The Mysterious Bell842 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 842

7 min read November 5, 2026

"उस दिन मैं गलियारे में गई थी," माँ ने कहा। "मेरा अपना प्लास्टर था, मैं नर्स के सहारे चल रही थी। और मैंने देखा, वहाँ एक औरत बैठी है। उसका हाथ बँधा हुआ था, उसके कपड़े पर धूल थी, और वो बार-बार 'माँ' कह रही थी। मैंने सुना और मैंने मुँह फेर लिया।"

"माँ—" काजल ने कहा।

"सुन ले पहले," माँ ने कहा। "मैंने मुँह इसलिए नहीं फेरा कि मैं उसे नहीं जानती थी। मैंने मुँह इसलिए फेरा कि उस वक़्त मेरे अंदर भी वही डर बैठा था जो उसके अंदर था — कि कोई मेरे पास आएगा और पूछेगा, तेरी बेटी क्यों नहीं आई। और मैं जवाब नहीं दे पाऊँगी।"

रज़िया आपा की आँखें भरी हुई थीं, पर वो बैठी हुई थीं, खड़ी नहीं हुईं।

"और शबनम," माँ ने कहा, "मैंने तेरे बारे में भी एक बात कही थी। मैंने कहा था कि रज़िया किसी से नहीं बोलेगी। मैंने वो बात उसे बचाने के लिए नहीं कही थी। मैंने वो बात अपनी जगह बनाने के लिए कही थी। ताकि कोई यह न पूछे कि इस पूरी गली में कौन था जिसने उसकी खबर नहीं ली।"

मेरी माँ ने आज पहली बार अपनी साड़ी से आँखें पोंछीं।

और मैंने देखा कि पीपल के नीचे बैठे कई लोगों ने अपने सिर झुका लिए।

फिर रज़िया आपा उठीं। उन्होंने रसीदें उठाईं — वो आठ रसीदें, जो मीरा ने सँभालकर मेज़ पर रखी थीं।

"ये आठ रसीदें झूठ नहीं बोलतीं," रज़िया ने कहा। "मैं तीन बार दवा लेकर आई थी। हर बार ताला। मैं गुमटी के बाहर खड़ी रही, मैंने देखा दीदी अंदर थीं, और मैं चली गई। मैंने अपना हाथ भी नहीं बढ़ाया। ये भी सच है।"

शबनम आपा ने दरवाज़े पर ही अपना हाथ पोटली पर कस लिया।

मैं उठा।

"अब मेरी बात सुनो," मैंने कहा। "मैंने आज दोपहर एक परत खोली है। साठ अंक की। मैंने पंद्रह साल पुराना वो गलियारा अपनी आँखों से देखा है। पूरा। और मैं उसे सबके सामने अभी नहीं बोलूँगा।"

सन्नाटा और गहरा हो गया।

"क्यों नहीं?" किसी ने पीछे से कहा।

"क्योंकि वो मेरा दृश्य नहीं है," मैंने कहा। "वो दो बहनों का है। मैंने उसे इस तरह खोला है जैसे कोई किसी के घर का दरवाज़ा ज़ोर से खोल दे। और मुझे लगता है कि अगर मैं आज उसे खुले मंच पर बोल दूँगा, तो सच बोलूँगा, पर टुकड़े-टुकड़े में। और सच को टुकड़ों में नहीं बोलना चाहिए।"

मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।

"कल सुबह छह बजे यहाँ," मैंने कहा। "आप सबसे पहले सुनेंगी। अकेली। और अगर सुनने के बाद आप कहेंगी कि इसे सभा में बोलो, तो मैं उसी मिनट बोलूँगा। औऱ अगर आप कहेंगी छोड़ दो, तो ये मेरे सीने में बंद रहेगा। मेरी परत है, आपका दर्द है।"

शबनम आपा कुछ देर चुप खड़ी रहीं।

फिर उन्होंने कहा, "छह बजे।"

"छह बजे," मैंने कहा।

"पर एक बात," उन्होंने कहा। "मैं तेरी बात सुनूँगी, तू मेरा सवाल सुन। तू उस दिन वहाँ था?"

"मैं वहाँ नहीं था," मैंने कहा। "पर मैंने वो दिन देखा है। और अब वो दिन मेरे अंदर है, जैसे कोई चीज़ अंदर आकर बैठ गई हो। और मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा — मुझे उस दिन से गुस्सा आ रहा है।"

"किस पर?"

"सब पर," मैंने कहा। "आप पर, माँ पर, अपने आप पर। क्योंकि उस गलियारे में कोई एक भी ऐसा नहीं था जो रुककर बैठ जाता।"

शबनम आपा के हाथ में पोटली थी, और उस पोटली को उन्होंने दोनों हाथों से सीने से लगा लिया।

और सभा उस रात वहीं टल गई।

रात नौ बजे लोग उठने लगे। कौशल्या दादी ने किसी को कुछ पूछने नहीं दिया। उस्ताद अली बक्श ने अपनी सिलाई मशीन की कुर्सी उठाकर दुकान के अंदर रख दी और मेरी तरफ़ देखकर बस इतना कहा, "सुबह जल्दी उठना। और जो देखा है, उसे सुनाने से पहले आँखें बंद करके एक बार खुद सुन लेना। वरना आवाज़ काँपेगी।"

मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। बल्ब गुनगुना रहा था। चारपाई पर बैठकर मैंने घंटी जेब से निकाली। वो ठंडी थी, पर जब मैंने उसे हथेली पर रखा तो हल्की गरमाहट आई।

"घंटी," मैंने कहा।

"सुन रही हूँ।"

"कल सुबह छह बजे।"

"जानती हूँ।"

"मैं उसे ठीक से बोल पाऊँगा?"

