The Mysterious Bell – Chapter 815
"तू वहाँ गिरेगा नहीं," मैंने कहा। "तू वहाँ बहादुरी का नाटक नहीं करेगा। तू वहाँ मेरे साथ खड़ा रहेगा, मेरी तरफ़ देखता रहेगा, और अगर मैं कहूँ कि भाग, तो बिना पूछे भागेगा।"
टिंकू ने एक पल सोचा।
"मान लिया," उसने कहा। "पर मेरी चौथी चाबी मेरे पास रहेगी।"
"रहेगी।"
सानिया आगे आई।
"और हम?" उसने कहा। "हम पाँचों?"
"तुम पाँचों का काम सबसे ज़रूरी है," मैंने कहा। "तुम मैदान के बाहर रहोगे। तुम्हारे हाथ में काग़ज़ होंगे — वो काग़ज़ जिन पर लिखा है कि मेरा नाम गलती से लिया गया। और जब भी मैदान में से कोई बाहर आए, तुम उसे वो काग़ज़ दोगे और कहोगे — पढ़ो, और अपना नाम हटवाओ।"
"और अगर कोई न पढ़े?" गुड्डू ने पूछा।
"तो तुम ज़ोर से पढ़कर सुनाओगे," मैंने कहा। "एक बच्चा जब ज़ोर से पढ़ता है, तो बड़ा सुनता है। यही हमारा हथियार है। हमारे पास लाठी नहीं है, हमारे पास आवाज़ है।"
शबनम आपा ने तब कहा, "अब सब अंदर आ जाओ।"
हम अंदर गए। गुमटी के पीछे वाली जगह में अब सबसे पहले माँ का स्टील का डिब्बा आया, जिसे काजल उठाकर लाई थी। माँ ने उसे खोला।
अंदर दाल थी, रोटियाँ थीं, गुड़ था, अचार था और एक छोटा डिब्बा जिसमें हलवा था।
"किसने भेजा?" मैंने पूछा।
"माँ ने," काजल ने कहा। "अस्पताल से। उसने कहा कि मैं खुद नहीं आ सकती, पर मेरा डिब्बा आएगा।"
मैंने डिब्बे की तरफ़ देखा।
"और उसने ये भी कहा," काजल ने धीरे से कहा, "कि जो भी जाए, खाकर जाए। भूखे आदमी से न कोई जीतता है, न कोई हारता।"
आँगन में कुछ पल किसी ने कुछ नहीं कहा।
फिर उस्ताद अली बक्श ने अपनी टोपी उतारी और उसे अपने घुटने पर रखकर बोले, "मैं पचास साल में पहली बार किसी लड़ाई से पहले रोटी खाने बैठा हूँ। और मुझे अच्छा लग रहा है।"
शबनम आपा ने रोटियाँ बाँटनी शुरू कीं।
टिंकू ने पहला निवाला मुँह में डाला और बोला, "उस्ताद, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर आज रात सब ठीक हो जाए, तो कल सुबह क्या करेंगे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका मुँह रोटी से भरा था और आँखें बड़ी थीं, और उसमें वो सवाल था जो मैं खुद से नहीं पूछ पा रहा था।
"कल सुबह," मैंने कहा, "हम दुकान खोलेंगे। और किसी की टूटी साइकिल ठीक करेंगे।"
"बस?"
"बस," मैंने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है, टिंकू। जिस गली में सुबह दुकान खुलती है, वो गली कभी नहीं हारती।"
वो हँसा। उसके दाँतों के बीच रोटी थी और आँखों में पानी, और वो इस तरह हँसा कि मुझे अपनी हँसी याद आ गई — वो हँसी जो मैं चार दिन से भूल गया था।
तभी सानिया उठ खड़ी हुई।
वो इतनी ज़ोर से उठी कि उसकी थाली ज़मीन पर गिर गई और रोटी की आवाज़ से सब चौंक पड़े।
उसका चेहरा सफ़ेद था। उसका हाथ काँप रहा था।
"अंकुश भैया," उसने कहा। उसने अपनी साँस रोक ली थी, जैसे अंदर से कोई चीज़ बाहर नहीं आने देना चाहती हो।
"बोल, सानिया।"
"घोषणा हो गई है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फट गई। "मैदान के बाहर सफ़ेद कुर्ते वाले लड़के लाउडस्पीकर से बोल रहे हैं।"
"क्या बोल रहे हैं?"
सानिया ने सबकी तरफ़ देखा — शबनम आपा को, उस्ताद को, कौशल्या दादी को, और आख़िर में मुझे।
"वो बोल रहे हैं," उसने कहा, "कि साहब आज शाम अपने गले का ताबीज़ उस बच्चे को पहनाएँगे जो सबसे बहादुर निकलेगा।"
आँगन में जैसे हवा भी रुक गई।
मेरी जेब में घंटी गरम हो गई — इतनी गरम कि मेरी जाँघ पर जलन होने लगी।
मैंने उसे जेब से निकाला। वो मेरी हथेली पर रखी थी, और उसकी सतह पर वो दो लकीरें और बीच का बिंदु उभर रहा था — वही निशान जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था, वही जो बक्से की दीवार पर था।
"बोल," मैंने धीरे से कहा। "बोल, अब क्या करना है?"
घंटी ने एक पल इंतज़ार किया।
फिर उसकी आवाज़ आई — और वो पहली बार हँस रही थी। न गरम, न ठंडी। किसी बूढ़े की हँसी जैसी, जिसने पचास साल बाद अपना हिसाब बनते देख लिया हो।
"वो बच्चा तुझे चाहिए," घंटी ने कहा। "और वो ताबीज़ उसी बच्चे से छूटेगा।"
"कौन सा बच्चा?"
"जो उसके सामने खड़ा होकर कहेगा — मैं बहादुर नहीं हूँ, मैं तो सिर्फ़ सच्चा हूँ।"
मैंने गुमटी के पीछे से आँगन की तरफ़ देखा। दोपहर की रोशनी में गली की दीवारें पीली पड़ रही थीं और दूर मैदान की तरफ़ से लाउडस्पीकर की आवाज़ आ रही थी।
मैंने घंटी जेब में रखी, और मुड़कर अपनी टीम की तरफ़ देखा।
टिंकू खड़ा था — रोटी का टुकड़ा अब भी उसके हाथ में था, आँखें मेरी तरफ़, और चेहरे पर वो सवाल जो उसे पूछना था पर वो पूछ नहीं रहा था।
मैंने उसकी तरफ़ देखकर धीरे से कहा, "टिंकू, तेरी वो पर्ची अभी भी जेब में है न — जिस पर तूने लिखा था कि हम साइकिल नहीं लेंगे?"
उसने अपनी जेब टटोली और सिर हिलाया।
"तो उसे संभाल," मैंने कहा। "आज शाम कोई उसे पढ़ेगा। और वो पढ़ने वाला साहब खुद होगा।"
और पीछे, मैदान की तरफ़, लाउडस्पीकर ने फिर वही बात दोहराई — बहादुर बच्चा, साहब का ताबीज़, आज शाम छह बजे।
मैंने अपनी हथेली को जेब में दबाया, जहाँ घंटी गरम थी, और मुस्कुराकर सबसे कहा, "चलो, रोटी खत्म करो। आज शाम हमें बहादुर नहीं, सच्चा बनना है।"
॥
शाम छह बजे से पहले हम मैदान पहुँच गए थे।
बड़ा तालाब का मैदान — जहाँ मैंने पहली बार जंग लगी पुरानी साइकिल खरीदी थी, जहाँ कबाड़ी बूढ़े ने मुझे दो सौ रुपये में वो साइकिल दी थी और कहा था कि पुरानी दीवार से सटकर रहना — वही मैदान अब किसी दूसरी दुनिया जैसा लग रहा था।
दूर से ही दिख रहा था।
मैदान के बीच में लंबा सफ़ेद पंडाल खड़ा था। उसके ऊपर तीन बड़े बल्ब और दो मोटी लाइटें, जिनसे पूरा मैदान दूध जैसा सफ़ेद हो रहा था। घास के ऊपर लाल कालीन बिछा था, और कालीन के दोनों तरफ़ कुर्सियाँ — सफ़ेद कुर्सियाँ, एक जैसी, नई।
कुर्सियों के पीछे लगभग डेढ़ सौ लोग खड़े थे।
मैंने अपनी टोपी नीचे खींची। मज़दूर का भेस था — फटी बनियान के ऊपर मैली कमीज़, कंधे पर एक पुराना थैला, हाथों में ग्रीस से सने मोटे दस्ताने। उस्ताद ने कहा था कि मंच के पास मज़दूर ही खड़े होते हैं, इसलिए मैं वहीं खड़ा था।
मेरे पीछे टिंकू था — उसने अपनी घुटने की पट्टी ढीली कर ली थी। मैंने देखा, वो बार-बार उसे ऊपर खींच रहा था और फिर छोड़ दे रहा था, जैसे कोई तैयारी कर रहा हो।
"टिंकू," मैंने धीरे से कहा, "तू ऐसा क्यों कर रहा है?"
"उस्ताद," उसने कहा, "घुटने में चोट लगी हो तो कैसा लगता है, वो मुझे पता है। तीन साल पहले मैं स्कूल की सीढ़ी से गिरा था, तब से ये पट्टी मेरे साथ है। मुझे नाटक नहीं करना पड़ेगा।"
मैं हँसा। "तो तय है?"
"तय है।"
इतने में माइक पर आवाज़ आई।
"भाइयो और बहनो," एक मीठी आवाज़ गूँजी, "आज का दिन हमारे बच्चों के नाम। आज भारद्वाज फ़ाउंडेशन की तरफ़ से हर बच्चे को साइकिल और नई कॉपी दी जाएगी। और सबसे पहले, हमारे साहब — रणवीर भारद्वाज जी — को मंच पर बुलाते हैं।"
तालियाँ बजीं।
मैंने देखा — किनारे से रणवीर आ रहा था।
सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा, पैरों में सफ़ेद चमकते जूते। बाल साफ़ कटे, चेहरे पर वो मुस्कान जो किसी की माँ को भी शक में डाल दे। वो मंच पर चढ़ा, हाथ जोड़े, और माइक के सामने आकर खड़ा हो गया।
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