The Mysterious Bell – Chapter 811
वो कुछ देर चुप रहे।
"जिस रात बिजलीघर जला," उन्होंने कहा।
"आप वहाँ थे?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "मैं तब वहाँ नहीं था। पर जो वहाँ था, वो मेरे पास आया। आधी रात। हाथ जला हुआ, कपड़े जले हुए, और आँखों में वो डर — जो आदमी बाद में कभी नहीं आया। उसने कहा, चाचा, एक तस्वीर निकालो। मैंने कहा, अब कौन सी तस्वीर? तुम तो जल गए हो। उसने कहा, नहीं — ये जलन नहीं दिखानी। ये दिखाना है कि मेरे पीछे कौन खड़ा था।"
मैंने तस्वीर में उस धुँधले आदमी को फिर देखा।
"और वो कौन था?"
ज़ुबैर चाचा ने सिर हिलाया।
"पता नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने उस रात उससे कभी नहीं पूछा। उस लड़के ने भी नहीं बताया। मैंने सिर्फ़ कैमरा उठाया और शटर दबाया। एक फ्रेम। बस एक। और उस एक फ्रेम में वो चीज़ आ गई जो उस लड़के ने अपनी आँखों से नहीं देखी थी।"
"मतलब?"
"मतलब ये," चाचा ने कहा, "कि कैमरा कभी-कभी आँख से ज़्यादा ईमानदार होता है। आदमी अपने आगे देखता है, कैमरा अपने चारों तरफ़।"
मीरा ने अपना कैमरा उठाया।
उसने थाली के ऊपर झुककर तस्वीर की दो तस्वीरें लीं। फिर एक और। फिर फ़्लैश चलाया, और कमरे में एक पल के लिए सब कुछ सफ़ेद हो गया।
"ये अदालत में सबूत नहीं बनेगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ वो सख़्त वाली आवाज़ थी जो अब उसकी अपनी थी। "पुरानी तस्वीर, पुराना नेगेटिव, कोई तारीख़ नहीं, कोई गवाह नहीं। कोई वकील इसे हवा में उड़ा देगा।"
"तो फिर?"
"पर ये बता देती है," मीरा ने कहा, "कि झूठ कहाँ से शुरू हुआ। और जब तुम्हें पता हो कि झूठ कहाँ से शुरू हुआ, तो तुम उसके पीछे-पीछे उस जगह तक जा सकते हो जहाँ वो खत्म होता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू डर नहीं रही?"
"डर रही हूँ," उसने कहा, सीधे मेरी आँखों में देखकर। "बहुत डर रही हूँ। पर कैमरा हाथ में है, इसलिए डर कम हो जाता है। तू भी कुछ हाथ में पकड़ ले।"
मैंने घंटी पकड़ी थी।
वो ठंडी थी।
और चुप।
मैंने तस्वीर में रणवीर के हाथ को फिर देखा। जली हुई हथेली। उसके ऊपर गोल ताबीज़, जिसका पीतल आग में भी चमक रहा था। जैसे आग उस चीज़ को छू ही नहीं पाई हो। जैसे वो चीज़ आग से बनी हो और इसीलिए आग से नहीं डरती।
और मुझे अपनी जेब में पड़ी वो छोटी पीतल की गोली याद आई, जो कुछ दिन पहले मुझे चाचा के धागों के बीच मिली थी।
"चाचा," मैंने कहा। "उस रात के बाद क्या हुआ?"
चाचा ने अपना चश्मा उतारा। उन्होंने उसे कमीज़ से पोंछा। फिर पहना। फिर उतारा। जैसे उन्हें अपने हाथों से कुछ करना था, ताकि आँखों से कुछ बाहर न आए।
"उस रात के बाद," उन्होंने कहा, "वो लड़का कुछ दिन दिखा। फिर गायब हो गया। फिर एक दिन वो लौटा — पर वो लड़का नहीं था। सफ़ेद कुर्ता, साफ़ बाल, और बड़ी मुस्कान। उसने मेरी दुकान के बाहर खड़े होकर कहा, चाचा, वो नेगेटिव मुझे दे दो। मैंने कहा, कौन सा नेगेटिव? उसने कहा, जो तुमने उस रात निकाला था।"
"तूने दिया?"
"नहीं," चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार सख़्त हुई। "मैंने नहीं दिया। मैंने कहा, मेरे पास कुछ नहीं है।"
"तो फिर?"
"फिर एक हफ़्ते बाद मेरी दुकान जल गई।" चाचा ने कहा। "रात को। पीछे के कमरे से आग उठी। मेरे सारे नेगेटिव जल गए। पच्चीस साल का काम। दो हज़ार से ज़्यादा फ्रेम। सब।"
कमरे में चुप्पी थी।
"और ये?"
"ये मेरे घर की पुरानी पेटी में थी," चाचा ने कहा। "मैंने उस रात ही सोच लिया था कि जो चीज़ दुकान में रहेगी, वो जलेगी। इसलिए इस एक नेगेटिव को मैंने घर ले जाकर छिपा दिया। और फिर —"
वो रुके।
"फिर मैं चुप हो गया," उन्होंने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तुम सोच रहे होगे कि इतनी सी बात में आदमी चुप क्यों हो जाता है," चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो सिर्फ़ खुद पर होती है। "तो सुन लो। मैं चुप इसलिए हुआ कि मुझे डर लगा। मेरी दुकान जल गई थी। मेरे पास एक कैमरा बचा था, एक लेंस, और ये नेगेटिव। उस वक़्त मेरे बेटे की उम्र तेरी उम्र जितनी थी। और मैंने सोचा — अगर मैं बोलूँगा, तो अगली बार मेरा घर जलेगा। इसलिए मैं चुप रहा। एक हफ़्ता, एक महीना, एक साल। और फिर चुप्पी आदत बन गई।"
उन्होंने अपनी दुकान की तरफ़ इशारा किया, जो बीस साल से आधे शटर के नीचे बंद पड़ी थी।
"बीस साल," उन्होंने कहा। "बीस साल मैंने इस तस्वीर को पेटी में रखा और हर महीने एक बार उसे निकालकर देखा। और हर बार सोचा — किसी दिन कोई आएगा, और मैं इसे उसे दे दूँगा। और हर बार अगले दिन सोचता, नहीं, अगले महीने।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"चाचा," मैंने कहा। "अब आ गया।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं। बूढ़े आदमी की आँखें, जो शायद बहुत सालों से नहीं भरी थीं, और अब भर गई थीं, और वो उन्हें पोंछ नहीं रहे थे। जैसे पोंछने से कुछ टूट जाएगा।
"हाँ," उन्होंने कहा। "आ गया।"
टिंकू ने मेरी आस्तीन खींची।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "चाचा रो रहे हैं।"
"हाँ," मैंने कहा।
"हम क्या करें?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "आदमी को रोने दो। ये रोना बरबाद नहीं जाता। ये पानी नहीं है, ये हिसाब है।"
टिंकू ने सिर हिलाया। वो समझ गया, या समझने की कोशिश की। तेरह साल में सब समझ आ जाए, ये ज़रूरी नहीं। पर उसने कुछ पूछा नहीं। वो बस चुप खड़ा रहा, और यही सही था।
मैंने फिर तस्वीर देखी।
उस धुँधले आदमी को देखा।
सफ़ेद कुर्ता। लकड़ी के जूते।
और तभी मुझे याद आया — वो आदमी मुझे आज सुबह अस्पताल की सीढ़ी पर मिला था। वही सफ़ेद कुर्ता। वही लकड़ी के जूते। उसने मेरी हथेली पर बड़ी काली चाबी रखी थी और कहा था कि वो सिर्फ़ चाबी है, उसका भेजने वाला आज रात आएगा।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सूखी निकली। "अगर ये तस्वीर बीस साल पुरानी है, तो उस आदमी की उम्र आज क्या होगी?"
मीरा ने गिना नहीं। उसने सीधे मेरी तरफ़ देखा।
"तू ये कहना चाहता है," उसने कहा, "कि जो आज सीढ़ी पर खड़ा था, वो वही है?"
"मैं कुछ नहीं कह रहा," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ ये कह रहा हूँ कि चेहरा उस तस्वीर में भी नहीं है, और आज भी नहीं है। बस पहनावा वही है। और पहनावा बदलता है। आदमी नहीं बदलता।"
"या फिर," मीरा ने कहा, "आदमी बदल जाता है और पहनावा वही रहता है।"
"इसका मतलब?"
"मतलब ये कि हम अभी ये तय नहीं कर सकते," उसने कहा। "हम सिर्फ़ इतना जानते हैं कि उस रात वहाँ कोई था, जिसे उस लड़के ने नहीं देखा। और बीस साल बाद भी वो किसी न किसी रूप में घूम रहा है।"
ज़ुबैर चाचा ने अचानक कहा, "एक बात और थी।"
हम सब उनकी तरफ़ मुड़े।
"उस लड़के ने उस रात मुझसे एक बात कही थी," चाचा ने कहा। "मैं उसे बीस साल भूलने की कोशिश करता रहा। पर आज जब तुमने घंटी बजाई, तो वो बात वापस आ गई।"
"क्या बात?"
"उसने कहा था — चाचा, मेरे पीछे जो खड़ा है, वो मेरा है।"
कमरे में हवा रुक गई।
"क्या मतलब मेरा है?"
"मैंने भी वही पूछा था," चाचा ने कहा। "उसने कहा — जो मैंने खुद बुलाया। मैंने कहा, क्यों बुलाया? तो वो चुप हो गया। और फिर मुझसे सिर्फ़ इतना कहा — चाचा, इस तस्वीर को किसी को मत देना। लेकिन अगर कोई ऐसा आए जो घंटी की आवाज़ पहचानता हो, तो उसे दे देना।"
मेरी जेब में घंटी थी।
वो ठंडी थी।
और जैसे ही चाचा ने "घंटी" शब्द कहा, वो एक बार हिली।
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