The Mysterious Bell – Chapter 824
मैंने पेंच घुमाना बंद कर दिया।
अब मैं उसे अच्छी तरह देख रहा था। अंधेरे में मुझे उसका चेहरा ठीक से नहीं दिख रहा था, पर उसकी आवाज़ में जो था, वो मुझे दिख रहा था। वो डर नहीं रहा था — वो डर को छिपा नहीं पा रहा था। और डर छिपाने की कोशिश में आदमी की आवाज़ हमेशा थोड़ी ऊँची हो जाती है।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
धीरे से। बिना आवाज़। वो मेरी हथेली पर ठंडी पड़ी थी — आज पहली बार इतनी ठंडी। जैसे किसी ने उसे बरफ़ में रख दिया हो।
“साहब,” मैंने कहा।
“हूँ।”
“जो चीज़ आपके गले में जल रही है, वो बेचने की चीज़ नहीं है।”
वो रुका।
“वो लौटाने की चीज़ है,” मैंने कहा।
“क्या बक रहा है तू?”
“और जलती चीज़,” मैंने कहा, “पास आने पर ही ठंडी होती है। दूर रखने पर नहीं।”
मैं उठा। कुर्सी पीछे सरकी और उसकी टूटी टाँग ज़मीन पर घिसटी।
रणवीर ने पीछे हटना चाहा पर बेंच से टकरा गया। उसका हाथ अपने आप गले पर चला गया।
“तू पास मत आ,” उसने कहा।
“डरिए मत, साहब,” मैंने कहा। “मैं आपका कुछ नहीं छीन रहा। मैं सिर्फ़ दो चीज़ें पास ला रहा हूँ।”
मैंने अपनी हथेली खोली — घंटी उस पर पड़ी थी, बिना आवाज़, बिना हरकत।
और मैंने उसे धीरे से उसके सीने के पास ले जाना शुरू किया।
दूरी कम होती गई।
एक हाथ। आधा हाथ। चार उँगली। दो उँगली।
और फिर वो हुआ।
घंटी बजना बंद कर दी।
नहीं — वो पहले से नहीं बज रही थी। पर उसमें जो गरमी थी, जो कंपन था, जो ज़िंदगी थी — वो चली गई। मेरी हथेली पर एक ठंडी धातु रह गई। बस धातु। कोई आवाज़ नहीं, कोई धुन नहीं, कोई सवाल नहीं। जैसे किसी ने घंटी का मुँह बंद कर दिया हो।
और उसी पल — रणवीर के सीने के अंदर से एक आवाज़ आयी।
छोटी सी। चटकने जैसी।
उसने कुर्ता खोला। ताबीज़ बाहर आया।
और वो बुझ चुका था।
न लाल किनारा, न पीला बिंदु, न कोई लकीर। सिर्फ़ एक गोल, मैला, जंग लगा पीतल का टुकड़ा। जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी उतारकर गले में लटका दी गई हो।
मैंने अपनी घंटी को देखा। वो भी वैसी ही थी — मेरी हथेली पर एक मरी हुई चीज़।
और मेरे अंदर जो हमेशा से एक धीमी आवाज़ रहती थी — जो मुझे बताती थी कि पीछे क्या है, आगे क्या है, कौन टूट रहा है, कौन जुड़ रहा है — वो आवाज़ चली गई।
मैं अंधेरे में खड़ा था, और मेरे अंदर भी अंधेरा था। जैसे कोई चीज़ अचानक साँस लेना भूल गई हो।
“ये क्या किया तूने?” रणवीर ने कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी। “ये क्या किया?”
उसने ताबीज़ पकड़ा। हिलाया। फिर ज़ोर से हिलाया। फिर उसे अपनी छाती से लगा लिया, दोनों हाथों से, जैसे कोई बच्चा खोई हुई चीज़ को सीने से चिपका लेता है।
“बोल!” वो चिल्लाया। “बोल न! तू रोज़ बोलता है! रोज़ रात को!”
कोई जवाब नहीं आया।
मैंने देखा कि उसके हाथ काँप रहे थे। असली काँपना। वो काँपना जो आदमी अपने हाथों से नहीं रोक सकता।
उसने ताबीज़ को ज़मीन पर पटक दिया।
फिर तुरंत उठा लिया। झुककर, घुटनों के बल, अंधेरे में टटोलकर, धूल में।
ये वो आदमी था जो टीवी पर हाथ जोड़कर खड़ा होता था। जिसकी तस्वीर भारद्वाज भवन के बाहर लगी थी। जिसके जूते इतने साफ़ थे कि गली की धूल उनसे अलग लगती थी।
अब वो घुटनों के बल बैठा था, और एक मैले पीतल के टुकड़े को अपनी हथेली में लेकर देख रहा था, जैसे कोई माँ अपने बेटे का चेहरा देखती है।
मैंने घंटी को जेब में रखा।
“साहब,” मैंने कहा।
वो नहीं उठा।
“साहब।”
“क्या?” उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी।
“देखा आपने?”
