The Mysterious Bell – Chapter 812
एक बार। हल्की सी। जैसे किसी ने दूर से देखकर सिर हिलाया हो।
"चाचा," मैंने कहा, "वो लड़का आज का रणवीर भारद्वाज है।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे पता है," उन्होंने कहा।
"और आपने उसे कभी रोका नहीं?"
"मैंने एक बार रोकने की कोशिश की थी," उन्होंने कहा। "पाँच साल पहले। उसका एक कार्यक्रम था, बड़े तालाब के पास। मैं वहाँ गया। भीड़ में खड़ा रहा। उसने मंच से मुझे देखा। मुझे पहचाना। और मुस्कुराया। और उस मुस्कान में इतना कुछ था कि मेरी ज़ुबान सूख गई। मैं वापस लौट आया। उस दिन के बाद मैंने अपनी दुकान का शटर आधा ही उठाया।"
मैं चुप खड़ा रहा।
मैंने सोचा — आदमी कितनी चीज़ें सह लेता है। एक आदमी की दुकान जलती है, और वो बीस साल उस गली से गुज़रता है जहाँ उसकी दुकान थी। एक आदमी की तस्वीर उसके पास रह जाती है, और वो हर महीने उसे निकालकर देखता है, और हर महीने उसे वापस रख देता है।
और मैं उस दुकान पर खड़ा था, जो चल रही थी। मेरी दुकान। मेरी गली। मेरा मोहल्ला।
मुझे अचानक बहुत तेज़ गुस्सा आया।
नहीं, गुस्सा नहीं।
कुछ और।
जैसे कोई मेरे अंदर एक दरवाज़ा खोल दे, और उस दरवाज़े के पीछे एक कमरा हो, और उस कमरे में हर वो आदमी खड़ा हो जिसे किसी ने चुप करा दिया था।
"मीरा," मैंने कहा। "आज शाम की तैयारी में एक चीज़ जोड़नी है।"
"क्या?"
"चाचा की दुकान का शटर।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू क्या कह रहा है?"
"मैं कह रहा हूँ," मैंने कहा, "कि आज शाम अगर गली में सच बोला जाएगा, तो उस सच में बीस साल पुरानी एक दुकान भी बोलेगी। क्योंकि जिस शहर में एक दुकान बीस साल आधे शटर के नीचे रहती है, वो शहर पूरा खुला हुआ नहीं है।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।
और उनकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने उस कमरे में पहले नहीं देखा था।
डर नहीं था वो।
कुछ और था।
शायद सुबह।
और ठीक उसी वक़्त, परदे के बाहर से दौड़ते पैरों की आवाज़ आई, दुकान का आधा शटर खड़खड़ाया, और सानिया अंदर घुस आई।
उसके हाथ में एक पोस्टर था।
वो हाँफ रही थी। उसके बाल चेहरे पर आ रहे थे। उसने पोस्टर दोनों हाथों से ऊपर उठाया, जैसे कोई झंडा उठाया हो।
"देखो!" वो चिल्लाई। "देखो! पूरी गली में चिपका रहे हैं!"
मैंने पोस्टर लिया।
पोस्टर पर एक बड़ी तस्वीर थी — रणवीर भारद्वाज, सफ़ेद कुर्ता, हाथ जोड़े हुए, मुस्कुराते हुए। उसके नीचे नीले बड़े अक्षरों में लिखा था — भारद्वाज फ़ाउंडेशन की तरफ़ से मोहल्ले के बच्चों को मुफ़्त साइकिल वितरण। आज शाम छह बजे। बड़े तालाब का मैदान। हर बच्चे को एक साइकिल, और साथ में एक नई कॉपी।
पोस्टर के नीचे एक और लाइन थी — हर बच्चे के माता-पिता को भी आने का न्योता।
मैंने पोस्टर को ध्यान से देखा।
मुझे पता था ये क्या था।
ये साइकिल नहीं थे।
ये डर का सबसे पुराना तरीका था। आदमी जब लोगों को नहीं डरा पाता, तो वो उनके बच्चों के हाथ में कुछ पकड़ा देता है। एक खिलौना, एक साइकिल, एक कॉपी। और फिर माँ-बाप चुप हो जाते हैं, क्योंकि जिस चीज़ को अपने बच्चे के हाथ में पकड़ा हुआ देखते हैं, उसके सामने वो कुछ नहीं बोलते।
और मुझे याद आया — आज रात ताबीज़ फेंका जाना था। आज रात घंटी का हिसाब बराबर होना था। और उससे पहले, शाम छह बजे, वो बच्चों को साइकिल देने जा रहा था।
क्यों?
क्योंकि उसे डर था।
मैंने सानिया की तरफ़ देखा।
"सानिया," मैंने कहा, "ये पोस्टर कितने लगे हैं?"
"बहुत!" उसने कहा। "स्कूल के गेट पर, गुमटी के पास, नल पर, और —" वो हाँफने लगी, "और अस्पताल के बाहर भी! एक बड़ा वाला!"
"बड़ा वाला?"
"हाँ। दस हाथ का। उस पर साइकिल की तस्वीर है, और नीचे लिखा है कि आज से मोहल्ले का हर बच्चा साहब का बच्चा है।"
मैंने पोस्टर को देखा।
फिर मैंने घंटी निकाली।
फिर भी ठंडी।
पर अब उसमें एक हल्की सी गुनगुनाहट थी, जैसे दूर किसी तार में हवा बज रही हो।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ उस्ताद?"
"तेरे पास साइकिल है?"
"नहीं।"
"पर तुझे साइकिल चलानी आती है?"
"आती है," उसने कहा, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा चमका जो पिछले कई दिनों से बुझा हुआ था।
"तो ठीक है," मैंने कहा। "आज शाम हम भी वहाँ चलेंगे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू पागल हो गया है?"
"हो सकता है," मैंने कहा।
"वो वहाँ बच्चों को साइकिल देगा, और हम?"
"हम भी जाएँगे," मैंने कहा। "हमें भी बच्चा बनना पड़ेगा।"
"क्या मतलब?"
मैंने पोस्टर को मेज़ पर रखा — उस लकड़ी की मेज़ पर जहाँ तस्वीर अभी भी पानी में तैर रही थी, और उसमें आग अभी भी जल रही थी, और उसमें वो लड़का अभी भी घुटनों के बल बैठा था, जली हथेली में चमकता हुआ ताबीज़ पकड़े।
"मतलब ये," मैंने कहा, "कि वो समझता है कि बच्चों को साइकिल देकर वो पूरी गली के मुँह सिल कर देगा। माँ-बाप डरेंगे, बच्चे खुश होंगे, और कोई कुछ नहीं बोलेगा।"
"तो?"
"तो हम उसके उल्टे चलेंगे," मैंने कहा। "वो जहाँ साइकिल देगा, हम वहाँ साइकिल माँगेंगे। पर हम साइकिल नहीं लेंगे। हम उससे कहेंगे — पहले बताओ, ये साइकिल किस पैसे से आई? किस ज़मीन से आई? किसकी दुकान जलाकर आई?"
मीरा की आँखें बड़ी हुईं।
"तू वहाँ ये कहेगा?"
"मैं नहीं," मैंने कहा, और मैंने सानिया की तरफ़ देखा। "बच्चे कहेंगे।"
सानिया ने अपनी आँखें ऐसे खोलीं जैसे उसे किसी ने तोहफ़ा दे दिया हो।
"मैं कहूँगी?" उसने पूछा।
"तू कहेगी," मैंने कहा। "पर पहले सुन। मुझे पता है तुझे साइकिल चाहिए। मुझे पता है तेरे पापा तुझे साइकिल नहीं दिला पाए।"
सानिया का चेहरा उतर गया। उसने अपना पोस्टर धीरे से नीचे किया।
"हाँ," उसने कहा। "पर —"
"यही तो बात है," मैंने कहा। "वो जानता है कि तुझे चाहिए। इसीलिए वो साइकिल लाया है। वो तेरी ज़रूरत को अपना हथियार बना रहा है।"
सानिया कुछ देर चुप रही।
फिर उसने पोस्टर को मेज़ पर रख दिया, ठीक उस तस्वीर के ऊपर, और उसका हाथ उस पर से फिसल गया।
"मुझे साइकिल नहीं चाहिए," उसने कहा।
"झूठ मत बोल," मैंने कहा।
वो रुकी।
"चाहिए," उसने धीरे से कहा।
"तो ठीक है," मैंने कहा। "चाहिए रहे। पर आज तू उससे मिलने जाएगी, और उसके हाथ से साइकिल नहीं लेगी। और ये बात तेरे लिए आसान नहीं है। मैं जानता हूँ।"
सानिया ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थी। वो बस खड़ी थी, और यही सबसे मुश्किल था।
मैंने पोस्टर फिर उठाया।
उस पर रणवीर की तस्वीर थी, जिसमें वो हाथ जोड़े खड़ा था। तस्वीर के नीचे एक छोटी लाइन थी — हर बच्चे के साथ एक अभिभावक अनिवार्य।
"देखा?" मैंने मीरा से कहा। "अभिभावक अनिवार्य।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि वो हमें अपनी तरफ़ से शर्त बताकर पहले ही बता रहा है — बच्चे अकेले नहीं, और बड़े साथ होंगे। और जिस सभा में हर बड़ा आएगा, वो सभा कब सभा नहीं रहती, तू जानती है।"
मीरा ने कुछ देर सोचा।
फिर उसने अपना कैमरा उठाया।
"छह बजे," उसने कहा। "मतलब हमारे पास चार घंटे हैं।"
"हमारे पास चार घंटे नहीं हैं," मैंने कहा। "हमारे पास आज रात है। छह बजे से लेकर बारह बजे तक। और उनमें से एक भी मिनट बर्बाद नहीं हो सकता।"
तभी मेरी जेब में फोन बजा।
काजल थी।
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