंने लालटेन उठाई।
तभी गुमटी के अंदर से आवाज़ आई।
"अंदर आ।"
मैं रुक गया।
"बैठ।"
मैंने गुमटी का किवाड़ धीरे से खोला और अंदर गया। अंदर घुटन थी। गरम तवे की पुरानी गंध, चाय की पत्ती की गंध, और मिट्टी के तेल की हल्की बू।
शबनम आपा स्टूल पर बैठी थीं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया हुआ था और बालों को कान के पीछे किया हुआ था — जैसे किसी ने खुद को सँभाल लिया हो, सिर्फ़ इसलिए कि अब उन्हें बोलना है।
उन्होंने मेरे सामने वाली स्टूल की तरफ़ इशारा किया।
मैं बैठ गया।
वो कुछ देर चुप बैठी रहीं। फिर बोलीं, "वो टाँग पर प्लास्टर था।"
"हाँ," मैंने कहा।
"मुझे नहीं पता था।"
"हाँ।"
"मुझे नहीं पता था," उन्होंने दोबारा कहा, और इस बार उनकी आवाज़ बैठ गई हॉल में।
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"तू झूठ क्यों बोल रहा है?" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में अचानक वो पुरानी शबनम लौट आई — कड़क, तेज़। "तुझे क्या पता। तू तब कहाँ था। तू तो —"
वो रुक गईं।
फिर धीमे से बोलीं, "तू तो तब पैदा भी नहीं हुआ था। ठीक है, तू नौ साल का था, क्या पता।"
"चालू तो था," मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और फिर, पहली बार पूरी रात में, उनके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो हँसी के बहुत करीब था। बहुत करीब।
"हाँ," उन्होंने कहा। "तू चालू था। तू हमेशा चालू था।"
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