The Mysterious Bell – Chapter 843
"मुझे माँ याद आ रही है," काजल ने कहा, रोते हुए। "माँ उस दिन वहाँ थीं, भैया। और माँ ने कहा — उसे अकेला छोड़ दो। मेरी माँ ने कहा। और मैं उसी अस्पताल में थी।"
"अब रो ले," मीरा ने कहा। "रोने से सच टूटता नहीं, साफ़ होता है।"
कौशल्या दादी ने अपना हाथ उठाया और सबको बैठने का इशारा किया। और तभी शबनम आपा उठीं। वो सीधी रज़िया आपा के सामने गईं।
"तुझे मुझे बताना था," शबनम आपा ने कहा। उनकी आवाज़ में वो पुरानी चिमटी जैसी कड़क थी। "तू अस्पताल में पड़ी थी। एक महीना। तूने कहा नहीं। एक फ़ोन नहीं किया। तूने झूठ क्यों बोला?"
रज़िया आपा का चेहरा लाल हो गया। वो उठीं।
"मैंने झूठ नहीं बोला," उन्होंने कहा। "और झूठ तो चीज़ बताने से बोला जाता है। तूने पूछा ही नहीं। किसी ने नहीं पूछा।"
"तूने कहा नहीं—"
"मैं क्यों कहती?" रज़िया आपा की आवाज़ ऊँची हो गई। "तूने फ़ोन पर कह दिया था — मत आ। अब किस हक़ से सवाल करती है?"
शबनम आपा ठिठक गईं।
"मैंने वो नहीं कहा था।"
"तूने कहा था," रज़िया आपा ने कहा, और उनका हाथ काँप रहा था। "तीसरे दिन। तूने फ़ोन किया। माँ की दवा के लिए। मैंने कहा मेरे पास पैसे नहीं हैं, अभी नहीं हैं। और तूने कहा — तो फिर मत आ। जब पैसे आएँ तब आ जाना। ये तेरे शब्द थे।"
शबनम आपा ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।
"मैंने वो गुस्से में कहा था," उन्होंने धीरे से कहा। "उस दिन गुमटी पर तीन बजे की भीड़ थी, माँ की दवा का हिसाब बिगड़ा हुआ था, और मैं बस… मैं बस नहीं सोच पाई।"
"और उसके बाद तूने रिश्तेदारों के सामने क्या कहा था?" रज़िया आपा ने कहा। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ साफ़ थी। "जब सब इकट्ठे थे, जब माँ की हालत बिगड़ी थी, तब किसी ने पूछा रज़िया को बुला लो, और तूने कहा — रज़िया को बुलाओगी तो वो दवा के पैसे माँगेगी। तूने कहा था। सबके सामने।"
शबनम आपा ने अपना सिर झुका लिया।
"वो बात मेरे ससुराल पहुँची," रज़िया आपा ने कहा। "मेरे आदमी ने मुझसे पूछा — तेरी बहन तुझे ऐसा कहती है? मैंने कहा नहीं। उसने कहा तो फिर तू अपनी माँ के लिए पैसे क्यों नहीं देती। और मैंने कहा मेरे पास नहीं हैं। और उसके बाद वो बात वहीं से शुरू हुई जो कभी खत्म नहीं हुई।"
"रज़िया—"
"मेरा घर उस शब्द से टूटा, दीदी," रज़िया आपा ने कहा। "एक शब्द से। तूने सोचा होगा उस दिन बात बस गई। बात गई नहीं। बात मेरे साथ चली आई। पंद्रह साल।"
शबनम आपा ने उनका हाथ पकड़ना चाहा। रज़िया आपा ने हाथ पीछे खींच लिया। और वो फिर से बैठ गईं और अपनी आँखें पोंछने लगीं।
और मैं वहीं खड़ा सब देख रहा था — और मुझे लग रहा था कि ये सब मेरे सामने हो रहा है और मैं कुछ नहीं कर सकता। यही तो सबसे बड़ी बात थी। और यही सबसे मुश्किल। मैंने सोचा था कि सच बोल देना ही काफ़ी है। सच बोल दिया। और अब दो औरतें एक-दूसरे के सामने ऐसी खड़ी थीं जैसे पंद्रह साल से वो एक ही कमरे में बंद थीं और किसी ने दरवाज़ा खोल दिया।
तभी टिंकू आगे आया।
"बीच में बोलने दो," वो बोला। "हम लोग शांति समिति हैं।"
"क्या?" शबनम आपा ने कहा।
"शांति समिति," सानिया ने कहा, और उसने अपनी कॉपी खोली जिसमें उसने सब कुछ लिखा था। "पाँच सदस्य। अध्यक्ष टिंकू। सचिव मैं।"
"और मैं?" चिंटू ने कहा।
"तू मध्यस्थ है," गुड्डू ने कहा।
"मध्यस्थ क्या होता है?"
"बीच वाला।"
"अच्छा," चिंटू ने कहा, और वो दोनों के बीच में खड़ा हो गया, बिल्कुल बीच में, हाथ जोड़कर। "तो मैं बीच वाला हूँ। मुझे बस पद का नाम नहीं पता था। मेरा काम ये है कि जब आप दोनों चिल्लाएँ तो मैं हाथ जोड़कर कहूँ, ये बात बाद में।"
रफ़ीक़ ने अपनी फटी चप्पल उठाकर ज़मीन पर पटकी। "और मैं हड़ताल पर हूँ जब तक दोनों एक-दूसरे की बात नहीं सुनतीं।"
"हड़ताल क्यों?" टिंकू ने कहा।
"क्योंकि हम पाँच जासूस हैं और आज हमें कोई हत्या नहीं, कोई चोरी नहीं मिली। हमें दो बहनें मिलीं। और वो हमारी सबसे मुश्किल केस हैं।"
शबनम आपा ने उन बच्चों की तरफ़ देखा और उनके चेहरे पर पहली बार कुछ ऐसा आया जो गुस्सा नहीं था।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "तू कहता है सुनूँ?"
"हम कहते हैं एक-एक करके बोलिए," सानिया ने कहा, कॉपी खोलकर, पेंसिल तैयार। "मैं लिखूँगी। जो बोलेगा वो लिखा जाएगा और जो लिखा जाएगा वो मिटाया नहीं जाएगा।"
"ये तूने कहाँ से सीखा?" मैंने पूछा।
"दुबे अंकल की कॉपी से," उसने कहा।
और मैं हँस पड़ा। पहली बार उस सुबह। और मेरे साथ कुछ और लोग भी हँस पड़े। और उस हँसी में कुछ ऐसा था जिसने हवा को थोड़ा हल्का कर दिया।
पर बात खत्म नहीं हुई थी। बात अब भी वहीं खड़ी थी।
मैं चबूतरी पर बैठ गया। सच कहूँ तो मेरे पैर नहीं लग रहे थे। दो रात से मैं ठीक से सोया नहीं था, और उस सुबह मैंने अपनी आवाज़ में वो पूरा दृश्य बोला था जो मैंने अपनी आँखों से जिया था। मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे भूख भी नहीं लग रही थी।
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो अब गरम थी, जैसे किसी ने उसे धूप में रख दिया हो।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "ये जो मैंने किया, ये ठीक था?"
"तूने सच दिया," उसने कहा। "सच देने से दर्द घटता नहीं। सच देने से दर्द सामने आता है।"
"तो फिर ये क्या हो रहा है?"
घंटी कुछ देर चुप रही।
"अब बात मत करवा," उसने कहा। "अब दर्द दिखा।"
मैंने सिर उठाया।
शबनम आपा अभी भी चबूतरी के किनारे खड़ी थीं, और उनके हाथ में वो सफ़ेद पोटली थी। रज़िया आपा उनसे चार कदम दूर बैठी थीं, और उनके बीच में वो चार कदम थे जो पंद्रह साल में किसी ने नहीं मापे थे।
"शबनम आपा," मैंने कहा।
"हूँ।"
"एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"आप उस दिन उस पोटली में क्या लेकर आई थीं?"
शबनम आपा ने पोटली की तरफ़ देखा। उनका हाथ फिर कसा।
"यही," उन्होंने कहा। "जो पंद्रह साल से बंद है।"
"और आपने अंदर क्यों नहीं दिया?"
"क्योंकि डर लगा।" उन्होंने कहा। "क्योंकि अगर मैं अंदर जाती, तो मुझे ये कहना पड़ता कि मैंने वो शब्द कहा था जिससे तेरा घर टूटा। और मैं वो कह नहीं सकती थी। तब नहीं कह सकी।"
"और अब?"
"अब भी नहीं कह सकती," उन्होंने कहा। "ये तो तूने बोल दिया। और तूने बोल दिया तो अब मुझे ऐसा लग रहा है… जैसे मेरा सारा डर बेकार था। जो बात मैं पंद्रह साल नहीं कह पाई, वो तूने दो मिनट में कह दी।"
"मैंने कह दी, पर आपको सुननी पड़ी," मैंने कहा। "और उस सुनने में जो आपके अंदर हुआ, वो मैं नहीं कर सकता।"
तभी मैंने वो किया जो मुझे करना था। और मुझे पता था कि ये सही है, क्योंकि घंटी ने मुझे ठीक उसी वक़्त रोका नहीं। उसने बस एक बार हल्की आवाज़ की, जैसे कोई दूर से कोई दरवाज़ा बंद कर रहा हो।
"शबनम आपा," मैंने कहा। "मैं आपको एक चीज़ दिखा सकता हूँ।"
"क्या?"
"रज़िया आपा का छिपा हुआ दर्द," मैंने कहा। "एक झलक। एक बार। मेरे पास एक परत है, चालीस अंक की। उसमें मैं सामने वाले का छुपाया हुआ दर्द देख सकता हूँ, और दिखा भी सकता हूँ। पर ये होगा सिर्फ़ तब, जब आप सच में जानना चाहेंगी।"
शबनम आपा एक कदम पीछे हुईं।
"मतलब?"
"मतलब ये कि मैं आपको वो दिखा सकता हूँ जो रज़िया आपा ने पंद्रह साल इस गली में किसी को नहीं बताया," मैंने कहा। "पर मैं आपको बता दूँ — ये मुफ़्त नहीं है। इसकी कीमत चालीस अंक हैं, और उससे बड़ी कीमत ये है कि जो आप देखेंगी, वो आपको उसी वक़्त जीना पड़ेगा। वो आपकी आँखों में बैठ जाएगा। और उसके बाद आप वो भूल नहीं पाएँगी। कभी नहीं।"
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