The Mysterious Bell – Chapter 819
और तभी, भीड़ के पीछे से, एक मीठी आवाज़ आई।
"बेटा!"
मैं मुड़ा।
और मैंने अपनी साँस रोक ली।
सफ़ेद कुर्ता, सोने के रंग के किनारे वाली फ़ाइल हाथ में, मुँह पर वो मुस्कान जो किसी गुड़ की डली जैसी मीठी लगती है — और आँखों में वो चीज़ जो मुस्कान के पीछे रहती है, कहीं दूर, कहीं गहरे, जहाँ कोई नहीं देखता।
चंद्रेश सक्सेना।
और उसके पीछे — दो खाकी वर्दी वाले।
सभा में हल्की सरसराहट फैल गई। कुछ औरतें उठकर खड़ी हो गईं। शबनम आपा ने अपनी थाली मेज़ पर रखी — इतनी ज़ोर से कि कटोरियाँ खनक उठीं।
सक्सेना मेरे पास आया। बिल्कुल मेरे पास। इतना पास कि उसकी कुर्ते से नीम की पत्तियों की हल्की गंध आई।
और फिर उसने उँगली उठाई।
उँगली उठाकर उसने टिंकू की तरफ़ इशारा किया — पर उँगली का सिरा ठीक टिंकू के सीने पर नहीं, मेरे सीने पर टिका। मैंने देखा, भीड़ को लगेगा वो टिंकू को दिखा रहा है। पर उँगली मेरी थी।
"यही लड़का है," सक्सेना ने कहा, और उसकी आवाज़ में वही मिठास थी, जैसे कोई बच्चों को कहानी सुना रहा हो, "यही लड़का। इसकी दुकान से साहब की चीज़ें निकलेंगी।"
मैदान में सन्नाटा।
"सक्सेना साहब," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मुझे खुद ही अजीब लगी — शांत, बहुत शांत, "आपने अभी कहा — साहब की चीज़ें। साहब कौन?"
सक्सेना मुस्कुराया। उसकी मुस्कान एक इंच भी नहीं हिली।
"बेटा, तुम मेरे सामने वकालत मत करो," उसने कहा। "मैं तुम्हारे पापा को जानता हूँ। तुम्हारे दादा को भी जानता हूँ। मैं तुम्हारे खानदान का वो हिस्सा जानता हूँ, जो तुम अभी नहीं जानते। और आज — मैं बहुत सारी बातें भूल आया हूँ, बेटा। आज मैं सिर्फ़ सच लेकर आया हूँ।"
"सच?" मैंने कहा।
"सच," उसने कहा, और उसने अपनी फ़ाइल खोली। उसमें से एक काग़ज़ निकाला — मोटा, मोड़ा हुआ, ऊपर नीली मोहर। "तुम्हारी दुकान का काग़ज़ है या नहीं? नहीं है। तुम्हारे पापा ने अंगूठा लगाया है या नहीं? लगाया है। अब देखो — यह काग़ज़ क्या कहता है?"
उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने पढ़ा।
मैंने पढ़ा और मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"यह काग़ज़ कहता है," सक्सेना ने माइक की तरफ़ मुँह घुमाकर कहा, ताकि पूरा मैदान सुन सके, "कि इस गली की दुकानों में जो सामान साहब के नाम पर आया, वो साहब का ही है। और जो सामान साहब का है, वो अगर किसी की दुकान से निकले — तो उसे चोरी कहते हैं, बेटा।"
"सक्सेना साहब," मैंने धीरे से कहा, "इस काग़ज़ पर मेरे दादा का नाम है। मेरे पापा का अंगूठा है। पर इसमें मेरा नाम नहीं है।"
सक्सेना रुका। बस एक पल के लिए। बहुत छोटा पल — पर मैंने देखा।
"तुम्हारा नाम आ जाएगा," उसने कहा। "आज शाम। यहीं। सबके सामने।"
और फिर वो पुलिस वाले की तरफ़ मुड़ा और उसने सिर हिलाया।
उसका पहला पुलिस वाला मेरे पास आया — पतला, लंबा, मुँछों वाला, जिसकी वर्दी में चाय का एक हल्का सा धब्बा था — और फिर उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया।
वो हाथ भारी था। असली भारी। ऐसा भारी जितनी किसी तेरह साल की बात नहीं होती।
और मेरी जेब में घंटी — घंटी ने अपनी सबसे छोटी आवाज़ में, सबसे दबी हुई आवाज़ में, बस इतना कहा:
"चुप मत रहना।"
सक्सेना मुस्कुराया। उसने अपनी फ़ाइल सीने से लगाई, अपना सफ़ेद कुर्ता ठीक किया, और फिर बड़ी मीठी आवाज़ में कहा —
"बेटा, जेबें खाली करो। सबके सामने। आज मैदान में ही सच निकल जाए।"
॥
मैदान में सन्नाटा ऐसा छाया कि दूर बड़े तालाब की लहर भी सुनाई देने लगी।
मैंने सुना है लोग कहते हैं कि सन्नाटे में आदमी अपनी साँस तक सुन सकता है। आज सुन लिया। मेरी साँस सुनाई दे रही थी, और साथ में उस्ताद की साँस भी — जैसे कोई पुरानी सिलाई मशीन रुक गई हो और उसकी टिक-टिक बंद हो गई हो।
