The Mysterious Bell833 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 833

7 min read November 5, 2026

"आज सुबह — सबको एक-एक काग़ज़ मिला है गली में। तो आज शाम हम यहाँ सब जुटेंगे — सिर्फ़ झगड़ने के लिए नहीं। हिसाब लेने के लिए।"

दुबे अंकल ने अपनी छड़ी उठाई। "अब यह बात," उन्होंने कहा, "मुझे पसंद आई।"

मैंने मुड़कर शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो अब भी रज़िया के सिर पर हाथ रखे खड़ी थीं।

"शबनम आपा," मैंने कहा, "आपकी गुमटी आज बंद नहीं रहेगी?"

उन्होंने सिर उठाया।

"क्यों बंद रहेगी?"

"क्योंकि चाय बनानी है," मैंने कहा। "आज सबको। और मेरी चाय में चीनी डालना, आपा।"

वो एक पल रुकीं। फिर उन्होंने सिर हिलाया। "डालूँगी," उन्होंने कहा। "पर आज तुझे आधी चीनी मिलेगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि पहले तूने चीनी की शिकायत की थी," उन्होंने कहा और गुमटी की तरफ़ चलीं। "अब भुगत।"

रज़िया हँसी — पहली बार। छोटी सी हँसी, आँसुओं के बीच से, दबी हुई।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा।

"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "आज शाम की सभा में क्या बोलूँगी?"

"जो तुम्हारा मन कहे," मैंने कहा। "बस डर को सच की जगह मत दे देना।"

"और तू?"

मैंने जेब में घंटी पकड़ी। वो अब ठंडी नहीं थी। वो ठीक उसी तरह गरम थी जैसे पापा के हाथ में पहली बार गरम हुई थी।

"मैं?" मैंने कहा। "मैं वो बोलूँगा जो किसी ने अब तक नहीं बोला।"

"क्या?"

"यह नगरपालिका का काग़ज़ नहीं है," मैंने कहा। "यह हमारे ही किसी आदमी के दफ़्तार से निकला है। और जब तक वो आदमी चुप है, यह काग़ज़ सच लगेगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू किसकी बात कर रहा है?"

मैंने पीपल के नीचे देखा — रामलाल बाबा गेट के पास चुप खड़े थे, हाथ में स्टील का गिलास, और आँखों में वो बात जो किसी को नहीं बताई गई।

"उसकी," मैंने कहा। "जो डर के कारण लाइसेंस दफ़्तार में रोज़ सुबह चाय लेकर जाता है और शाम को मुँह छिपाकर लौटता है।"

तभी घंटी फिर बजी। इस बार ज़्यादा साफ़। जैसे कोई दूर से बोल रहा हो।

मैंने उसे हथेली पर रखा।

उस्ताद ने भी सुना। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर घंटी की तरफ़।

"क्या कहा?" उस्ताद ने पूछा।

"कहा — जो नाम डर से लिखा जाए, वो नाम नहीं, थूक है," मैंने कहा। "और आज उस थूक को पोंछने का दिन है।"

रज़िया ने अपना थैला उठाया। उसने सूटकेस उठाया। उसने चुनरी मोड़ी और अपने बैग में रखी।

फिर वो सीधे शबनम आपा की गुमटी की तरफ़ चली।

"दीदी," उसने कहा — और ये शब्द गली ने पंद्रह साल बाद सुना। "चाय में चीनी कम डालना। मुझे कड़वी पसंद है।"

शबनम आपा एक पल ठिठकीं। फिर उन्होंने केतली उठाई।

"बैठ," उन्होंने कहा। "मेज़ पर।"

रज़िया बैठी।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने कैमरा बंद कर दिया था। मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो अपनी हथेली पर लगी पट्टी को देख रहा था, और मुस्कुरा रहा था।

मैंने दुबे अंकल की तरफ़ देखा। वो अपनी छड़ी पर झुककर मेरे पास आए।

"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा, "आज शाम सभा में रामलाल को लाना। और याद रखना — जो आदमी अपनी डर बेचता है, उसका सबसे बड़ा हथियार उसका अपना सच है।"

"मैं लाऊँगा," मैंने कहा।

"कैसे?"

"चाय से," मैंने कहा। "लाइसेंस बाबू की दफ़्तार के नीचे वाली चाय की दुकान पर।"

दुबे अंकल हँसे।

"तू बाप का बेटा है," उन्होंने कहा। "पर बाप से ज़्यादा बोलता है।"

"सीख रहा हूँ," मैंने कहा।

और तब मैंने अपनी जेब में घंटी को वापस पकड़ा। वो गरम थी।

पर उस गरमाहट में एक और बात थी, जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी — जैसे कोई दूसरा हाथ भी उसे पकड़े हुए हो। दूर कहीं। मुझसे नहीं, मेरे साथ।

मैंने घंटी को धीरे से सहलाया और सोचा — अगर तू दो का था, तो तेरा दूसरा हिस्सा कहाँ है? और वो क्यों मुझ से इतनी दूर है?

घंटी ने जवाब नहीं दिया।

पर उसकी ठंडक में एक बात थी जो जवाब से कम नहीं थी —

सब्र कर, दिन आज ही है।

मैं पीपल के नीचे से चला। पीछे गली की आवाज़ें थीं — शबनम आपा के गिलास टकराने की आवाज़, रज़िया के थैले से कुछ गिरने की आवाज़, बच्चों की दौड़, उस्ताद की मशीन।

और इन सबके बीच, किसी दूर दरवाज़े से, कोई किसी पुराने ताले में चाबी घुमा रहा था।

मैंने गुमटी की तरफ़ देखा।

शबनम आपा के हाथ में चाह उबल रही थी और उनका चेहरा ऐसा था जैसे पंद्रह साल बाद पहली बार किसी ने उनका नाम लिया हो।

और शबनम आपा कुछ नहीं बोलीं, बस एक बार मेरी तरफ़ देखकर अपना सिर हिलाया — उस तरह जैसे कोई कहे, हाँ, अब मैं भी बोलूँगी।

मैंने सिर हिलाया और आगे बढ़ा।

सोमवार अभी नहीं आया। पर उसकी सुबह आज शाम से शुरू हो चुकी थी।

॥

भीड़ बढ़ रही थी।

पहले गुमटी के सामने दो लोग थे — भोला भाई और रेडियो वाला बूढ़ा। फिर पाँच हो गए। फिर दस। फिर पीपल की चबूतरी से बंसी बाबा, हाफ़िज़ बाबा, नबी चाचा और श्यामलाल काका भी उठकर गुमटी की तरफ़ आ गए, जैसे कोई बारात आ रही हो।

पर बारात नहीं थी। गुमटी के सामने दो बहनें बैठी थीं, और उनके बीच जो चीज़ बैठी थी, वो पंद्रह साल पुरानी थी।

रज़िया के हाथ में चाय का गिलास आधा भरा था और आधा ठंडा। शबनम आपा के हाथ में केतली थी, पर उनका हाथ नीचे नहीं आ रहा था, जैसे केतली से ज़्यादा भारी कुछ उनके हाथ में हो।

मैं दो कदम पीछे खड़ा था। मीरा मेरे बगल में थी, कैमरा अभी भी चालू।

तभी रज़िया ने गिलास मेज़ पर रखा। ज़ोर से नहीं, फिर भी पूरी गली ने आवाज़ सुनी।

"तूने मुझे बुलाया भी नहीं था," उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर रुक नहीं रही थी। "माँ के आख़िरी पंद्रह दिन तू अकेली थी। तेरे पास मेरा पता था। पता था ना?"

शबनम आपा ने केतली नीचे नहीं रखी।

"था," उन्होंने कहा।

"तो बुलाया क्यों नहीं?"

"क्योंकि मैं तेरे पास एक ही बात लेकर जा सकती थी," शबनम आपा ने कहा, "और वो बात माँ के सामने नहीं बोली जा सकती थी।"

रज़िया ने उनकी तरफ़ देखा। और फिर जो उसने कहा, वो गुमटी के नीचे जलती चूल्हे की आग जैसा था — धीमा, पर जलता हुआ।

"और तू किस मुँह से ये सब कह रही है?" शबनम आपा ने केतली रख दी। मेज़ पर रखी, इतनी ज़ोर से कि पीतल की थाली बज उठी। "तू माँ के आख़िरी दिनों में एक बार भी दवा लेकर नहीं आई। एक बार भी। मैंने तेरे नाम की दवा दो महीने अस्पताल की खिड़की पर रखवाई, और वो रखी की रखी रह गई। अब किस मुँह से ज़िद की बात करती है?"

गली में सन्नाटा हो गया।

हाफ़िज़ बाबा ने कान पर हाथ रखा, जैसे सुना न हो। बंसी बाबा ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिका दी। भोला भाई ने अपने हाथ रसोई की तरफ़ कर दिए, जैसे कहे — मैं इसमें नहीं हूँ, मैं समोसा तलने आया था।

रज़िया का चेहरा एक पल में पत्थर जैसा हो गया। फिर पत्थर फट गया।

"दवा," उसने धीरे से कहा। "तू दवा की बात करती है?"

वो उठी। कुर्सी पीछे सरक गई और उसकी टाँग से टकराकर हिल गई।

"तूने कभी पूछा ही नहीं," रज़िया ने कहा, और अब उसकी आवाज़ टूट रही थी, "कि मैं कहाँ थी, क्या कर रही थी, किस हाल में थी। तूने बस अपना सच बोल दिया और मेरा घर बिखर गया। तूने मुझे बुलाया नहीं, क्योंकि तू जानती थी कि मैं आ जाऊँगी और तेरे सामने खड़ी हो जाऊँगी। तूने मेरे हाथ में चाय पकड़ा दी, दीदी कहलवा लिया, ताकि कल की सभा में तेरा नाम बच जाए।"

शबनम आपा ने कुछ कहना चाहा। ज़ुबान तक आया, पर होंठ रुक गए।

"बोल," रज़िया ने कहा। "बोल ना। मैं कहाँ थी, पूछ।"

"मैं नहीं पूछूँगी," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ पहले से भारी थी।

"क्यों?"

"क्योंकि जवाब का डर है," शबनम आपा ने कहा।

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