The Mysterious Bell – Chapter 825
“और ये लाल गोला,” उसने कहा, “जो तेरे घर पर लगा है —”
उसने उँगली रोक ली।
“— ये मेरा हाथ है।”
मैंने उस लाल गोले को देखा।
वो छोटा था। मेरे नाखून से बड़ा नहीं। एक लाल गोला, जो किसी पुरानी लाल पेंसिल से बनाया गया था, और उसके चारों तरफ़ काग़ज़ थोड़ा सा दबा हुआ था — जैसे उसे बनाते वक़्त किसी ने ज़ोर लगाया हो।
और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, कुछ लिखा था।
मैंने झुककर देखा।
रणवीर ने नक़्शा थोड़ा ऊपर किया, ताकि मैं पढ़ सकूँ।
लिखा था — साइकिल गली। सातवाँ नंबर।
॥
मैंने नक़्शे पर नज़र दौड़ाई और मेरे अंदर कुछ और ठंडा हुआ।
पहले मुझे सिर्फ़ गली दिखी थी। अब मैंने पूरा काग़ज़ देखा।
वो सिर्फ़ गली का नक़्शा नहीं था। उस पर अस्पताल था। नूर अस्पताल — उसकी पीली दीवारें लकीरों से बनी हुई, गेट पर छोटा चौकोर, और पीछे वाला प्लॉट, जहाँ आज सुबह मशीन आने वाली है। उसके बगल में बाज़ार था। मोहल्ले का बाज़ार — किराने की दुकान, हलवाई, पान वाला, सब छोटे-छोटे चौकोरों में। और उसके पीछे — झुग्गी।
और ये सब — अस्पताल, गली, बाज़ार, झुग्गी — एक साथ जोड़कर एक बड़े लाल घेरे में बंद कर दिया गया था।
जैसे कोई माली अपने पूरे बाग़ को घेर देता है, पर वो बाग़ उसने बोया नहीं होता। ज़मीन दूसरों की होती है। बस घेरा उसका अपना होता है।
मैंने नक़्शे को करीब से देखा।
और मेरी नज़र मेरे ही घर की छत पर गई।
मेरी छत।
जहाँ से काजल के साथ रात को बैठकर मैं पूरी गली देखता था। जहाँ पुरानी ईंट रखी थी, जिस पर बैठकर पापा ने एक बार मुझे वो बात बताई थी जो उन्होंने किसी से नहीं कही थी।
उस छत पर — लाल स्याही से गोला बना हुआ था।
वही गोला जो दुकान पर था। यही गोला। वही लाल पेंसिल।
मैंने देखा — उस गोले के नीचे भी वही लिखा था। साइकिल गली। सातवाँ नंबर।
मुझे उस गोले में कुछ और दिखा। छोटी-छोटी हल्की लकीरें। जैसे कोई चीज़ मिटाने की कोशिश की गई हो, फिर मिट न पाई हो। जैसे पहले वहाँ कुछ और लिखा था, और बाद में उसके ऊपर गोला बना दिया गया।
रणवीर मेरा चेहरा देख रहा था।
वो पहले जैसा मीठा नहीं बोला। इस बार उसकी आवाज़ में वो चीनी नहीं थी। उसमें सिर्फ़ एक ठंडी, सपाट, काम की बात थी।
“देख,” उसने कहा। “तेरी गली से लेकर अस्पताल तक, बाज़ार से झुग्गी तक — ये पूरा एक टुकड़ा है। एक साथ। एक साथ जुड़ा हुआ।”
मैंने अपना गला साफ़ किया।
“किसने जोड़ा?”
“मैंने।”
“कब?”
“जब तू साइकिल ठीक कर रहा था।”
उसने काग़ज़ को मोड़ना शुरू किया — धीरे-धीरे, कोनों से।
“और अब सुन, अंकुश,” उसने कहा। “तू अपनी गली में रिश्ते जोड़ता रह। अपनी घंटी बजाता रह। लोगों को मिलाता रह। मुझे कोई दिक्कत नहीं।”
उसने मोड़ा हुआ काग़ज़ जेब में डालने के लिए उठाया।
“पर ज़मीन के काग़ज़ जोड़ने का काम मेरा है,” उसने कहा। “और ये नक़्शा —”
उसने मोड़ा हुआ नक़्शा मेरी आँखों के सामने हिलाया।
“— ये नक़्शा कल सुबह दस बजे वकील के दफ़्तर जाएगा। वहीं से रजिस्ट्री की तारीख़ तय होगी। और तेरे पास उससे पहले —”
उसने जेब में नक़्शा डाला।
“— कुछ नहीं है।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैं उस नक़्शे को देख रहा था — जाते-जाते, उसके कोने को, जो मोड़ते वक़्त मेरी आँखों के सामने से गुज़रा था।
उस कोने पर एक मोहर थी।
पुरानी। फीकी। धुँधली। इतनी धुँधली कि अगर आप ध्यान से न देखें तो लगेगा काग़ज़ ही पुराना है। पर मैंने देखा — क्योंकि उस्ताद ने मुझे सिखाया था कि मोहर कभी मिटती नहीं, सिर्फ़ उम्र बढ़ती है, और उम्र के साथ वो अकड़ती है, टेढ़ी होती है, पर रहती है।
उस कोने में दो पंक्तियाँ थीं।
ऊपर वाली में सात नाम। छोटे-छोटे। नीली स्याही में, जो अब भूरी पड़ चुकी थी।
और नीचे — आठवीं लाइन।
वो लाइन खाली थी।
बिल्कुल खाली नहीं। उस पर किसी का अंगूठा लगा था।
अंगूठे का निशान साफ़ था। और उसके नीचे तारीख़ भी। पर नाम — नाम नहीं था।
जैसे कोई आया, अंगूठा लगा गया, और उसका नाम लिखना भूल गया।
या जैसे किसी ने जान-बूझकर नाम नहीं लिखा।
मैंने एक लंबी साँस ली। मेरी जेब में हाथ गया — घंटी की तरफ़। वो ठंडी थी। बेज़ान। जब से रणवीर के ताबीज़ के पास गई थी, उसके भीतर की आवाज़ भी गई थी।
पर मैंने उसे जेब में पकड़ा।
और मैं मुड़ा।
बिना कुछ कहे।
रणवीर मेरे पीछे कुछ कह रहा था। शायद कोई बात, कोई चेतावनी, कोई मुस्कान भरी धमकी। पर मैंने सुना नहीं। मैं तंबू से बाहर आ गया।
बाहर मैदान में रोशनी अभी बाक़ी थी। आसमान में धूल जमी थी, जैसे किसी बड़े शहर का धुआँ रास्ता भूलकर यहाँ बैठ गया हो। मैदान में लगी बत्तियों की पीली रोशनी में लोग धीरे-धीरे बिखर रहे थे।
मैंने मीरा को देखा।
वो कैमरा उतार रही थी। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे। उसने मुझे देखा और उसका चेहरा पहले सवाल बना, फिर जवाब। मैंने ज़ोर से नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ अपनी ठुड्डी से गुमटी की तरफ़ इशारा किया।
और मैं चल पड़ा।
मैं मैदान से बाहर निकला। सड़क पार की। मोहल्ले की गली में घुसा। गली में मशीन का शोर अभी भी था — दूर, धीमा, पर था। जैसे कोई बड़ा जानवर सो रहा हो और सपने में कराह रहा हो।
गुमटी पर सब पहले से थे।
शबनम आपा चूल्हे पर कुछ बना रही थीं। कौशल्या दादी कोने वाले स्टूल पर बैठी थीं, उनकी लाठी सामने टिकी थी। शांति देवी उनके बगल में, ओढ़नी से चेहरा ढँके। उस्ताद अली बक्श ट्रंक के पास खड़े थे, ट्रंक अभी भी उनके हाथ में था — जैसे उन्होंने उसे ज़मीन पर रखना ही नहीं चाहा। याकूब लाठी पर झुके बैठे थे। काजल बेंच पर थी, और उसके पास — पापा।
पापा आए थे।
मैंने उन्हें देखकर आँखों में कुछ और देखा। वो सीधे नहीं बैठे थे। वो झुके बैठे थे, कंधे गिरे हुए। पर वो थे। यहाँ थे। मेरे पास।
और चारों जासूस — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ — पीपल की चबूतरी से चलकर गुमटी तक आ गए थे। चिंटू अपनी माँ के साथ दूर खड़ा था।
मैंने नक़्शा — उसकी बात, उसका लाल गोला, उसकी मोहर, उसका वकील — सब एक साथ रखा।
और मैंने कहा।
“अस्पताल, गली, बाज़ार और झुग्गी। सब एक टुकड़े में जोड़ दिया है। मेरी छत पर भी लाल गोला है। और कल सुबह दस बजे ये नक़्शा वकील के दफ़्तर जाएगा।”
सन्नाटा।
शबनम आपा की कड़ाही में तेल चटका।
“मोहर?” कौशल्या दादी ने पूछा। उनकी आवाज़ गरम थी, जैसे किसी पुरानी चीज़ को पहचान लिया हो।
“हाँ। नक़्शे के कोने पर। सात नाम ऊपर। और आठवीं लाइन खाली। उस पर सिर्फ़ अंगूठा और तारीख़।”
कौशल्या दादी ने अपनी लाठी की गोली ज़मीन पर टिकाई। ज़ोर से।
“मुझे दिखा,” उन्होंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैंने उन्हें नक़्शा नहीं दिया — मेरे पास नक़्शा नहीं था। पर मैंने उन्हें अपनी उँगली से हवा में समझाया — मोहर की जगह, आकार, उसकी धुँधली स्याही।
दादी की आँखें बंद हुईं।
“ये मोहर,” उन्होंने धीरे से कहा, “पुरानी नगरपालिका की है। वो नगरपालिका जो पचास साल पहले जल गई थी। जली नहीं। उसे जलाया गया था। और उसके सारे काग़ज़ जल गए। सिर्फ़ ये मोहर — ये मोहर उन काग़ज़ों पर बची रह गई थी, जो उस रात जल नहीं पाए थे।”
उन्होंने आँखें खोलीं।
“और वो आठवीं लाइन,” उन्होंने कहा। “वो कभी भरी ही नहीं गई। उस पर आज तक नाम नहीं लिखा गया।”
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