The Mysterious Bell – Chapter 835
मैंने बैग अपने हाथ में लिया। हल्का था। पर हल्का होकर भी भारी लग रहा था, जैसे अंदर हवा भी न हो, सिर्फ़ साल हों।
"खोलो," मैंने कहा।
चिंटू आगे आया।
"उस्ताद," उसने कहा, "जासूसी की पहली शर्त — जो मिले, उसे पहले सूँघो।"
"तू सूँघ," मैंने कहा।
उसने सूँघा और चेहरा बनाया।
"कपूर," उसने कहा। "और फफूँद। और…" उसने फिर सूँघा, "और सस्ती दवा।"
मैंने बैग का मुँह खोला।
अंदर कुछ कपड़े थे — मुड़े हुए, पीले पड़े। एक स्टील का छोटा डिब्बा। दवा के दो पत्ते, खाली। और फिर — एक लिफ़ाफ़ा, मोटा, बिना नाम।
मैंने लिफ़ाफ़े का मुँह खोला और उसे उलट दिया।
और तब जो गिरा, वो सिर्फ़ काग़ज़ नहीं था।
रसीदें थीं। अस्पताल की रसीदें, एक के बाद एक, एक दूसरे से चिपकी हुई, कुछ जगह से फटी, कुछ जगह पानी से फूली हुई, और सबके ऊपर वही पीली दीवार वाला निशान जो डॉक्टर इसरानी के अस्पताल की हर चीज़ पर होता है।
और उनके साथ एक बस टिकट गिरा — फटा हुआ, आधा, जिसका एक कोना जेब में रह गया होगा।
फर्श पर रसीदें बिखर गईं, और चिंटू ने तुरंत अपना समोसा उठाकर ऊपर कर लिया, ताकि कुछ गिरे नहीं।
सानिया एक झटके में नीचे बैठी, रसीदें समेटने लगी, और एक को उठाकर पास लाई — ठीक उस जगह लाई जहाँ उस्ताद अली बक्श खड़े थे, अपनी लाठी पर हाथ रखे, पुरानी दुकान की गंध लिए।
"उस्ताद," सानिया ने कहा। उसकी आवाज़ में अब मज़ाक नहीं था। "देखिए।"
उस्ताद ने रसीद अपने मोटे चश्मे के पीछे उठाई। उन्होंने देखा, देर तक देखा, और फिर उनका हाथ धीरे से काँपा — नहीं, काँपा नहीं, थम गया।
"ये तारीख़ें," सानिया ने कहा, और उसकी आवाज़ तेज़ हो गई। "उस्ताद, इन रसीदों की तारीख़ें ठीक माँ की बीमारी के वक़्त की हैं।"
उस्ताद ने रसीद नीचे नहीं की।
"हाँ," उन्होंने कहा।
"मतलब —" सानिया ने कहा।
"मतलब," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ वैसी ही रही जैसी तब होती है जब कोई पुरानी सिलाई की गाँठ खुल रही हो, "कि वो दवा लेकर आई थी।"
मैंने फर्श पर देखा।
रसीदें बिखरी थीं। और उनमें से कुछ पर माँ का नाम था — सुशीला यादव — और कुछ पर रज़िया का हस्ताक्षर। एक पर ऊपर किसी ने पेंसिल से एक छोटी लाइन खींच दी थी। और एक रसीद के मुड़े कोने पर स्याही फैली हुई थी, जैसे किसी ने काँपते हाथ से उसे दबाया हो।
घंटी मेरी जेब में गरम हो गई।
मैंने उसे धीरे से बाहर निकाला, हथेली पर रखा, और उसकी गरमाहट में वो आवाज़ आई जो मुझे अब पहचानने लगी थी — छोटी, रूखी, आधी बात कहकर रुक जाने वाली।
"बैग नहीं," घंटी ने कहा। "बेटी।"
मैंने बैग को देखा।
फीका नीला कपड़ा। टूटी सिलाई। जला कोना। और वो आधा मिटा हुआ कढ़ा हुआ अक्षर।
और मुझे अचानक वो बात याद आई जो बाईस साल पहले की थी, जो मेरे घर की दीवार पर टँगी पीतल की पट्टी पर थी, जो मेरे गले की चाबी में थी, जो मेरे पापा की चुप्पी में थी —
घर की सबसे पुरानी चीज़ें अक्सर सबसे नई सच्चाई छिपाए बैठी होती हैं।
मैं गुमटी की तरफ़ मुड़ा।
रज़िया अंदर बैठी थी, अपनी चुनरी को घुटनों पर रखे। मैंने उसे आवाज़ दी।
"रज़िया आपा," मैंने कहा।
वो उठकर आई। धीरे-धीरे, जैसे हर कदम पर कुछ वज़न उठा रही हो। वो दरवाज़े पर रुकी और फिर उसकी नज़र मेरे हाथ पर पड़ी।
बैग।
और उसके चेहरे की जो हालत हुई, वो मैं तुम्हें शब्दों में नहीं बता सकता।
"ये… ये कहाँ से?" उसने कहा।
"गुमटी के पीछे से," मैंने कहा। "बक्सों के नीचे से।"
वो एक कदम आगे आई, फिर रुक गई, जैसे बैग को छूने से डर रही हो।
"मैंने इसे फेंका था," उसने धीरे से कहा। "फेंका था, अंकुश। तेरह साल पहले। गुस्से में।"
"तो फेंका हुआ बैग गुमटी के पीछे कैसे?" मैंने पूछा।
रज़िया ने जवाब नहीं दिया। उसने बस बैग को देखा, और फिर उसकी आँखें उन रसीदों पर गईं जो सानिया ने उस्ताद के हाथ में उठा दी थीं।
"ये रसीदें…" उसने कहा। "ये कहाँ से?"
"बैग के अंदर से," मैंने कहा।
रज़िया ने एक गहरी साँस ली। और फिर उसने वो किया जो मैंने उम्मीद नहीं किया था। वो नीचे बैठ गई — वहीं, गुमटी के पत्थर के फर्श पर, धूल में — और उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।
"मैं आई थी," उसने कहा, आवाज़ हाथों के पीछे से आ रही थी। "मैं आई थी। तीन बार। दवा लेकर, पैसे लेकर, अपने हाथ से बनी खीर लेकर। और हर बार दरवाज़े पर ताला मिला। किसी ने मुझे बताया नहीं कि माँ किस वक़्त अस्पताल में होती है, किस वक़्त घर। और जब चौथी बार आई, तो तेरह दिन हो चुके थे। तेरह दिन। माँ जा चुकी थी।"
शबनम आपा दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनके सीने में ठंडा पानी डाल दिया हो।
"तू आई थी?" उन्होंने कहा।
"तीन बार," रज़िया ने कहा। "और तूने एक बार भी नहीं पूछा। पंद्रह साल तक एक बार भी नहीं पूछा कि मैं कहाँ थी।"
शबनम आपा ने एक कदम आगे रखा, और फिर रुक गईं। उनके हाथ में कुछ नहीं था — न केतली, न चिमटी, न कोई हथियार। बस खुले हाथ।
"मैंने पूछा था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फूट रही थी। "अपने आप से। रोज़ रात। और अपने आप से जवाब नहीं मिला, तो मैंने चुप रहना चुन लिया। चुप्पी सबसे आसान है, रज़िया। इसमें किसी को माफ़ी नहीं माँगनी पड़ती।"
मैंने उन दोनों के बीच से हटकर सानिया की तरफ़ देखा।
सानिया ने मेरी तरफ़ देखा और अपनी आँखों से एक इशारा किया — वो बस टिकट, जो फर्श पर पड़ा था।
मैंने उसे उठाया।
फटा हुआ आधा टिकट। ऊपर की तरफ़ का हिस्सा गायब। नीचे सिर्फ़ इतना बचा था कि पढ़ा जा सके — जहाँ से चढ़ी थी वो जगह, और तारीख़।
और तारीख़ वो थी जिस दिन माँ को पहली बार अस्पताल में भर्ती किया गया था।
मैंने टिकट को पलटा। उसकी पीठ पर, पेंसिल से, बहुत छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था। इतना छोटा कि मुझे लगा मेरे ही हाथ ने मुझसे धोखा किया।
मैंने उसे रोशनी में किया। उस्ताद ने चश्मा आगे किया। मीरा ने कैमरा नीचे रखकर पास आई।
"क्या है?" मीरा ने पूछा।
मैंने पढ़ा। और जब पढ़ा, तो मुझे लगा जैसे मेरे हाथ में वो टिकट नहीं, कोई बंद दरवाज़ा है, और वो दरवाज़ा अभी खुलने ही वाला है।
"अंकुश?" मीरा ने कहा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "अभी कुछ नहीं।"
पर मैं झूठ बोल रहा था — और घंटी ने मेरी हथेली में हल्की सी गरमाहट देकर यह जता दिया कि वो जानती है।
मैंने टिकट अपनी जेब में रखा। रसीदें सानिया ने समेटकर उस्ताद की तरफ़ बढ़ा दीं।
रज़िया अब भी फर्श पर बैठी थी। शबनम आपा घुटनों पर उसके पास बैठ गईं — मैंने पहली बार देखा कि शबनम आपा किसी के सामने इतने नीचे बैठ सकती हैं।
और तब जो हुआ, वो मेरे लिए नहीं, पूरी गली के लिए नया था।
शबनम आपा ने अपना हाथ बढ़ाया और रज़िया के सिर पर रख दिया। बस रख दिया। कुछ कहा नहीं। और रज़िया ने, पंद्रह साल के बाद, पहली बार अपना सिर उनके हाथ के नीचे झुका दिया।
घंटी मेरी जेब में बजी।
धीरे से। इतनी धीमी कि शायद सिर्फ़ मैंने सुनी।
"आधा," उसने कहा।
बस इतना। आधा।
मैंने घंटी को जेब में दबाया और सोचा — आधा, क्योंकि माफ़ी अभी पूरी नहीं हुई। दोनों ने सच कह दिया, पर दोनों ने अभी एक-दूसरे से माफ़ी नहीं माँगी। और तंत्र का हिसाब सच से चलता है, पर जुड़ता माफ़ी से है।
बाहर आकर मैंने देखा कि सूरज पीपल की डाल में फँस गया था।
दुबे अंकल ने मुझे इशारा किया।
"शाम को सभा है," उन्होंने कहा। "जो आज सुबह हुआ, वो शाम को तेरे हाथ में होगा। अब ये तेरा काम है कि तू इसे कैसे रखता है।"
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