The Mysterious Bell – Chapter 814
मैंने देखा कि सानिया ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया है।
"ये प्लान नहीं है," उसने कहा। "ये ड्रामा है।"
"ड्रामा भी तो प्लान होता है," टिंकू ने कहा।
"अगर तू गिरेगा," गुड्डू बोला, "तो मैं क्या करूँगा?"
"तू खड़ा रहेगा।"
"नहीं, मैं गिरूँगा।"
"तू क्यों गिरेगा?"
"क्योंकि मैं मोटा हूँ," गुड्डू ने कहा। "मोटा आदमी जब गिरता है, तो आवाज़ आती है। तेरी आवाज़ नहीं आएगी।"
मैंने अपनी जेब को टटोला और खुद को रोका, पर हँसी नहीं रुकी।
"अगर आवाज़ की बात है," चिंटू बोला, "तो मेरा रोना सबसे असली लगता है।"
"तू रो सकता है?" सानिया ने शक से पूछा।
"मैं दो मिनट में रो सकता हूँ," चिंटू ने कहा। "मेरी अम्मी से पूछ लेना। मैं रोऊँगा तो असली आँसू आएँगे, और असली आँसू पर साहब भी नरम पड़ेगा, सब नरम पड़ते हैं।"
"मैं धक्का दूँगा," रफ़ीक़ ने कहा।
सबने उसकी तरफ़ देखा।
"किसे?" मैंने पूछा।
"मतलब… गिराने के लिए। हल्का सा। ऐसे—"
"बस!" शबनम आपा ने चिमटी फिर उठाई। "बस करो। सुनो सब।"
आँगन चुप हो गया।
शबनम आपा ने अपना हाथ कमर पर रखा।
"मंच पर जाकर नाटक मत करना," उन्होंने कहा। "हम तो पहले से ही नाटक में जी रहे हैं। सुबह से शाम तक हम वो नाटक करते हैं जो हम नहीं हैं — वो नाटक जिसमें हम हँसते हैं जब अंदर सब कुछ जल रहा होता है। तुम उस मंच पर एक नया नाटक मत जोड़ो। तुम वहाँ जाकर वो करो जो ये गली बरसों से करना चाहती थी और कर नहीं पाई — सीधा खड़े होकर बोलना।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं तेरे साथ हूँ। पर मैं तेरे पीछे नहीं खड़ी रहूँगी। मैं तेरे बगल में खड़ी होऊँगी। समझा?"
"समझ गया, आपा।"
"अच्छा।" उन्होंने चिमटी नीचे रखी। "तो अब मेरी बात सुनो। मैदान में अगर सफ़ेद कुर्ते वाले पानी बाँट रहे हों, तो तुम उनका पानी मत पीना। मैं अपने बर्तन में भरकर लाऊँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो पानी अपना होता है, उसमें ज़हर नहीं होता। और जो दिया हुआ होता है, उसका हिसाब बाद में माँगा जाता है।"
वो अंदर गईं और बर्तन की आवाज़ आने लगी।
तभी कौशल्या दादी ने अपनी लाठी टिकाकर मुझे इशारा किया।
"आ जा," उन्होंने कहा। "दो बातें।"
मैं उनके पास गया। वो उठकर गुमटी की दीवार के उस पार खिसक गईं, जहाँ कोई नहीं था। उनकी ओढ़नी आज भी वही काली थी, और उसके नीचे पीतल की वो जुड़वाँ चीज़ लटक रही थी, जो घंटी जैसी दिखती थी पर घंटी नहीं थी।
"ताबीज़ छूने की सोच रहा है?" उन्होंने पूछा।
"सोच रहा हूँ।"
"छू लेना," उन्होंने कहा। "पर एक बात सुन ले।"
उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर अपनी आवाज़ धीमी की।
"जो चीज़ आधी होती है," उन्होंने कहा, "वो पूरी चीज़ से जलती है। जला हुआ आदमी पूरे आदमी से नहीं डरता, वो उससे जलता है। इसीलिए वो ताबीज़ दिन-रात याद रखता है कि तेरी घंटी कहाँ है। वो उसे अपने पास रखना चाहता है, और जब नहीं रख सकता, तो उसे जलाना चाहता है।"
"तो मैं उसे छूऊँ या नहीं?"
"छू," कौशल्या दादी ने कहा। "पर तब छूना जब तेरे पीछे पूरी गली खड़ी हो। अकेले छूएगा तो वो तुझे जला देगा। भीड़ के सामने छूएगा तो वो खुद जलेगा। ये हिसाब का नियम है, बेटा। आग वहाँ जाती है जहाँ जगह खाली हो।"
मैंने उनकी झुर्रियों भरी उँगली से माथा छुआ।
"एक बात और," उन्होंने कहा। "अगर आज रात वो ताबीज़ उतर गया और उसके पीछे वाला सबके सामने आ गया, तो तू उससे लड़ने की कोशिश मत करना।"
"तो क्या करूँ?"
"उसे नाम से बुलाना," उन्होंने कहा। "जिस चीज़ का नाम नहीं, वो सबसे ताक़तवर होती है। जिस दिन उसका नाम लिया जाएगा, उस दिन वो सिर्फ़ एक पुरानी गंदगी रह जाएगी जिसे लोग झाड़ू मारकर बाहर कर देंगे।"
"उसका नाम क्या है?"
कौशल्या दादी ने एक पल मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मुझे पता है कि वो नाम किसके पास है।"
"किसके पास?"
"ताबीज़ के अंदर," उन्होंने कहा। "ताबीज़ के अंदर एक काग़ज़ है। मैंने उसे पचास साल पहले अपनी आँखों से बंद होते देखा था। उस काग़ज़ पर दो नाम लिखे हैं — एक, जिसने घंटी बनाई, और दूसरा, जिसने उसे बाँटा। और तीसरा नाम उसके नीचे है, जो आज तक किसी ने नहीं पढ़ा।"
मेरा गला सूख गया।
"तीसरा नाम," मैंने कहा।
"तीसरा नाम," उन्होंने कहा। "और वो नाम जानने के बाद तेरी ज़िंदगी वैसी नहीं रहेगी। सोच ले।"
वो लाठी टेककर लौट गईं।
मैं वहीं खड़ा रहा। कुछ देर तक मुझे अपनी साँस की आवाज़ अपने कानों में सुनाई देती रही।
फिर गुमटी के सामने से पैरों की आवाज़ आई, और काजल आई।
उसका सिर खुला था, बाल उड़ रहे थे, और उसके हाथ में नर्सिंग का बैग ऐसे लटक रहा था जैसे वो उसे भूल गई हो। वो सीधी मेरी तरफ़ आई और मेरा हाथ पकड़कर मुझे दीवार की तरफ़ खींच ले गई।
"तू कार्यक्रम में जाने की सोच रहा है?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"तो पहले ये सुन।" उसने अपनी साँस सीधी की। "चंद्रेश सक्सेना कार्यक्रम में होगा। मैंने अभी अस्पताल में उसका आदमी देखा — वो नीली मोहर वाले काग़ज़ों के बंडल लेकर आया था और माँ की दवा की खिड़की पर दो मिनट खड़ा रहा।"
"अकेला?"
"नहीं।" काजल की आँखें मेरी आँखों से टकराईं। "दो पुलिस वाले साथ थे। खाकी में। और वो मेरे पास आकर मुस्कुराए।"
मेरी मुट्ठी अपने आप बंद हो गई।
"क्या कहा उन्होंने?"
"कहा — बेटा, आज शाम स्कूल के बच्चों को साइकिल बाँटी जा रही है। तुम भी आ जाना। और अपने भाई को भी ले आना। हमें उससे दो बातें करनी हैं।"
मैंने मुँह फेर लिया।
"और एक बात," काजल ने कहा। "उन पुलिस वालों में से एक के हाथ में एक काग़ज़ था। उस पर साइकिल की तस्वीर बनी थी और नीचे कुछ लिखा था। मैं पढ़ नहीं पाई, पर उस पर लिखा था — चोरी।"
"चोरी?"
"हाँ।" काजल की आवाज़ धीमी हो गई। "अंकुश, अगर वो बच्चों को कार्यक्रम में घुसते ही चोरी के नाम पर पकड़ लें, तो हम क्या करेंगे? बारह साल का बच्चा पुलिस के सामने क्या बोलेगा? वो डर जाएगा। वो रोएगा। और उसका रोना कैमरे में सबसे बुरी खबर बनेगी।"
मैंने कुछ देर सोचा।
"फिर हम बच्चों को अंदर नहीं भेजेंगे," मैंने कहा।
"पर ताबीज़—"
"ताबीज़ के लिए अंदर मुझे जाना है," मैंने कहा। "बच्चों को नहीं।"
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई।
"मैंने सुना," उसने कहा।
मैंने पलटकर देखा। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ — चारों दरवाज़े पर खड़े थे। शबनम आपा उनके पीछे थीं और उनके चेहरे पर वो भाव था जो माँ के चेहरे पर आता है जब बच्चे गलत बात सुन लें।
"टिंकू," मैंने कहा, "बात सुन।"
"नहीं, तू सुन।" वो आगे आया। "तू अंदर अकेला जाएगा, ये कब तय हुआ? हमने कब कहा कि हम डर गए?"
"तू डरा नहीं है। पर पुलिस—"
"पुलिस क्या करेगी?" टिंकू ने कहा। "मुझे पकड़ेगी? मेरा क्या? मेरे पापा गए। मेरी माँ झाड़ू लगाती है। मैं स्कूल छोड़ चुका हूँ। मेरे पास खोने को क्या है?"
उसकी आवाज़ आख़िरी शब्द पर टूट गई। उसने जल्दी से अपना मुँह फेरा।
मैं उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रखा।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू मेरे साथ अंदर आएगा।"
उसने पलटकर देखा।
"अकेले नहीं," मैंने कहा। "हम दोनों जाएँगे। पर एक शर्त पर।"
"क्या शर्त?"
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