The Mysterious Bell805 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 805

6 min read November 5, 2026

"बीस साल," उसने कहा। "बीस साल बाद कोई आया है जो उसके बारे में पूछ रहा है। और वो भी इस तरह — तीन लोग, घुटनों पर धूल, और आँखों में वो देखो जैसा डर।"

"डर नहीं है," टिंकू ने कहा।

"बेटा," ज़ुबैर ने कहा, "मैं बीस साल से तस्वीरें छाप रहा हूँ। मैं आदमी की आँख नहीं देखता, मैं उसका चेहरा देखता हूँ। तुम्हारे चेहरे पर डर नहीं लिखा है। तुम्हारे चेहरे पर वो लिखा है जो डर से पहले आता है — उम्मीद। और उम्मीद वाली आँख मुझे सबसे ज़्यादा डराती है।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि उम्मीद वाली आँख को झूठ जल्दी नहीं दिखता," उसने कहा।

वो उठा।

उसकी कमर झुकी हुई थी और वो अपनी मेज़ के पीछे से निकलकर हमारे सामने आया। उसके हाथ में अब वो नेगेटिव की पट्टी नहीं थी, बस एक मैला-सा रूमाल था जिससे वो बार-बार अपनी उँगलियाँ पोंछ रहा था।

"बैठो," उसने कहा। "कुर्सियाँ टूटी हैं, पर पचास साल में मैंने किसी को खड़े रहकर बात करते नहीं देखा।"

हम बैठे।

टिंकू ने एक टूटी स्टूल खींची और उसके एक पाये के नीचे अपना पुराना रूमाल दबा दिया, ताकि वो हिले नहीं।

ज़ुबैर ने उसे देखा और मुस्कुराया।

"यह लड़का ठीक है," उसने कहा। "यह जानता है कि टूटी चीज़ को नीचे से सहारा देना पड़ता है।"

"जी," टिंकू ने कहा। "मेरे उस्ताद ने सिखाया है।"

"तेरे उस्ताद कौन हैं?"

टिंकू ने मेरी तरफ़ इशारा किया।

ज़ुबैर ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें कुछ देर मेरे चेहरे पर टिकी रहीं, फिर उसके नीचे, मेरे गले पर।

"यह चाबी," उसने धीरे से कहा। "यह तो जगदीश यादव की चाबी है।"

मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।

"आपने इसे पहचाना?" मैंने कहा।

"मैं पचास साल से तस्वीरें छाप रहा हूँ, बेटा," उसने कहा। "मैं चीज़ें पहचानता हूँ, चेहरे भूल जाता हूँ। यह चाबी जगदीश की साइकिल के हैंडल पर लटकी रहती थी। उस पर कभी ज़ंग नहीं लगती थी। कहते थे कि यह चाबी उसके बाप ने दी थी।"

मेरा गला सूख गया।

"आप जगदीश यादव को जानते थे?"

"मैं इस बाज़ार में पैदा हुआ," उसने कहा। "मैंने इस बाज़ार के हर साइकिल मिस्त्री को जाना है। शिवनारायण को नहीं देखा, पर जगदीश को देखा। और उसके बेटे शंकर को भी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू शंकर का बेटा है?"

"हाँ।"

"शंकर कैसा है?"

मैं क्या कहता? कि वो डरा हुआ है? कि वो चुप है? कि उसने बिना पढ़े अंगूठा लगाया और बाईस साल शर्म में जीया?

"वो ठीक हैं," मैंने कहा। "अब ठीक हैं।"

ज़ुबैर ने मेरी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि वो मेरे चेहरे पर सब पढ़ लेता है, जैसे वो पुराने नेगेटिव पर बिना छुए पढ़ लेता हो।

"जी," उसने धीरे से कहा। "अब ठीक हैं।"

फिर उसने मीरा की तरफ़ देखा और उसके हाथ में तस्वीर देखी।

"यह कहाँ से लाई?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ बदल गई थी।

"आपकी ही दुकान से," मीरा ने कहा। "बीस साल पहले छपी थी। पीछे आपकी मोहर है।"

उसने तस्वीर ली और अपने चश्मे के ऊपर से देखा, फिर उतारकर आँखों के करीब ले गया, फिर उसे रोशनी के नीचे ले जाकर बल्ब के सामने पकड़ा।

बहुत देर। बहुत देर तक।

उसके हाथ काँप रहे थे।

"मैंने यह तस्वीर नहीं छापी," उसने धीरे से कहा।

"लेकिन मोहर —"

"मोहर मेरी है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई कबूल कर रहा हो कि उसने कोई जुर्म किया है। "मेरी मोहर है, मेरा काग़ज़ है, पर यह तस्वीर यहाँ से नहीं निकली। मेरी मोहर किसी और के हाथ में है। और वो किसी और के हाथ में पिछले कई साल से है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"कैसे?" उसने पूछा।

ज़ुबैर ने तस्वीर मेज़ पर रख दी और फिर दोनों हाथों से अपना चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा।

"बीस साल पहले," उसने कहा, "एक रात मेरी दुकान से कुछ चीज़ें गईं। तीन नेगेटिव की पट्टियाँ, मेरी मोहर, और एक छोटी लाल डिब्बी जिसमें मैं अपने फ़ोटो के पीछे की स्याही रखता था। चोरी जैसी नहीं थी। शटर खुला था, ताला सलामत था, और मेज़ पर सब कुछ जगह पर था। बस वो तीन चीज़ें गायब थीं।"

"आपने किसी को बताया?" मीरा ने पूछा।

"किसी को नहीं," उसने कहा। "मैं डर गया।"

"किससे?"

"उस रात के बाद," ज़ुबैर ने कहा, "मैंने अपनी दुकान बंद कर दी। और मैंने अपने आप से कह दिया कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ, अब तस्वीरें नहीं खींचूँगा। लेकिन सच यह था कि मैं डर गया था। डर से आदमी बीमार नहीं पड़ता, वो चीज़ों को भूलने लगता है। मैंने भी भूलने की कोशिश की।"

"क्या आपने भुला दिया?" मैंने पूछा।

"नहीं," उसने कहा। "मैंने एक दराज़ बना ली और उसमें वो सब डाल दिया जो मैं भूलना चाहता था। और दराज़ में रखी चीज़ें कभी नहीं भूलतीं। वो बस बंद रहती हैं।"

टिंकू ने धीरे से कहा, "मेरी माँ भी ऐसा ही कहती है।"

ज़ुबैर ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ देर चुप रहा।

"अच्छा," उसने कहा। "तो अब बताओ, तुम उससे क्यों मिलना चाहते हो? रणवीर से।"

"हम उससे नहीं मिलना चाहते," मैंने कहा। "हम उसके पीछे वाले को ढूँढना चाहते हैं।"

"उसके पीछे वाला?" ज़ुबैर ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो काँटे जैसा चुभा। "तुम्हें पता है उसके पीछे क्या है?"

"हमें कुछ पता नहीं," मैंने कहा। "इसीलिए हम आपके पास आए हैं।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसकी गर्दन झुकी और वो अपने हाथ की तरफ़ देखने लगा, जैसे उसने कई साल बाद अपने ही हाथों को देखा हो।

"मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ," उसने कहा, "और उसके बाद तुम तय करना कि अंदर आना है या बाहर जाना है।"

"बताइए," मैंने कहा।

"बीस साल पहले," उसने कहा, "रणवीर एक हँसमुख लड़का था। मेरी दुकान के पास एक पेड़ के नीचे वो साइकिल मरम्मत करता था।" उसने पीछे की दीवार की तरफ़ इशारा किया, दरवाज़े के बाहर की तरफ़। "उसी गली के कोने पर। बाँस का परदा टाँगकर। सुबह से शाम तक बैठा रहता। मेरी तस्वीरें सुखाने में मदद करता, कभी शादी में रोशनी वाला स्टैंड पकड़ लेता, कभी किसी के काग़ज़ मेरे पास छोड़ जाता। मरे हुए लोगों की तस्वीरें बड़ी करके देना उसका काम था — लोग अपने बाप-माँ की तस्वीर लाते, वो उसे ठीक करता।"

मैं चुप बैठा रहा।

"उसकी आवाज़ हल्की थी," ज़ुबैर ने कहा। "जब बोलता, तो पहले हँसता। किसी से नहीं लड़ता। गली के लड़के उसे चिढ़ाते कि तू मिस्त्री है या फ़ोटोग्राफ़र, तो वो कहता — मैं दोनों हूँ, साइकिल भी ठीक करता हूँ और चेहरा भी।" उसने एक गहरी साँस ली। "और उसका सबसे बड़ा रोना उसका बाप था।"

"उसका बाप?"

"बाप बीमार था," ज़ुबैर ने कहा। "कुछ उसकी कमर का, कुछ साँस का। और एक कर्ज़ था, जिसका हिसाब वो लड़का रोज़ अपने सीने में गिनता। वो मेरे पास आता और कहता — ज़ुबैर चाचा, आज दो महीने का बिजली का बिल बाकी है। मेरी दुकान पर उसी साइकिल का पुर्ज़ा महीने भर लटका रहता जो कोई लेने नहीं आता।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं उसे चाय पिलाता। और वो चाय पीते वक़्त भी अपने बाप की दवा की बात करता।"

मीरा बहुत धीरे बोली, "फिर क्या हुआ?"

ज़ुबैर ने मेज़ पर रखी तस्वीर की तरफ़ देखा।

"फिर एक शाम हुई," उसने कहा। "मैं यहीं बैठा था, यहीं इसी मेज़ पर, यही लैंप जला रहा था। दरवाज़े पर वो आया। मैंने सिर उठाया तो पहले उसका हाथ देखा।"

उसने अपनी हथेली उठाई, जैसे वो हाथ अभी भी दिख रहा हो।

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