The Mysterious Bell – Chapter 832
दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर कुछ था — आधी मुस्कान, आधी चेतावनी।
"अब बात समझ आई," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रखना, बेटा — डर से बचने की जल्दबाज़ी में आदमी कभी-कभी उसी जाल में चला जाता है जो उसने खुद बुना था।"
"इसलिए क्या करें?"
"यह काग़ज़ फाड़ो मत," दुबे अंकल ने कहा। "और मानो भी मत। यह काग़ज़ उतारकर रख दो, इसकी नक़ल करो, और जब असली तारीख़ आए, तब सवाल करो। काग़ज़ का जवाब काग़ज़ से।"
मैंने सिर हिलाया।
"मीरा," मैंने कहा। "काग़ज़ की फोटो ले। दो — एक सामने की, एक मोहर की।"
मीरा ने कैमरा उठाया। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर कैमरा स्थिर था। यही उसका हुनर है।
"अंकुश," टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची। "देख — शबनम आपा अंदर क्यों गईं?"
मैंने गुमटी की तरफ़ देखा।
शबनम आपा गुमटी के पीछे वाले कमरे की तरफ़ जा रही थीं। और उनके हाथ में कुछ था। एक लिफ़ाफ़ा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा। उसने कैमरा नीचे कर दिया।
"मैं चलूँ?" मीरा ने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं जाऊँगा। अकेला।"
"अंकुश—"
"मीरा," मैंने कहा। "कोई औरत पंद्रह साल से जिस कमरे में बंद है, उसके दरवाज़े पर भीड़ लेकर नहीं जाते। उसके दरवाज़े पर चाय लेकर जाते हैं।"
मैं गुमटी के पीछे गया।
वो कमरा छोटा था। एक चारपाई, एक लोहे की अलमारी, और एक पुरानी तिपाई जिस पर कपड़े रखे थे। शबनम आपा उस अलमारी के पास खड़ी थीं। उनके हाथ में लिफ़ाफ़ा था और वो उसे वापस अलमारी में रखने वाली थीं, पर रख नहीं पा रही थीं।
"शबनम आपा।"
उन्होंने पलटकर नहीं देखा।
"मैं तुमसे माफ़ी नहीं माँगूँगी," उन्होंने कहा।
"मैं माँगने आया भी नहीं हूँ।"
"तो?"
"मैं चाय लेने आया हूँ," मैंने कहा। "पर आपने चीनी डालनी भूल गई थी।"
वो एक पल रुकीं। फिर उन्होंने कंधे पर से देखा। उनकी आँखें लाल थीं, पर सूखी।
"तू चालाक है," उन्होंने कहा। "बाप के जैसा।"
"बाप से कम," मैंने कहा।
उन्होंने लिफ़ाफ़ा वापस अलमारी में रखा और उसका दरवाज़ा वापस बंद किया। फिर वो चारपाई पर बैठ गईं।
"मुझे पता है यह काग़ज़ किसने लगवाया," उन्होंने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"पिछले महीने," शबनम आपा ने कहा, "एक आदमी आया। सफ़ेद कुर्ता। मेरे पास बैठा। चाय पी। फिर बोला — शबनम बाई, तुम्हारी गुमटी की जगह अच्छी है। बेच दो, अच्छे पैसे मिलेंगे।"
"आपने क्या कहा?"
"मैंने कहा, चाय के पैसे दे और निकल," शबनम आपा ने कहा। उनकी आवाज़ में थोड़ी सी वो पुरानी कड़क लौटी। "फिर उसने कहा — तुम्हारी बहन भी इसी गली में रहती थी न? हम जानते हैं वो कहाँ है।"
मेरी साँस रुकी।
"मैंने चिमटी उठाई," शबनम आपा ने कहा। "वो हँसा। फिर चला गया।"
"आपने किसी को क्यों नहीं बताया?"
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं। बहुत देर तक।
"क्योंकि रज़िया को लेकर कुछ है जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताया," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ अब एकदम धीमी थी, ऐसी धीमी जैसे कोई सपने में बोलता हो। "पंद्रह साल पहले मैंने वो कह दिया था जो नहीं कहना चाहिए था। एक ऐसी बात, जिससे रज़िया का घर बिखरा। मैंने सच कहा था, अंकुश। मैंने सच कहा था — पर उस वक़्त नहीं कहना चाहिए था।"
और ठीक उसी वक़्त, जेब में, मेरी घंटी ठंडी हो गई।
बर्फ़ जैसी नहीं — ऐसी ठंडी जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घूम गई हो और अंदर कुछ हिल गया हो।
फिर वो एक बार बजी।
हल्की। धीमी। जैसे कोई दरवाज़ा अपने आप खुल रहा हो।
मैंने घंटी निकाली। वो मेरी हथेली पर रखी थी — छोटी, पीतल की, पुरानी — और अब भी उसमें एक कंपन बचा था।
"अंकुश?" शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
मैंने घंटी देखी। फिर उन्हें देखा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस… बस एक आवाज़ आई।"
"कैसी आवाज़?"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि वो आवाज़ मैंने सुनी थी, पर उसके लिए कोई शब्द मेरे पास नहीं था।
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा और फिर वो गईं — गुमटी के बाहर। मैं उनके पीछे गया।
पीपल के नीचे सब अब भी खड़े थे। रज़िया नाली के किनारे बैठी थी, चुनरी गोद में। भोला भाई अब भी काग़ज़ की नक़ल हाथ में लिए थे। नसीमा बाई ने उन्हें कुछ कहा था और वो अब इधर देख रहे थे। उस्ताद चुप खड़े थे।
शबनम आपा चबूतरी तक आईं। वो रज़िया के सामने रुकीं।
उन्होंने केतली उठाई — वही केतली जो अब भी गुमटी के बाहर रखी थी — और एक गिलास में चाय डाली। इस बार चीनी भी डाली।
उन्होंने वो गिलास रज़िया की तरफ़ बढ़ाया।
"पी ले," उन्होंने कहा।
रज़िया ने गिलास नहीं पकड़ा।
"और बाद में," शबनम आपा ने कहा, "जो कहना है, कह लेना। पर पहले पी ले। तू सुबह की बस से आई है। पता नहीं कब से भूखी है।"
रज़िया ने उनकी तरफ़ देखा।
कुछ पल के लिए ऐसा लगा कि वो गिलास पटक देगी। पर फिर उसने गिलास पकड़ा। दोनों हाथों से।
वो पीने लगी — और पीते-पीते रोने लगी। चाय में आँसू गिर रहे थे और वो पी रही थी।
शबनम आपा ने उसके सिर पर हाथ रखा। उनकी उँगलियाँ उसके बालों में फँसी रह गईं। वो कुछ नहीं बोलीं।
मैंने देखा — उनका हाथ काँप रहा था। पर उन्होंने हाथ नहीं हटाया।
मैंने दुबे अंकल की तरफ़ देखा। वो अपनी छड़ी पर झुके खड़े थे और उनके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
"अंकुश," टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची। "घंटी… घंटी बजी थी?"
"हाँ।"
"पर मेरे हाथ में तो कुछ नहीं आया," उसने कहा। "न कोई अंक, न कोई आवाज़।"
मैंने सिर हिलाया।
"पता है क्यों?" मैंने कहा। "क्योंकि यह जोड़ पूरा नहीं हुआ। यह सिर्फ़ दरवाज़े का खुलना था। दरवाज़ा खुल गया है, पर अंदर कोई नहीं गया।"
"तो अंक कब मिलेंगे?"
"जब कोई अंदर जाएगा," मैंने कहा।
मीरा आई। उसके हाथ में काग़ज़ की नक़ल थी और फोन था।
"अंकुश," उसने कहा। "मैंने काग़ज़ की फोटो नगरपालिका के दफ़्तार भेज दी है।"
"किसको?"
"उसी क्लर्क को जो पिछले महीने मुझे शालिनी मैडम के काग़ज़ के बारे में मिला था," मीरा ने कहा। "वो डरा हुआ है, पर वो अंदर का आदमी है। मुझे लगता है यह काग़ज़ असली नहीं है।"
"असली नहीं है," दुबे अंकल ने कहा, और सब उनकी तरफ़ मुड़े। "पर इसे नकारने का सबूत भी चाहिए। वरना सोमवार सुबह कोई गाड़ी यहाँ आएगी और हम कहेंगे — काग़ज़ झूठा है, और वो कहेंगे — तुम्हारे पास काग़ज़ है? हम बस काग़ज़ देखते हैं
।"
"तो सबूत कहाँ से आएगा?" नसीमा बाई ने पूछा।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"इस काग़ज़ पर मोहर कहाँ की है?" मैंने पूछा।
"दफ़्तार की," उस्ताद ने कहा।
"असली मोहर कहाँ रहती है?"
"दफ़्तार में। लाइसेंस बाबू के दराज़ में।"
मैंने सिर हिलाया। "तो उस मोहर और इस मोहर में फ़र्क़ होगा।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। "अगर मोहर हाथ से बनी है, तो फ़र्क़ होगा।"
"और अगर असली मोहर है?" मीरा ने पूछा।
उस्ताद चुप रहे। फिर बोले, "तो फिर यह काग़ज़ बाहर से आया है, अंदर से नहीं।"
सब चुप हो गए।
मैंने पीपल के नीचे सबको फिर देखा।
"मेरी बात सुनो," मैंने कहा। "यह काग़ज़ डराने के लिए लगा है। और डर से कभी कोई काम ठीक नहीं होता। तो आज हम डर का काम करते हैं।"
"क्या मतलब?" भोला भाई ने पूछा।
"मतलब यह कि गुमटी, दुकान, ठेला, झोपड़ी — हम इन्हें खाली नहीं करेंगे," मैंने कहा। "आज हम इन्हें भरेंगे।"
"क्या?"
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