The Mysterious Bell – Chapter 834
और यही एक ऐसी बात थी जो शबनम आपा ने आज तक कभी नहीं बोली थी। उनकी आवाज़ इतनी नीचे गिर गई थी कि लगा जैसे चूल्हे की आग भी सुन रही है।
रज़िया की आँखों से आँसू निकले। वो अचानक चुप हो गई — और वो चुप्पी, मैं तुम्हें बता नहीं सकता, कितनी ज़्यादा शोर कर रही थी।
मैंने बीच में आकर दोनों को अलग किया। मेरे हाथ रज़िया के कंधे पर और शबनम आपा की बाँह पर — और ग्रीस लगे हाथों से मैंने जो पकड़ा, वो मुठ्ठी भर कपड़ा नहीं था।
"बस," मैंने कहा। "अब यहीं रुको।"
"अंकुश—" शबनम आपा ने कहा।
"आपा," मैंने कहा, "मैं आपका बुरा नहीं बोल रहा। पर ये सच है कि जो बातें चाय की बगल में शुरू होती हैं, वो सीधे मंच तक चली जाती हैं और वहाँ कोई हारता है। मैं नहीं चाहता कि आज शाम के बाद आप दोनों फिर से आपस में न बोलें, और बीच में मैं खड़ा रहूँ, हाथ में चाय का गिलास लिए, बेवकूफ़ बनकर।"
रज़िया ने एक गहरी साँस ली।
मीरा ने अपना कैमरा नीचे किया। पूरा नीचे, पेट की तरफ़, और हाथ से उसके ऊपर पल्लू डाल दिया।
"अंकुश," उसने कहा, बहुत धीमे से, "ये खबर नहीं है।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"ये दर्द है," उसने कहा। "इसे मत छेड़ो।"
"मैं नहीं छेड़ रहा," मैंने कहा। "मैं बस इसके आगे अपनी ज़ुबान से कुछ और नहीं जोड़ रहा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में जो था, वो कहीं और था — उसका अपना रमा मैडम वाला दाग़, जो उसने खुद बनाया था और जिसे पाँच साल से वो कंधे पर ढो रही थी।
तभी कौशल्या दादी आगे आईं। मोटी लाठी की टक-टक पहले सुनी गई, फिर उनकी आवाज़।
"सुनो सब," उन्होंने कहा। "ऐसी बातें पीपल के नीचे नहीं होतीं। पीपल का पेड़ बड़ा है, उसकी छाया ठंडी है, पर वो सब कुछ सुनता है और सबको बाँट देता है। गली-गली तक पहुँचा देता है।"
उन्होंने अपनी छड़ी उठाई और भीड़ की तरफ़ घुमाई।
"ये दो बहनें हैं," उन्होंने कहा। "ये लड़ेंगी, अपनी बात कहेंगी, और फिर भी बैठेंगी। मगर बंद कमरे में। आज सुबह की ये बात, आज शाम की सभा से पहले सबको नहीं बताई जाती। जो बात सभा में बोलनी है, वो सभा में बोलो — माइक के सामने, ताकि घूम-फिरकर उसका मुँह बदल न जाए।"
भोला भाई ने अपना रुमाल निकाला, हाथ पोंछा और जाने को पीछे मुड़ गए। बंसी बाबा पहले चले गए। हाफ़िज़ बाबा हाफ़िज़ थे — वो सीधे किसी तरफ़ नहीं गए, धीरे-धीरे गुमटी के कोने की तरफ़ हो लिए, जहाँ से आवाज़ आती रहे और कोई देख न पाए।
दस मिनट में गुमटी के आगे वही रह गया जो वहाँ होना चाहिए था — दो बहनें, एक चूल्हा, दो गिलास, और एक औरत जो अब पहले जैसी नहीं दिख रही थी।
मैंने चलते-चलते सानिया को अपनी तरफ़ इशारा किया। वो पीपल के पीछे से चारों को लेकर आई।
"सुनो," मैंने धीरे से कहा। "गुमटी के पीछे जो पुराने बक्से पड़े हैं — वो खँगालो। देखो कुछ काग़ज़ मिले, कोई पुराना हिसाब, ज़मीन का कोई काग़ज़, कोई लिफ़ाफ़ा। हल्के हाथ से। जो जैसा मिले, वैसा ही लाओ, कुछ फेंको मत।"
"क्या सोच रहे हो?" रफ़ीक़ ने पूछा।
"मैं सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि इस गुमटी की ज़मीन अगर कोई बेच रहा है, तो इसके नीचे कुछ पुरानी काग़ज़ ज़रूर होगी। और अगर पुराने काग़ज़ मिलें, तो पता चलेगा कि ज़मीन असल में किसकी है और किसने कब किसको क्या लिखा।"
टिंकू ने अपनी पट्टी बँधी हथेली उठाई।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैं भी चलूँगा।"
"तेरी हथेली?"
"हथेली से जासूसी नहीं होती," उसने कहा। "आँख से होती है।"
गुड्डू ने तुरंत घोषणा की।
"जासूस कभी नहीं डरते," उसने कहा। "बस भूखे होते हैं।"
चिंटू ने गुड्डू के कंधे पर हाथ रखा।
"मेरे पास एक समोसा है," उसने कहा। "आधा। आधा तुझे, आधा मुझे, और अगर कुछ मिल गया तो पूरा शबनम आपा से माँग लेंगे।"
सानिया सबसे आगे थी। वो पलटी और ज़ोर से फुसफुसाई, जिससे पूरी गली ने सुन लिया।
"पाँच जासूस चल रहे हैं। जो पीछे देखे, वो जासूस नहीं।"
मैं हँस पड़ा।
पर हँसी मेरे अंदर दो कदम चली और रुक गई। क्योंकि मैं जानता था कि गुमटी के पीछे वाले कोने में जो बक्से पड़े हैं, वो सिर्फ़ गुमटी के नहीं हैं। वो उस ज़माने के हैं जब मेरी माँ नई-नई ब्याहकर आई थी और शबनम आपा का पापा गुमटी खोलने के लिए उधार लेने आए थे। और मुझे यह भी पता था कि इंसान जो सबसे ज़्यादा छिपाता है, वो अक्सर उन्हीं पुराने बक्सों में रहता है जिन्हें वो अपना ही मानकर भूल जाता है।
मैं गुमटी के अंदर गया।
रज़िया कुर्सी पर बैठी थी, सिर नीचे, और उसके हाथ में चुनरी का कोना था — माँ की रेशमी चुनरी, घिसी ज़री, छोटे फूल। वो उसे बार-बार मोड़ रही थी और खोल रही थी।
शबनम आपा चूल्हे पर पानी डाल रही थीं। ज़रूरत नहीं थी, चूल्हा जल रहा था।
"आपा," मैंने कहा।
"हूँ।"
"मैंने एक बात सुनी है," मैंने कहा। "कहते हैं जब दो बहनें एक ही माँ की होती हैं, तो उनके झगड़े भी माँ के ही होते हैं। यानी आपकी लड़ाई माँ के ऊपर है। माँ अब नहीं हैं। तो लड़ाई किसके ऊपर है?"
शबनम आपा ने पलटकर देखा। उनकी आँखें लाल थीं, जो मैंने कभी नहीं देखा था। शबनम आपा को गली ने रोते हुए नहीं देखा था — गली ने उन्हें सिर्फ़ चिमटी उठाते देखा था।
"तेरे पास हर बात का जवाब है," उन्होंने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "मेरे पास सिर्फ़ सवाल है। जवाब मिलते-मिलते पूरी गली के सिर पर सफ़ेद बाल आ जाएँगे, आपा।"
शबनम आपा ने पानी का डिब्बा रखा।
"वो दवा लेकर नहीं आई थी," उन्होंने धीरे से कहा, "ये सच है। पर मैंने भी उससे एक बार नहीं पूछा कि क्यों नहीं आई। मैंने बस ये मान लिया कि वो नहीं आई, इसलिए वो बुरी है। और मैंने यह मान लिया क्योंकि अगर मैं यह न मानूँ, तो मुझे अपने ही सच को देखना पड़ेगा — कि मैंने उसे बुलाया क्यों नहीं।"
रज़िया ने सिर उठाया।
"अब बोल रही है तू?" उसने कहा। आवाज़ में गुस्सा नहीं था, थकान थी।
"बोल रही हूँ," शबनम आपा ने कहा। "और आज शाम सबके सामने भी बोलूँगी। गुमटी बेचने की बात, सफ़ेद कुर्ते वाले की धमकी, तेरा पता — सब।"
रज़िया ने उनकी तरफ़ देखा। फिर उसने चुनरी मोड़ी और चुपचाप अपने घुटनों पर रख ली।
मैं बाहर निकला।
पीपल के नीचे दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने मुझे आते देखा और अपनी मूँछ के नीचे कुछ बड़बड़ाए।
"क्या कहा अंकल?" मैंने पूछा।
"मैं कह रहा था," उन्होंने कहा, "कि जब दो औरतें लड़ती हैं और कोई आदमी बीच में अक्लमंदी दिखाता है, तो उसे अगले महीने तक कुत्ता भी पानी नहीं पिलाता। तूने ठीक किया कि तू चुप हो गया।"
"मैं चुप नहीं हुआ अंकल," मैंने कहा। "मैं बाहर आ गया।"
दुबे अंकल हँसे, और हँसते हुए खाँसने लगे।
तभी पीछे से आवाज़ आई — सानिया की।
"उस्ताद!"
मैं भागा। गुमटी के पीछे का कोना पत्थर का, काई लगा और नम था। वहाँ तीन लोहे के बक्से और दो लकड़ी की पेटियाँ पड़ी थीं। सानिया घुटनों के बल बैठी थी, गुड्डू उसके पीछे, रफ़ीक़ एक टूटी पेटी का ढक्कन उठाए, और चिंटू ने अपना आधा समोसा सीने से चिपका रखा था, जैसे कोई पवित्र चीज़ हो।
"देखो," सानिया ने कहा।
उसके हाथ में एक बैग था।
पुराना बैग। कपड़े का, फीका, किसी ज़माने में नीला रहा होगा। पट्टा सिलाई से उखड़ा हुआ, एक कोना जला हुआ, दूसरे कोने से धूल और जंग का रंग चढ़ा हुआ। बैग पर काले धागे से एक अक्षर कढ़ा था — आधा मिटा हुआ, पर पहचाना जा सकता था।
"ये रज़िया आपा का है," सानिया ने कहा। "वो पंद्रह साल पहले यही बैग लेकर गई थी। मैंने नहीं देखा, माँ ने बताया था।"
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