पुलिस वाले का हाथ मेरे कंधे पर था। भारी। मैंने धीरे से हाथ नीचे किया — मैंने ज़ोर नहीं लगाया, बस अपनी तरफ़ से हल्का सा दबाव दिया, जैसे कोई टेढ़ा बोर्ड सीधा करता है।
“बेटा, जेबें खाली करो। सबके सामने।”
सक्सेना की आवाज़ में वो मिठास थी जो दूध में घोला गुड़ जैसी होती है — देखो तो लगता है मीठा है, पीओ तो पता चलता है कि मिठास के पीछे कुछ और भी है।
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा। फिर भीड़ की तरफ़। सामने पहली पंक्ति में माँ की जगह खाली कुर्सी थी। उस कुर्सी को देखकर मेरे अंदर कुछ ठंडा सा उतर गया — न डर, न गुस्सा। बस एक सीधी सी बात। माँ यहाँ नहीं है। काजल यहाँ नहीं है। माँ अस्पताल में है, और अगर मैं यहाँ गलत हिला, तो कल माँ की दवा वाले काग़ज़ पर कोई नई स्याही लग जाएगी।
तो मैं हिला नहीं।
मैंने अपना थैला उस्ताद से लिया। उस्ताद ने बिना कुछ कहे दिया, पर उनकी उँगलियों ने थैले का किनारा एक पल ज़्यादा पकड़े रखा। जैसे कोई बूढ़ा दर्ज़ी आख़िरी टाँका लगा रहा हो और उँगली न छोड़ना चाहता हो।
मैंने थैला ज़मीन पर रखा। उसकी ज़िप खोली। और फिर अपनी जेबें खाली करने लगा।
तुम सोच रहे होगे — जेबें खाली करने में क्या है? दो मिनट का काम। तो सुनो आगे।
मेरी पहली जेब से निकला — ग्रीस लगा एक पुराना पेंच।
वो पेंच जिसे मैंने तीन हफ़्ते पहले वो पुरानी लाल साइकिल की सीट कसने में लगाया था, और बाद में जब सीट फिर ढीली हुई तो वो पेंच निकलकर मेरी जेब में गिर गया था। पेंच पर ग्रीस ऐसी जमी थी जैसे कोई बच्चा अँगुली से नाम लिख गया हो।
मैंने वो पेंच सक्सेना के सामने रख दिया और कहा, “ये साहब की चीज़ नहीं है। ये साइकिल की चीज़ है। और साइकिल मेरी है।”
भीड़ में कोई हँसा। हल्की सी हँसी — पर हँसी ज़रूरी थी। क्योंकि जब किसी को डराना हो, तो सबसे पहले हँसी मारनी पड़ती है।
सक्सेना ने हँसी को नज़रअंदाज़ किया। ठीक वैसे जैसे बारिश को छाता।
दूसरी जेब से निकली — माचिस।
साधारण माचिस। लाल डिब्बी, ऊपर छोटा सा लोहे का पत्थर, और उस पर कोई पुराना नंबर — आधा घिसा हुआ। डिब्बी हिलाई तो अंदर तीन बत्तियाँ खड़खड़ाईं।
मैंने डिब्बी सक्सेना के सामने रखी।
“इसमें तीन बत्तियाँ हैं,” मैंने कहा। “ये मुझे बबलू भाई ने दी थीं — ये कहकर कि टॉर्च बुझ जाए तो काम आएँगी। अब बताइए, साहब की दुकान में इतनी छोटी माचिस भी रखी जाती है?”
“चुप रहो,” सक्सेना ने कहा — पर मिठास के साथ। उसकी मिठास कभी नहीं गिरती। जैसे कोई आदमी सुबह उठकर मुस्कान पहन लेता है और रात को सोने से पहले उतारता है।
तीसरी जेब से निकला — चाक।
सफ़ेद चाक का आधा टुकड़ा। जिसे मैंने उस रात जेब में रखा था, जब हमने तहखाने की सीढ़ियाँ गिनी थीं। चाक का एक सिरा घिस गया था, दूसरा धारदार। जब मैंने उसे सक्सेना के सामने रखा, तो चाक की धूल उड़कर हवा में तैर गई — सफ़ेद, हल्की, दीये की रोशनी में सोने जैसी।
“ये?” सक्सेना ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार हल्का सा झुंझलाहट आई। चाक उसकी समझ में नहीं आ रही थी।
“ये मेरी याददाश्त है,” मैंने कहा। “जब भी कोई चीज़ मुझसे छूटती है, मैं उसे चाक से नाप लेता हूँ। ताकि बाद में पता चले कि कहाँ छूटी थी। आपने कभी नापा है साहब? अपनी छूटी हुई चीज़ें?”
सक्सेना ने चाक की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उसकी मुस्कान एक इंच भी न हिली। मगर उसकी उँगलियाँ ज़रूर हिलीं — फ़ाइल के किनारे पर नाखून भींच गए। मैंने देखा। छोटी चीज़ है, पर मैंने देखा।
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