The Mysterious Bell – Chapter 839
मैंने सिर हिलाया और गुमटी की तरफ़ चला।
गुमटी के बाहर ताँबे का बड़ा बर्तन रखा था, जिसमें गली वालों ने पानी भरा था। उसके पास से गुज़रते वक़्त मुझे अपनी परछाईं दिखी, और मुझे लगा कि मैं वाकई थोड़ा बदल गया हूँ।
नहीं, बदला नहीं था। थका ज़रूर था।
गुमटी के अंदर से चाय की भाप आ रही थी और उसके साथ वो गंध जो सिर्फ़ शबनम आपा की गुमटी में आती है — अदरक, इलायची, और हल्की-सी जली हुई लकड़ी की।
मैंने परदा उठाया।
शबनम आपा चूल्हे के सामने बैठी थीं और लोहे की चिमटी से कोयले करवट दिला रही थीं।
"आपा।"
वो नहीं मुड़ीं।
"आपा, मैं—"
"चाय पीएगा?" उन्होंने काट दिया। "आज बहुत चाय बनाई है। पूरी गली के लिए। सभा है ना।"
"आपा, रसीदें।"
चिमटी उनके हाथ में रुक गई।
"कौन सी रसीदें?" उन्होंने पूछा, आवाज़ में वो चीनी घोल दी जो वो हर मुश्किल सवाल के साथ घोलती हैं।
"वो आठ रसीदें। अस्पताल की। रज़िया के हस्ताक्षर वाली। माँ के नाम वाली।"
"हाँ, तो? वो तो तेरी माँ की रसीदें हैं। मुझे क्यों दिखा रहा है?"
"क्योंकि उन पर आपका नाम नहीं है, आपा।" मैंने धीरे से कहा। "और यही बात मुझे खटक रही है।"
शबनम आपा उठीं।
वो उठीं और मेरी तरफ़ देखे बिना एक कुल्हड़ उठाया, उसमें चाय डालने लगीं, और उनका हाथ काँप रहा था।
इतना काँप रहा था कि चाय कुल्हड़ में गिरने से पहले उनकी उँगलियों से बहकर नीचे टपकने लगी।
"आपा, आपका हाथ—"
"हाथ ठीक है!" उन्होंने तेज़ी से कहा। "उम्र है। सुबह से खड़ी हूँ। बस।"
और फिर वो कुल्हड़ उनकी उँगलियों से फिसला।
नीचे गिरा।
चटककर टूटा।
और गुमटी के अंदर एक पल के लिए सब चुप हो गया — चूल्हे की आवाज़, चाय की खदबद, बाहर पीपल की पत्तियों की सरसराहट — सब कुछ, जैसे किसी ने आवाज़ की चाबी घुमाकर बंद कर दी हो।
शबनम आपा ने टूटे कुल्हड़ को देखा।
फिर मेरी तरफ़ देखा।
और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने आज तक उनकी आँखों में नहीं देखा था। डर नहीं। गुस्सा नहीं।
शर्म।
पुरानी, ठंडी, बरसों से जमी हुई शर्म।
"आपा," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ जितनी नरम हो सकती थी, उतनी नरम कर ली, "मैं आपको कुछ नहीं कह रहा। मैं सिर्फ़ ये रसीदें लाया हूँ। और इनमें एक बात है जो मुझे समझ नहीं आ रही।"
"क्या बात?"
"तीसरी रसीद।" मैंने कहा। "तीसरी रसीद पर तारीख़ है, और हस्ताक्षर रज़िया के हैं, पर नीचे एक जगह पर पेंसिल की लाइन है। और उस लाइन के नीचे कोई शब्द मिटाया गया है। थोड़ा-सा दिखता है। जैसे कोई बहुत ज़ोर से रगड़कर मिटाया हो।"
शबनम आपा ने तौलिया उठाया और अपने हाथ पोंछने लगीं। धीरे-धीरे। जैसे वक़्त खींच रही हों।
"तो मिटाया होगा," उन्होंने कहा। "किसी ने। क्या फ़र्क पड़ता है?"
"फ़र्क पड़ता है, आपा। क्योंकि वो लाइन किसी और की लिखाई में है।"
वो रुकीं।
"किसी और की?"
"हाँ।"
"किसकी?"
"यही तो मैं पूछ रहा हूँ।"
शबनम आपा ने तौलिया मेज़ पर रखा और मेरी तरफ़ मुड़ीं। उनका चेहरा अब वो नहीं था जो गली में सबसे तेज़ ज़ुबान वाली औरत का होता है। ये कोई और चेहरा था।
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ज़ुबान नहीं थी जो हर रोज़ लोगों को हँसाती है, "तू मेरे सामने मेरा हिसाब मत खोल। मैंने रज़िया से माफ़ी माँग ली। मैंने घंटी के सामने कबूल कर लिया कि मैंने न पूछा, न ख़त पढ़े, न इंतज़ार किया। मैंने सब बोल दिया। अब और क्या बचा है?"
"एक चीज़।" मैंने कहा।
"क्या?"
"वो जो आपने नहीं बोला।"
वो चूल्हे की तरफ़ मुड़ गईं। चाय की केतली उठाई ਜੋ ठंडी हो चुकी थी और उसे फिर चूल्हे पर रख दिया।
"मुझे कुछ नहीं देखना," उन्होंने कहा। "मुझे कुछ नहीं देखना। तू रसीदें लेकर जा। सभा की तैयारी कर। आज शाम बहुत कुछ होना है।"
"आपा—"
"मैं ठीक हूँ।" उन्होंने पीठ मेरी तरफ़ करके कहा। "बस।"
और मैं गुमटी से बाहर आ गया।
बाहर पीपल के नीचे कौशल्या दादी बैठी थीं, और उनके पास उस्ताद अली बक्श खड़े थे।
"क्या हुआ?" उस्ताद ने पूछा। "तेरा चेहरा बता रहा है कि कुछ हुआ।"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस… वो मुझे रसीदों के बारे में कुछ नहीं बता रही हैं। और उनका हाथ काँप रहा था। कुल्हड़ टूट गया।"
कौशल्या दादी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, और अपनी लाठी पर झुककर बैठ गईं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "शबनम जब से गुमटी खोली है, मैंने उसे कभी हाथ काँपते नहीं देखा। उम्र है, कमज़ोरी है, सब है। पर हाथ काँपना कुछ और बात है।"
"मैं क्या करूँ, दादी?"
"तू क्या कर सकता है?"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद अली बक्श मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनके मोटे चश्मे के पीछे उनकी आँखें कुछ कह रही थीं जो उनके मुँह ने नहीं कहा।
"घंटी क्या कहती है?" उन्होंने पूछा।
मैंने घंटी को जेब से निकाला।
वो गरम थी।
"कुछ नहीं बोल रही," मैंने कहा। "बस गरम है।"
"तो वो इंतज़ार कर रही है," उस्ताद ने कहा। "तेरे सवाल का।"
मैंने घंटी को दोनों हाथों में पकड़ा।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "इसका कोई रास्ता है?"
और घंटी ने कहा, "पुरानी परत।"
मैं ठिठक गया।
"पुरानी परत?"
"पुरानी परत," उसने दोहराया। "साठ अंक।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
पुरानी परत।
सत्तर अंक वाली शक्ति। जिससे किसी चीज़ को छूकर उसका आख़िरी सच्चा लम्हा दिख जाता है।
मैंने एक बार पहले इस्तेमाल की थी। पिछले हफ्ते। जब मैंने पुराने बिजलीघर की परत खोली थी और दादा को अपना अंगूठा लगाते देखा था।
उसका दाम सत्तर अंक था।
और मैंने वो अदा किया था।
अब क्या?
"कितने अंक बचे हैं?" मैंने पूछा।
"एक सौ अठ्ठावन," घंटी ने कहा। "साठ कटेंगे तो अट्ठानवे बचेंगे।"
"अट्ठानवे?"
"हाँ।"
"और जो दिखेगा?"
कुछ पल की चुप्पी।
फिर घंटी ने कहा, "जो दिखेगा, वो सहना पड़ेगा। परत सिर्फ़ दिखाती नहीं। परत वो करती है जो कोई नहीं करता — वो तुझे उसमें खड़ा कर देती है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
कौशल्या दादी ने कहा, "बेटा, सच देखना और सच सहना दो अलग बातें हैं। मैंने अपने जीवन में बहुत सच्चाइयाँ देखी हैं। और मैं तुझे बताती हूँ — कुछ सच्चाइयाँ दिख जाती हैं पर सही नहीं जातीं। वो पचास साल बाद भी रात में जगाकर रखती हैं। सोच ले।"
"दादी, अगर मैं नहीं देखूँगा तो क्या होगा?"
"तो वो चीज़ छिपी रहेगी।" उन्होंने कहा। "और छिपी चीज़ें एक दिन खुद बाहर आ जाती हैं। पर तुझे पता होगा कि तूने देखने की कोशिश नहीं की।"
"और अगर मैं देख लूँगा?"
"तो तुझे पता होगा कि तूने देख लिया।" उन्होंने कहा। "पर सहना तेरा काम होगा।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद?"
उस्ताद अली बक्श ने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछने लगे। उनकी उँगलियाँ धीमी थीं, जैसे किसी पुराने फ़ैसले की तरफ़ बढ़ रही हों।
"पुरानी परत," उन्होंने कहा, "अंकुश, सत्तर अंक की शक्ति है। मैंने ये चीज़ पचास साल इस्तेमाल की है। एक बात मैं तुझे बताता हूँ — परत सिर्फ़ दिखाती नहीं। परत कहती है, अब तू गवाह है। और गवाही का दाम होता है।"
"क्या दाम?"
"देखने के बाद तू उसे अनदेखा नहीं कर सकता।" उन्होंने चश्मा वापस पहन लिया। "ये सबसे बड़ा दाम है।"
मैंने घंटी को देखा।
"और छिपा दर्द?"
"छिपा दर्द?" उन्होंने कहा। "वो चालीस अंक की शक्ति है। वो भी काम की चीज़ है। पर वो तभी चलती है जब सामने वाला सच में जानना चाहे।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno