The Mysterious Bell – Chapter 841
"मैं चली जाऊँगी।" माँ ने कहा। "मैं डॉक्टर से कह दूँगी कि मुझे—"
"दीदी!" शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई थी। "आपको जाना नहीं है। आज नहीं।"
माँ रुक गईं।
और शबनम आपा ने कहा — "मैंने उसे ख़त लिखे हैं।"
माँ ने उनकी तरफ़ देखा।
"तीन," शबनम आपा ने कहा। "तीन ख़त। मैंने उससे माफ़ी माँगी है। और मैंने उसे ये भी लिखा कि उसकी दीदी भी यहीं भर्ती है।"
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
"और तूने नहीं बताया?" माँ ने कहा। "उससे?"
"मैं नहीं बता पाई," शबनम आपा ने कहा। "मैं डर गई। मैं डर गई कि वो कहेगी — अब क्या फ़ायदा।"
दृश्य धुँधला होने लगा।
एक पल के लिए मेरी माँ की आँखें मेरी तरफ़ आईं, जैसे वो मुझे देख रही हों, जैसे वो जानती हों कि मैं यहाँ हूँ, किसी और वक़्त में, किसी और शरीर में।
और फिर सब कुछ मिट गया।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में लौट आया।
फ़र्श पर बैठा था। हाथ में रसीद थी। साँस फूली हुई थी। माथे पर पसीना था।
और मेरी आँखों से पानी बह रहा था।
घंटी मेज़ पर बजी।
धीरे से।
और उसने कहा — "अट्ठानवे बचे।"
मैंने अपनी आँखें पोंछीं।
मैंने रसीद को अपनी छाती से लगाया।
"घंटी," मैंने कहा, "मैंने बहुत कुछ देखा है।"
"मुझे पता है।"
"मगर एक चीज़ है जो मैंने नहीं देखी।"
"क्या?"
"वो लाइन।" मैंने कहा। "मैंने वो मिटाई हुई लाइन नहीं देखी।"
"तूने उसका आख़िरी लम्हा देखा है," घंटी ने कहा। "वो पहला लम्हा था। आख़िरी लम्हा यह नहीं।"
"तो आख़िरी लम्हा क्या है?"
"आख़िरी लम्हा," घंटी ने कहा, "तू अभी नहीं देख सकता। क्योंकि वो अभी तक पूरा नहीं हुआ।"
मैं सकपका गया।
"मतलब?"
"मतलब," घंटी ने कहा, "कुछ चीज़ें अभी खत्म नहीं होतीं। वो चलती रहती हैं। और उनका आख़िरी लम्हा तभी खुलता है जब वो सच में खत्म हों।"
"तो शबनम आपा और रज़िया—"
"वो ख़त्म नहीं हुए हैं," घंटी ने कहा। "वो चल रहे हैं। आज से।"
मैंने सिर हिलाया।
मैंने रसीद को जेब में रखा।
मैंने घंटी को जेब में रखा।
और मैं उठा।
इस वक़्त मुझे सभा में पहुँचना था।
शाम छह बजने को थी।
पीपल के नीचे लोग जुटने लगे थे। मैंने दुकान से बाहर निकलते वक़्त आसमान देखा — वो लाल-नारंगी रंग जो सिर्फ़ शाम को होता है, जब सूरज डूब जाता है और रात अभी तैयार नहीं होती।
मैंने गुमटी की तरफ़ देखा।
शबनम आपा गुमटी के बाहर खड़ी थीं, और वो मुझे देख रही थीं।
और उनकी आँखें लाल थीं।
जैसे उन्हें पता हो।
जैसे उन्हें लग रहा हो कि मैंने कुछ देखा है।
मैं उनकी तरफ़ गया।
"आपा," मैंने कहा, "मुझे आपसे कुछ कहना है।"
वो मुड़ीं।
"अभी नहीं," उन्होंने कहा।
"आपा, ये ज़रूरी है।"
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ज़ुबान नहीं थी, "मैंने तुझसे कहा था ना — मुझे कुछ नहीं देखना।"
"आपने कहा था," मैंने कहा। "मैंने आपकी बात मानी।"
"तो?"
"तो मैंने खुद देखा।" मैंने कहा।
शबनम आपा रुकीं।
"तूने क्या देखा?"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"वो गलियारा," मैंने कहा। "वो दरवाज़ा। और वो छोटी सफ़ेद पोटली जो आपके हाथ में थी।"
शबनम आपा की आँखें भर आईं।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
"आपा," मैंने कहा, "वो सच अभी पूरा नहीं हुआ है। घंटी ने कहा कि जो चल रहा है, उसका आख़िरी लम्हा तभी खुलता है जब वो सच में ख़त्म हो।"
"तो?"
"तो मैंने सोचा — क्यों न हम उसे आज पूरा करें?"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ अनसुना कह दिया हो।
"कैसे?" उन्होंने पूछा।
"सभा में," मैंने कहा। "आप बोलिए। वो सब। जो आपने आज तक नहीं बोला।"
"मैंने कबूल कर लिया ना—"
"आपने रज़िया के सामने कबूल किया।" मैंने कहा। "पर उस गलियारे की बात किसी ने नहीं बोली। माँ ने नहीं बोली। आपने नहीं बोली। और… और वो इसलिए नहीं बोली क्योंकि वो शायद आज भी उस गलियारे में खड़ी है।"
शबनम आपा ने अपनी आँखें पोंछीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू क्या चाहता है?"
"मैं चाहता हूँ कि आप और माँ, आज सभा में साथ बोलें।" मैंने कहा। "जो उस दिन हुआ, वो सबके सामने हो। क्योंकि अगर वो दिन सबके सामने आएगा, तो शायद वो आज पूरा हो जाएगा।"
शबनम आपा चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा, "मैं सोचूँगी।"
"आपा—"
"मैं सोचूँगी।" उन्होंने दोहराया, और इस बार उनकी आवाज़ में वो ज़ुबान वापस आ गई, "सिर्फ़ तेरे सवाल की वजह से।"
और फिर वो गुमटी के अंदर चली गईं।
मैं पीपल की तरफ़ चला।
जहाँ सभा की मेज़ रखी जा रही थी।
जहाँ रसीदें करीने से रखी जा रही थीं।
जहाँ मीरा कैमरा लगा रही थी, और उसका पहला कैमरा दिख रहा था और दूसरा छिपा था।
जहाँ मेरी माँ बैठी थीं।
जहाँ रज़िया खड़ी थीं।
और जहाँ घंटी, मेरी जेब में, अब ठंडी हो चुकी थी।
पर साथ में कुछ कह रही थी।
धीरे से।
बस मेरे लिए।
"अंकुश," उसने कहा, "आज शाम, जब तू बोलेगा — तो सब सुनेगा। पर एक बात याद रख। तू कुछ देख चुका है। और जो देख चुका है, उसे उसी तरह देना पड़ेगा। आधा भी नहीं, बोलना के लिए सहना भी होगा।"
मैंने सिर हिलाया।
और मैंने पीपल की तरफ़ देखा।
उसकी जड़ के पास, चबूतरी पर, सभा की मेज़ तैयार थी।
रसीदें बीच में।
फटा बस टिकट ऊपर।
और एक खाली कुर्सी।
वो कुर्सी किसके लिए थी, मुझे पता नहीं।
पर मैंने तय किया कि उस कुर्सी पर आज कोई बैठेगा।
चाहे शबनम आपा बैठें।
चाहे कोई और।
पर वो कुर्सी खाली नहीं रहेगी।
क्योंकि आज शाम, पीपल के नीचे, गली के बीच, एक बात तय होनी थी — कि खाली कुर्सियों पर अब बैठने वाले होंगे।
और मैं उन्हें लेकर आने निकला था।
मैंने घंटी को जेब से निकाला।
"घंटी," मैंने कहा, "आज शाम, जब मैं बोलूँगा — तो तू भी मेरे साथ बोलेगी?"
"नहीं," घंटी ने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि आज तेरी बात है।" उसने कहा। "और तेरी बात में मेरी आवाज़ नहीं चाहिए। तेरी अपनी आवाज़ चाहिए।"
मैंने घंटी को जेब में रखा।
और मैंने एक गहरी साँस ली।
और मैं पीपल की तरफ़ चला।
और पीपल के नीचे, चबूतरी पर, सभा शुरू होने वाली थी।
पहले सुनने वाला — माँ थी।
और माँ ने उठकर, अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, और सबकी तरफ़ देखकर कहा —
"मुझे पहले बोलना है। क्योंकि जो मैंने किया, उसे और कोई नहीं बोल सकता।"
और सभा शुरू हो गई।
पर मेरा ध्यान कहीं और था।
गुमटी के दरवाज़े पर।
जहाँ शबनम आपा खड़ी थीं।
और वो मेरी तरफ़ देख रही थीं।
और उनके हाथ में वो छोटी सफ़ेद पोटली थी।
वो पोटली जो उस गलियारे में उनके हाथ में थी।
वो पोटली जो पंद्रह साल से बंद थी।
और मेरी जेब में घंटी ने, बिना बजे, धीरे से कहा —
"अब शुरू।"
॥
माँ खड़ी थीं। उनका पल्लू कमर में खोंसा हुआ था और हाथ में वही हिसाब की कॉपी थी, जो वो रोज़ रात खोलती हैं। पर आज उन्होंने कॉपी नहीं खोली। उन्होंने उसे सीने से लगाया और सबकी तरफ़ देखा।
"मैं जो बोलूँगी, वो मेरे ही खिलाफ़ जाएगा," माँ ने कहा। "पर बोलूँगी। क्योंकि पंद्रह साल से ये बात मेरी छाती में हड्डी की तरह अटकी है, और आज सुबह से ये मुझे चुभ रही है।"
पीपल के नीचे सन्नाटा था। इतना कि पत्तों की खड़खड़ाहट सुनाई दे रही थी। शबनम आपा गुमटी के दरवाज़े पर ही खड़ी थीं, अंदर नहीं आईं। उनके हाथ में वो छोटी सफ़ेद पोटली थी और वो पोटली उन्होंने ऐसे पकड़ी हुई थी जैसे कोई चिड़िया पकड़ी हो और उड़ जाने का डर हो।
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