घंटी कुछ देर चुप रही।

"तेरे हिसाब में अट्ठानवे अंक हैं," उसने कहा। "और आज तूने कोई अंक नहीं कमाया। पर आज तूने एक काम किया जो अंक से बड़ा है — तूने सच अपने पास नहीं रखा, तूने उसके हक़दार को दिया।"

"और अगर वो कहे कि सभा में बोलो?"

"तो तेरी आवाज़ काँपेगी, पर बोलेगी," घंटी ने कहा। "काँपने से सच झूठ नहीं होता।"

तभी दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। काजल थी। हाथ में दवा का डिब्बा, आँखें लाल।

"भैया," वो बोली, "क्या वो सच है जो माँ ने कहा?"

"हाँ।"

"मैं उस दिन वहाँ थी," काजल ने कहा। "मतलब उसी अस्पताल में। और मैंने उस औरत को प्लास्टर में बैठे देखा था। मैंने सोचा कोई मरीज़ है। मैंने पूछा भी नहीं।"

"अब पूछ लेना।"

"कैसे?"

"कल सुबह," मैंने कहा। "आ जाना।"

वो सिर हिलाकर चली गई। मैंने बल्ब बुझाया और छत की तरफ़ देखा। पीपल की छाया खिड़की पर पड़ रही थी, और उसमें पत्ते हिल रहे थे। मुझे लगा जैसे पूरी गली साँस ले रही हो, और वो साँस भारी थी।

सुबह छह बजे से पहले ही पीपल के नीचे लोग आ गए थे। ठंड थी। कोई दीया जला रहा था, कोई चाय की केतली ले आया था। शबनम आपा सबसे पहले पहुँचीं। वो गुमटी खोलकर नहीं आईं — वो चबूतरी के किनारे बैठ गईं और उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, "बोल।"

मैंने सामने बैठकर अपनी हथेलियों को घुटनों पर रखा।

"गलियारा लंबा था," मैंने कहा। "और पीली दीवार पर ट्यूबलाइट थी जो झपक रही थी। मुझे वो झपकना अभी भी याद है। हर बार बत्ती जाती थी तो गलियारा थोड़ा और अंधेरा हो जाता था।"

शबनम आपा ने अपनी आँखें नहीं हटाईं।

"वहाँ एक स्ट्रेचर था जिसका पहिया टेढ़ा था। उसके पास प्लास्टर में एक औरत बैठी थी — रज़िया आपा। उनका एक हाथ बँधा हुआ था, दूसरा हाथ उन्होंने अपनी गोद में रखा था। उनके कपड़े पर धूल थी। उनके बाल आधे खुले थे और उन्होंने उन्हें बार-बार पीछे किया, पर वो हर बार आगे आ गिरे।"

मैंने साँस ली।

"और वो 'माँ' कह रही थीं। बस 'माँ'। पूरा वाक्य नहीं बोल रही थीं, सिर्फ़ वो एक शब्द। जैसे कोई खोई हुई चीज़ का नाम ले रहा हो। और गलियारे में कोई रुका नहीं। नर्स गुज़री, उन्होंने सिर्फ़ पलटकर देखा और कहा 'बैठी रहिए'। एक आदमी गुज़रा, उसने अपनी घड़ी देखी। एक बच्चा रो रहा था दूसरे कमरे में। और वो सब, जो उस गलियारे में थे, अपने-अपने काम में थे।"

"और मैं?" शबनम आपा ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी।

"आप दरवाज़े के बाहर खड़ी थीं," मैंने कहा। "आपके हाथ में यही छोटी सफ़ेद पोटली थी। आपका हाथ पोटली पर इतना कसा हुआ था कि आपकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं। आपने एक कदम अंदर बढ़ाया। सिर्फ़ एक। और फिर वो कदम वापस खींच लिया।"

शबनम आपा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"और फिर माँ आईं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी हो गई। "नर्स उन्हें सहारा दे रही थी। माँ ने रज़िया आपा को देखा। और माँ ने ऐसा चेहरा बनाया जैसे उन्होंने उसे देखा ही न हो। और माँ ने नर्स से कहा — उसे अकेला छोड़ दो, ये किसी से नहीं बोलेगी। और उसके बाद आप मुड़ीं और आप चली गईं।"

"और मैं?" रज़िया आपा की आवाज़ आई। वो सुन रही थीं, सबके बीच, सबसे आख़िर में।

"और आप वहाँ बैठी रहीं," मैंने कहा। "बत्ती झपकती रही। आपने एक बार शायद सोचा कि कोई आएगा। पर कोई नहीं आया। बत्ती बुझी और आपके चेहरे पर अंधेरा आ गया। बस इतना ही।"

सन्नाटा।

फिर मैंने काजल को देखा। मेरी बहन अपने घुटनों पर सिर रखकर बैठ गई और रो पड़ी। ऐसे रोई जैसे कोई बच्चा रोता है, बिना रुके, बिना कुछ कहे। और मीरा ने एक शब्द नहीं बोला — उसने अपना कैमरा नीचे रख दिया और काजल के पास बैठकर उसका कंधा पकड़ लिया।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho