The Mysterious Bell – Chapter 844
शबनम आपा की आँखें रज़िया आपा पर टिक गईं। रज़िया आपा ने भी उन्हें देखा। और उनके चेहरे पर पहली बार डर आया — वो डर जो कोई औरत तब दिखाती है जब उसका छुपाया हुआ कोई बाहर आने वाला हो।
"तू क्या दिखाएगा?" रज़िया आपा ने मुझसे पूछा।
"मैं नहीं जानता," मैंने सच कहा। "मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि जो आपने छुपाया है, वो आपकी दीदी नहीं जानती।"
शबनम आपा के हाथ का सहारा छूट गया। उनके हाथ में जो लोहे की चिमटी थी — वो गुमटी से साथ लाई थीं, आदत से — वो चिमटी उनके हाथ से छन से गिर गई और पत्थर पर गिरकर एक तेज़ आवाज़ हुई।
वो आवाज़ पूरी गली में गई।
और शबनम आपा वहीं खड़ी रह गईं, दोनों हाथ खुले, और चिमटी ज़मीन पर पड़ी थी।
और मेरी जेब में घंटी, बिना बजे, ज़ोर से गरम हो गई — जैसे किसी ने उसे अपनी हथेली में ले लिया हो।
और दूर, पीछे के प्लॉट से, सात बजे वाली मशीन की पहली आवाज़ आई।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। सुबह हो रही थी।
और मुझे लगा कि आज के बाद इस गली में एक बात कभी नहीं होगी — कि कोई किसी से एक शब्द नहीं कहेगा और वो शब्द पंद्रह साल बैठा नहीं रहेगा।
॥
चिमटी पत्थर पर गिरी और उसकी आवाज़ गली के आख़िरी मोड़ तक चली गई। शबनम आपा वहीं खड़ी रह गईं, दोनों हाथ खुले, जैसे किसी ने उनकी मुट्ठी अंदर से खोल दी हो।
और मेरी जेब में घंटी गरम थी। बिना बजे। जैसे किसी ने उसे अपनी हथेली में दबा लिया हो।
फिर पीछे के प्लॉट से मशीन ने पूरा ज़ोर लगाया। एक लंबी, भारी, लोहे की रगड़ — जैसे कोई पहाड़ को घसीट रहा हो।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। सुबह हो रही थी।
और मुझे लगा कि आज के बाद इस गली में एक बात कभी नहीं होगी — कि कोई किसी से एक शब्द न कहे और वो शब्द पंद्रह साल बैठा न रहे।
वो दिन मुझे आज तक याद है, और याद रहेगा, क्योंकि उस दिन हम सबने कुछ नहीं किया।
मशीन सात बजे से दस बजे तक चली। दस बजे मनोज अपने काग़ज़ों का बंडल लेकर आया, क्लिपबोर्ड पर पुराना नोटिस रखकर उसने हस्ताक्षर किए, दुबे अंकल ने उसके सामने अपनी कुर्सी नहीं छोड़ी, और हम सब पीपल के नीचे खड़े रहे — चुप। जब मशीन रुकी, तो प्लॉट की मिट्टी से उड़ी धूल पूरी गली में बैठ गई, और मैंने अपनी दुकान की मेज़ पर उँगली रखी तो उँगली सफ़ेद निकली।
माँ ने दोपहर में बैसाखी के सहारे खड़े होकर तीन थालियाँ भरकर खाना बाँटा। किसी ने कुछ नहीं कहा। भूख भी उस दिन चुप थी।
शाम छह बजे पीपल के नीचे कौशल्या दादी ने कहा कि आज कोई सभा नहीं होगी। आज बस हर घर अपना दरवाज़ा खोलकर सोएगा, और कल जो होगा, सब मिलकर देखेंगे।
और शबनम आपा ने पूरे दिन एक बार भी गुमटी का चूल्हा नहीं जलाया। उनकी गुमटी का शटर आधा खुला रहा — न बंद, न खुला। आधा, ठीक वैसे ही जैसे वो खुद।
रात नौ बजे मैं गुमटी के पीछे गया।
वहाँ पुराना काई लगा पत्थर है, वही जिसके पास बक्से पड़े रहते थे, जहाँ से बच्चों को रज़िया आपा का बैग मिला था। मैंने अपनी जेब से लालटेन निकाली, बैटरी वाली छोटी लालटेन, और उसे उस पत्थर पर रख दिया। पीली रोशनी उठी और दीवार पर चढ़ गई।
फिर मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो अब भी गरम थी। गरम नहीं — गुनगुनी। जैसे किसी ने उसे दिन भर सीने से लगाकर रखा हो।
मैंने उसे लालटेन के पास, उसी पत्थर पर, धीरे से रख दिया।
और मैंने कहा, "शबनम आपा, अब भी वक़्त है। अगर आप नहीं चाहतीं, तो मैं इस घंटी को उठाकर वापस जेब में रख दूँगा, और आज की रात कुछ नहीं होगा। कुछ नहीं। कोई परत नहीं, कोई दृश्य नहीं।"
शबनम आपा लालटेन के उस पार खड़ी थीं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ था, हाथ दोनों तरफ़ लटके हुए। उनके हाथ अब नहीं काँप रहे थे। यह मुझे सबसे ज़्यादा डरा गया।
"क्या दिखेगा?" उन्होंने पूछा।
"मुझे नहीं पता," मैंने सच कहा। "परत आपको वो दिखाएगी जो रज़िया आपा ने सबसे गहरा छुपाया है। मैं उसको छाँट नहीं सकता। मैं सिर्फ़ दरवाज़ा खोल सकता हूँ।"
"और अगर वो मुझे देखना न चाहे?" उन्होंने पूछा।
"तो वो भी दिखेगा," मैंने कहा।
शबनम आपा ने आँखें बंद कीं। एक लंबी साँस। फिर उन्होंने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा — और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो आदमी के चेहरे पर सिर्फ़ एक बार आती है। सच जानने की भूख, और उससे ज़्यादा तेज़, सच से बचने की थकान।
"कर," उन्होंने कहा।
मैंने घंटी को हाथ में लिया।
उम्मीद है तुम्हें याद होगा कि मेरे पास अट्ठानवे अंक बचे थे। चालीस अंक की एक परत। मेरे पास दो बार सोचने का वक़्त था।
मैंने एक बार भी नहीं सोचा।
क्योंकि सच ये है — मैं उस वक़्त कुछ और नहीं सोच रहा था। मैं बस ये सोच रहा था कि अगर मैंने इन दो बहनों को जोड़ने के लिए ये चालीस अंक नहीं लगाए, तो मैं इन अंकों को किस मुँह से अपने पास रखूँगा?
मैंने घंटी को दोनों हाथों में लिया और धीरे से बोला, "चालीस अंक। छिपा दर्द।"
घंटी ने एक बार बहुत हल्की आवाज़ की — जैसे कोई दूर किसी कमरे में बंद दरवाज़े को खोल रहा हो — और फिर वो चुप हो गई।
और लालटेन की रोशनी हरी पड़ गई।
मैं सच कह रहा हूँ। पीली नहीं, हरी। बुझी हुई हरी। जैसे किसी पुराने अस्पताल की ट्यूबलाइट।
और गुमटी के पीछे वो पत्थर, वो काई, वो दीवार — सब हट गए।
पहले मुझे ट्यूबलाइट दिखी। झपकती हुई।
फिर आवाज़ आई — पानी के टपकने की। टप। टप। टप। जैसे कोई स्टैंड पर रखा गिलास हो जिसमें कोई हर पल एक बूँद गिरा रहा हो।
रज़िया आपा बैठी थीं।
उनकी उम्र तब पैंतीस के आसपास रही होगी, पर चेहरा पचास का लग रहा था। दुबली। पीछे की दीवार से सटकर बैठी थीं, दोनों हाथ गोद में। और उनकी टाँग — दाहिनी टाँग — पूरी प्लास्टर में थी, और प्लास्टर पर किसी ने पेंसिल से एक छोटा सा फूल बना दिया था। किसी बच्चे ने। किसी और का बच्चा।
वो अस्पताल के गलियारे की आख़िरी बेंच पर बैठी थीं। सामने स्ट्रेचरों की कतार थी। दीवार पर सफ़ेद पोस्टर चिपके थे, जिनके कोने उखड़ रहे थे।
फिर दृश्य बदला।
अब वो उसी गलियारे में खड़ी थीं, अपने हाथ में एक काग़ज़ पकड़े — अस्पताल की परची — और सामने की खिड़की पर एक आदमी बैठा था जो बहुत धीरे बोल रहा था। रज़िया आपा ने अपनी जेब में हाथ डाला। फिर दूसरी जेब में। फिर ब्लाउज़ के नीचे, पल्लू के अंदर। और उनका चेहरा — मैं वो चेहरा कभी नहीं भूलूँगा — वो चेहरा जो अब भी उम्मीद कर रहा था कि कहीं तो कुछ बचा होगा।
नहीं बचा था।
उन्होंने परची वापस खिड़की पर रख दी और चली गईं।
फिर दृश्य बदला।
अब बस स्टैंड था। रात। एक बस खड़ी थी, इंजन गरम, धुआँ उठ रहा था। रज़िया आपा प्लास्टर वाली टाँग के सहारे लंगड़ाते हुए दौड़ रही थीं। एक हाथ में बैग, दूसरा हाथ हवा में — जैसे कोई तांगेवाला रोक रही हों।
बस का दरवाज़ा बंद हुआ।
बस निकल गई।
और वो वहीं एक खंभे के पास खड़ी रह गईं, और मैंने उन्हें पहली बार रोते देखा। ऊँची आवाज़ में नहीं। बस आँसू नहीं रुक रहे थे और मुँह से एक भी आवाज़ नहीं निकल रही थी। उन्होंने अपना हाथ अपने मुँह पर रखा और दीवार की तरफ़ मुँह कर लिया। जैसे दुनिया से कह रही हों — मुझे न देखो।
फिर दृश्य बदला।
अब वो एक टेलीफ़ोन बूथ में थीं। पुराना, हरा, टूटा हुआ बूथ। उन्होंने सिक्का डाला। नंबर घुमाया। और उनका चेहरा — उनका चेहरा अब भी उसी उम्मीद से भरा था।
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