उसने गर्दन उठायी। उसकी आँखों में अब अंधेरा नहीं था — उसमें कुछ और था। जैसे किसी जानवर को पहली बार पिंजरे की सलाखें दिख जाएँ।
“आपका बीमा,” मैंने कहा, “मेरे पास आते ही बेकार हो गया। एक पल में। बिना आवाज़। बिना धमाके।”
मैं उसके सामने झुका। नीचे। बेंच के पास। इतना नीचे कि हमारी आँखें एक सतह पर आ जाएँ।
“अब सोचिए, साहब,” मैंने कहा। “अगर दोनों पूरी हो जाएँ, तो क्या होगा?”
उसने कुछ नहीं कहा।
“आपका ताबीज़ मेरी घंटी के पास आते ही बुझ गया,” मैंने कहा। “ये तो आधा था। आधा मेरा, आधा आपका। और आपका आधा मेरे पास आया तो डर गया।”
मैं उठा।
“अब सोचिए — जिस दिन ये दोनों पूरे होंगे, उस दिन कौन किसके पास आएगा?”
तंबू के पीछे सन्नाटा था।
आगे मैदान में लाउडस्पीकर अब भी बज रहा था। कोई बच्चा हँस रहा था। किसी ने ढोल बजाया। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी, और यहाँ, सफ़ेद कपड़े के पीछे, एक आदमी घुटनों के बल बैठा था और अपने गले की चीज़ को वापस ज़िंदा करने की कोशिश कर रहा था।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और माचिस का डिब्बा टटोला। तीन बत्तियाँ अब भी अंदर थीं। मैंने उसे खोला नहीं। मैंने बस उसे महसूस किया — जैसे कोई आदमी अंधेरे में दीवार टटोलता है।
और तभी रणवीर उठा।
धीरे से। कोई जल्दी नहीं। उसने घुटनों पर लगी धूल को दो बार झटका। फिर उसने अपनी कमीज़ के बटन बंद किये — एक-एक करके, ऊपर से नीचे तक। बटन बंद करते वक़्त उसके हाथ नहीं काँपे। बिल्कुल नहीं।
उसने अपने कुर्ते की बाँह ठीक की।
और फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
वो मुस्कुराया नहीं।
यही सबसे डरावनी बात थी। इस आदमी ने आज तक हर हाल में मुस्कुराना नहीं छोड़ा था। गाली खाकर मुस्कुराया। पकड़ा गया तो मुस्कुराया। मंच पर शर्मिंदा हुआ तो मुस्कुराया। पर अब — अंधेरे में, बेंच के पास, अपना बुझा हुआ ताबीज़ जेब में डालकर — वो मुस्कुराया नहीं।
उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उस पर से पेंट उतार दिया हो।
“अंकुश,” उसने कहा। आवाज़ बिल्कुल सपाट। “तू समझता है कि तूने मुझे कुछ दिखा दिया।”
“मैंने कुछ नहीं दिखाया, साहब। आपने खुद देखा।”
“नहीं,” उसने कहा। “तूने मुझे ये दिखाया कि तू कितना छोटा है।”
मैं हँसा। सच में हँसा।
“ये कैसे?”
“क्योंकि तूने ये सोचा कि मैं इस ताबीज़ से चलता हूँ,” उसने कहा। “तूने सोचा कि मैं इसे उतार दूँ तो गिर जाऊँगा। तू अभी भी सोचता है कि मेरी ताक़त उस पीतल के टुकड़े में है।”
उसने अपनी जेब से हाथ निकाला।
“तू अभी भी ये नहीं समझा, अंकुश, कि मेरी असली ताक़त किसमें है। वो इस ताबीज़ में नहीं है। वो इस शहर के काग़ज़ों में है। उन तारीख़ों में है। उन मुहरों में है। उन अंगूठों में है, जो मैंने अपने हाथ से नहीं लगवाए, बल्कि तेरे जैसे लोगों के हाथ से लगवाए, तेरे बाप के हाथ से लगवाए, तेरे मोहल्ले के बूढ़ों के हाथ से लगवाए — और वो लोग आज तक ये सोचते हैं कि उन्होंने मेरी मदद की।”
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
“ये देख।”
मैंने देखा।
उसकी हथेली में एक काग़ज़ था। मुड़ा हुआ। पुराना। किनारों से पीला। जिस तरह काग़ज़ मुड़ता है जब वो महीनों किसी जेब में रहा हो।
उसने उसे खोला।
नक़्शा था।
लाइनों से बना, हाथ से खींचा हुआ, किसी पुराने सरकारी नक़्शे की कॉपी। मैंने उस पर नज़र दौड़ायी — और मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
गली।
मेरी गली।
लकीरों से बनी। दो साइड में घर। बीच में पीपल। नीचे नाली। और एक तरफ़ — मेरी दुकान। उस पर एक छोटा चौकोर।
और उसी चौकोर पर एक लाल गोला।
“देख,” रणवीर ने कहा। “इस नक़्शे में तेरा घर भी है।”
उसकी उँगली चली। एक लकीर पर। दूसरी लकीर पर।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno