The Mysterious Bell – Chapter 813
"अंकुश," उसकी आवाज़ तेज़ थी। "सीढ़ी पर लोग लगे हैं। माँ ने कहा है कि तू अस्पताल आ। और सुन — माँ ने आज नाश्ता भी नहीं किया।"
मैंने आँखें बंद कीं।
"आ रहा हूँ," मैंने कहा।
फोन रखकर मैंने घंटी को फिर हाथ में लिया।
"अब बोल," मैंने धीरे से कहा। "अब तो बोल।"
घंटी कुछ देर चुप रही।
फिर उसने कहा।
"उसकी मुस्कान से डर मत। उसके पीछे वाले से डर।"
"वो कौन है?"
"पूछ रहा है," घंटी ने कहा, "तो आज हिसाब में वो भी बैठेगा।"
और फिर वो खुद बजी। एक बार। छोटी सी।
मैंने ज़ुबैर चाचा की तरफ़ देखा।
"चाचा," मैंने कहा, "आज शाम आप भी चलिएगा।"
चाचा ने अपनी दुकान का आधा शटर देखा।
फिर अपना कैमरा उठाया।
"मैं पच्चीस साल से इस कैमरे को साफ़ कर रहा हूँ," उन्होंने कहा। "आज इसे काम पर लगाने का दिन है।"
हम बाहर निकले। गली में धूप अब ढल रही थी और दीवारों पर सुनहरी हो गई थी। पोस्टर वाली लड़कियाँ पोस्टर लेकर भाग रही थीं, और दूर कहीं कोई रेडियो बजा रहा था। और ठीक हमारे सामने, दीवार पर, एक बड़ा पोस्टर लगा था — रणवीर, हाथ जोड़े, और नीचे साइकिल की तस्वीर।
टिंकू ने पोस्टर पढ़ा।
"उस्ताद," उसने कहा, "वो सच में सबको साइकिल देगा?"
"हाँ," मैंने कहा। "देगा।"
"तो फिर हम क्या करेंगे?"
मैंने पोस्टर देखा।
मैंने अपनी जेब में उस छोटी पीतल की गोली को महसूस किया, जो चाचा के धागों के बीच से मिली थी। मैंने उस जली हुई तस्वीर को याद किया, जिसमें एक लड़का घुटनों के बल बैठा था और जिसके पीछे कोई बिना चेहरे का खड़ा था।
और मैं मुस्कुराया।
पहली बार उस दिन मैं सच में मुस्कुराया।
"बच्चों को साइकिल बाँटेगा?" मैंने कहा। "तो चलो, आज हम भी एक बच्चा बन जाते हैं।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"पर उस्ताद," उसने कहा, "हम साइकिल नहीं लेंगे न?"
"नहीं लेंगे," मैंने कहा। "हम उससे कुछ और माँगेंगे।"
"क्या?"
मैंने घंटी जेब में रखी और गली की तरफ़ चल दिया।
"उससे हम उस रात का हिसाब माँगेंगे," मैंने कहा। "और वो हिसाब उसने खुद अपने हाथ से जलाया था। आज हम उसी जले हुए हाथ से हिसाब माँगेंगे।"
॥
गुमटी के पीछे वाली जगह में इतनी भीड़ कभी नहीं हुई थी।
शबनम आपा ने वहाँ पड़ी पुरानी टूटी चारपाई खींचकर दीवार से टिका दी थी, और उस पर चार लोग बैठे थे — उस्ताद अली बक्श, याकूब, ज़ुबैर चाचा और हबीब चाचा। उस्ताद की गोद में कपड़े में लिपटा उनका पुराना ट्रंक था, जैसे कोई बुज़ुर्ग अपने साथ अपना घर लेकर बैठा हो।
बाक़ी लोग ज़मीन पर।
कौशल्या दादी एक कोने में लाठी के सहारे बैठी थीं। शांति देवी उनके पीछे, खड़ी। पापा… पापा नहीं थे। मैंने उनकी तरफ़ देखा भी नहीं, पर मेरी आँखें खुद ही एक बार उस जगह गईं जहाँ वो बैठते अगर होते।
मीरा ने अपना कैमरा गुमटी की गीली दीवार की तरफ़ घुमाकर रख दिया था। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पाँचों एक बेंच पर ऐसे बैठे थे जैसे किसी केस की सुनवाई चल रही हो, और पाँचों के चेहरों पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तभी आता है जब उन्हें लगता है कि आज उनकी बात सुनी जाएगी।
गुमटी की केतली चूल्हे पर बैठी थी, पर आज किसी ने चाय नहीं माँगी।
शबनम आपा ने आंगन में घूमकर सबको एक बार देखा और फिर अपनी लोहे की चिमटी उठाकर पटक दी।
"मैं एक बात साफ़ कह देती हूँ," उन्होंने कहा। "मेरी छत के नीचे जो भी बात होगी, वो यहीं रहेगी। इस गुमटी से बाहर कोई मुँह बाहर नहीं निकालेगा। नहीं तो आज चाय के साथ मेरी ज़ुबान भी बाज़ार में बिक जाएगी।"
"आपा," मैंने कहा, "आपकी ज़ुबान तो पहले से ही बाज़ार में सबसे महँगी है।"
"चुप।" उन्होंने गरम चिमटी मेरी तरफ़ उठाई और फिर हँस दीं। हँसी में भी घबराहट थी।
मैंने ज़मीन पर पैर जमाया और अपनी जेब से घंटी निकाली। उसे दोनों हाथों में रखकर टीम की तरफ़ बढ़ा दिया।
"सुनो," मैंने कहा। "छह बजे बड़े तालाब के मैदान में साइकिल बाँटी जाएँगी। अस्पताल के आँगन में हमारी सभा है। और हमें बारह बजे से पहले अस्पताल की सीढ़ी पर पहुँचना है।"
"तीन जगह?" टिंकू ने पूछा।
"तीन जगह और दो हाथ," मैंने कहा। "घंटी ने साफ़ कहा था — दो हाथ, दो जगह नहीं।"
"तो क्या छोड़ेंगे?"
मैंने घंटी को हल्के से हिलाया।
"कुछ नहीं छोड़ेंगे," मैंने कहा। "हम भीड़ को बाँट देंगे। और भीड़ जिस चीज़ से हारती है, वो ताक़त नहीं होती, भीड़ के बीच का अकेलापन होता है। जिस दिन भीड़ को लग जाए कि हम सब एक तरफ़ हैं, उस दिन साहब की सफ़ेदी उतर जाएगी।"
याकूब ने अपनी लाठी के नुकीले सिरे से ज़मीन खरोंची।
"बात ठीक है," उन्होंने कहा। "पर मैदान साहब का है। छह बजे वहाँ जाना मतलब उसकी ज़मीन पर उसकी शर्तों से खड़ा होना।"
"इसीलिए हम छह बजे उसके मैदान में नहीं जा रहे," मैंने कहा। "हम छह बजे उसके मैदान के बाहर रहेंगे। साइकिल बाँटने वाला कैमरा चलाएगा। और गली के बाहर खड़ी गली — वो कैमरे में सबसे ऊँची आवाज़ होती है।"
ज़ुबैर चाचा ने अपना पुराना कैमरा गोद से उठाया।
"मेरा कैमरा पच्चीस साल से ऐसे ही किसी दिन का इंतज़ार कर रहा था," उन्होंने कहा।
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू सीधी बात कर। तुझे क्या चाहिए?"
"ताबीज़," मैंने कहा।
आंगन में एक पल के लिए चूल्हे की आवाज़ भी रुक गई।
"मुझे रणवीर के गले से वो ताबीज़ चाहिए," मैंने धीरे से कहा। "चाहे एक मिनट के लिए। चाहे एक सेकंड के लिए। उसे उतरना होगा। और उसे उतरने के लिए किसी को उसके सामने खड़ा होना पड़ेगा जिससे वो डरता है।"
"और उसे कौन डरता है?" उस्ताद ने पूछा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"वो," मैंने कहा, "जो उसके पीछे खड़ा है।"
उस्ताद कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछने लगे — धीरे-धीरे, जैसे वो वक़्त खींच रहे हों।
"अच्छा," उन्होंने कहा। "तो सुनो पहले। मंच पर जाने का तरीक़ा।"
मैंने सबकी तरफ़ देखा।
"मैदान में घुसना आसान है," मैंने कहा। "वहाँ गेट पर सूची है, दो सफ़ेद कुर्ते वाले लड़के हैं, नाम पूछकर अंदर भेजते हैं। हमें नाम देने की ज़रूरत नहीं। हमें ऐसे अंदर जाना है जैसे हम वहाँ के हों। जिसे कोई न पूछे।"
"मज़दूर?" हबीब चाचा ने कहा।
"मज़दूर से बढ़िया कुछ नहीं," मैंने कहा। "मज़दूर से कोई नाम नहीं पूछता, कोई पहचान नहीं माँगता। बस काम दिखना चाहिए। हम कंधे पर बोरी रखेंगे, पानी का डिब्बा उठाएँगे, कुर्सियाँ ढोएँगे। और जब सब कुर्सियाँ बँट जाएँगी, तब हम वहाँ होंगे जहाँ कुर्सियाँ रखने वाले होते हैं — मंच के पास।"
"और मैं?" टिंकू ने कहा।
वो उठ खड़ा हुआ। उसके घुटने पर पट्टी आज भी वही थी, और मोज़े में छत के ताले की चौथी चाबी।
"मेरा प्लान सबसे आसान है," उसने कहा। "मैं मंच के पास जाऊँगा, सीढ़ी के पास। और जब साहब बच्चों को साइकिल देने के लिए झुकेगा, मैं गिर जाऊँगा।"
"गिरेगा?"
"हाँ। ऐसे।" उसने गिरने का अभिनय किया, दोनों हाथ आगे फैलाए, और फिर मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया। "और गिरते-गिरते मैं उसका हाथ नहीं, उसका ताबीज़ नहीं — मैं सीधा उसकी कमीज़ का कॉलर पकड़ूँगा। ऐसे।"
उसने हवा में उँगलियाँ भींचीं।
"और फिर मैं चिल्लाऊँगा — साहब, साहब, मुझे माफ़ कर दो, मैं जान-बूझकर नहीं गिरा। और जब सब मेरी तरफ़ देखेंगे, तब चाचा का कैमरा ताबीज़ पर होगा।"
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