The Mysterious Bell806 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 806

7 min read November 5, 2026

"जला हुआ था," उसने कहा। "कलाई से उँगलियों तक, चमड़ी उतरी हुई, और उस पर एक पीतल का सिक्का जैसा जला निशान बन गया था — गोल, किसी मोहर जैसा।"

"ताबीज़," मैंने धीरे से कहा।

"ताबीज़," ज़ुबैर ने सिर हिलाया। "वो अपने हाथ में एक जली हुई पीतल की चीज़ दबाए था, जिसका धागा जल चुका था और जिसका कोई आकार समझ नहीं आता था। और वो मुस्कुरा रहा था।"

"मुस्कुरा रहा था?" मीरा ने कहा।

"हाँ," ज़ुबैर ने कहा। "और वो मुस्कान मुझे आज तक नींद नहीं लेने देती। क्योंकि उसमें दर्द नहीं था। दर्द वाले आदमी का चेहरा पहचाना जाता है बेटा — होंठ सिकुड़ते हैं, आँखें भींचती हैं। उसके होंठ सिकुड़े नहीं थे। उसकी आँखें खुली थीं। और वो धीरे-धीरे हँस रहा था, जैसे कोई बच्चा पहली बार मिठाई का डिब्बा खोल रहा हो।"

मेरी रीढ़ में ठंडक चली गई।

"मैंने उससे पूछा," ज़ुबैर ने कहा, "'अरे, हाथ कैसे जला?' और उसने कहा — 'चाचा, आज मैंने वो ढूँढ लिया जो मेरे बाप के लिए ज़रूरी था।'"

"बाप के लिए?" मैंने कहा।

"यही बोला था," ज़ुबैर ने कहा। "बस यही। इसके बाद वो मेरी मेज़ पर बैठ गया, मेरी कुर्सी पर — जो मैं किसी को नहीं देता — और कहा, 'चाचा, गिलास में पानी।' बस। 'पानी दे' नहीं। 'चाचा, पानी मिलेगा?' नहीं। सीधा — गिलास में पानी।"

उसने अपनी उँगली उठाई।

"वो बोलने का तरीक़ा मैं भूल नहीं सकता। उस आवाज़ में वही लड़का था, वही गला। पर उसका हुक्म बदल गया था। जैसे किसी ने उसकी आवाज़ के अंदर एक और आदमी बैठा दिया हो, जो उसी गले से बोल रहा हो।"

टिंकू ने धीरे से कहा, "फूट।"

ज़ुबैर की आँखें उसकी तरफ़ घूमीं।

"क्या बोला?"

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "आगे बताइए।"

वो कुछ देर टिंकू को देखता रहा, फिर चश्मा उठाकर पहन लिया और बोला, "उस रात मैंने एक तस्वीर ली।"

मैं आगे झुक गया।

"क्यों?" मीरा ने पूछा। "आपने तस्वीर क्यों ली?"

"क्योंकि मैं डर गया था," ज़ुबैर ने कहा। "और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि डर किस बात का है। मुझे लगा कि अगर मैं इसे काग़ज़ पर उतार लूँगा तो मैं समझ जाऊँगा। तस्वीर हमेशा सच को सामने खींच लाती है।" उसने अपनी मेज़ पर हाथ रखा। "कैमरा मेरी मेज़ पर ही था। मैंने बिना सोचे उठाया, फ़्लैश चलाया और एक तस्वीर ले ली। फिर मैंने उसे कहा कि देखो, बैठो, मैं तुम्हारी तस्वीर उतार रहा हूँ। और उसने —" उसका गला रुक गया। "उसने अपना जला हुआ हाथ कैमरे की तरफ़ उठा दिया। जैसे वो कह रहा हो कि जो चीज़ मेरे हाथ में है, उसे मत देखना।"

"और तस्वीर में क्या आया?" मैंने पूछा।

"मैंने उसे छापा नहीं," ज़ुबैर ने कहा। "बीस साल में उसे छापा नहीं। मैंने सिर्फ़ नेगेटिव रखा और दराज़ बंद कर दी। मुझे लगा कि अगर मैं इसे छापूँगा तो मेरे घर में उस रात की हवा घुस आएगी।"

"तो नेगेटिव आपके पास है?" मीरा ने कहा।

ज़ुबैर कुछ नहीं बोला।

"ज़ुबैर चाचा," उसने कहा, "मेरे लिए यह बहुत ज़रूरी है।"

"सबके लिए सब ज़रूरी होता है," ज़ुबैर ने कहा। "और सब दूसरों से माँगते हैं। बीस साल तक कोई नहीं आया। बीस साल तक उसके रास्ते से लोग ऐसे गुज़रे जैसे वो लड़का कभी था ही नहीं।"

मैंने पूछा, "उसका बाप?"

ज़ुबैर ने मेरी तरफ़ देखा।

"तुम ठीक सवाल पूछता है, बेटा," उसने कहा। "और यही तुम्हारी सबसे बड़ी मुसीबत है।"

"फिर भी बताइए।"

वो अपनी कुर्सी पर पीछे झुक गया और उसकी कुर्सी चरचराई।

"उसका बाप," उसने कहा, "महीनों अपने बेटे को ढूँढता रहा।"

मुझे लगा गली का शोर कहीं पीछे चला गया है।

"वो आदमी जो झुकी कमर और लाठी से चलता था," ज़ुबैर ने कहा, "वो मेरी दुकान पर आया। मुझसे पूछा — 'ज़ुबैर भाई, मेरा बेटा यहाँ आया था?' मैंने कहा — हाँ आया था। उसने पूछा — 'कब?' मैंने कहा — कुछ दिन पहले। फिर वो कुछ देर चुप खड़ा रहा और बोला — 'उसने घर लौटना बंद कर दिया है।'" उसने मेरी तरफ़ देखा। "सोचो बेटा। बेटा घर छोड़कर नहीं गया। बेटा घर आना बंद कर दिया। दोनों बातें एक जैसी लगती हैं, पर एक में गुस्सा होता है और दूसरे में डर।"

"आपने उस बाप को तस्वीर दिखाई?" मैंने पूछा।

ज़ुबैर ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"नहीं," उसने कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि मैं डर गया था," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो सिर्फ़ सच में आती है। "मैंने सोचा कि अगर वो बूढ़ा आदमी उस तस्वीर में अपने बेटे का चेहरा देख लेगा और उस चेहरे पर वो मुस्कान देख लेगा, तो वो मर जाएगा। और मैं उसकी मौत का हिस्सा नहीं बनना चाहता था। तो मैंने उसे कुछ नहीं बताया। मैंने उसे बस इतना कहा — 'भाई, वो शहर के काम में लग गया होगा।'" उसने आँखें खोलीं। "और वो बूढ़ा आदमी मेरे पास महीने में एक बार आता रहा। एक साल तक। हर बार वही सवाल। हर बार मेरा वही झूठ।"

"और फिर?" मीरा ने धीरे से पूछा।

"और फिर वो आना बंद कर दिया," ज़ुबैर ने कहा। "मुझे लगा कि शायद बेटा लौट आया। बाद में पता चला कि उस बूढ़े आदमी की मौत हो गई। अकेले। उसके घर में। और जब उसकी अर्थी उठी —"

उसने रुककर अपना गला साफ़ किया।

"तब उसका बेटा वहाँ नहीं था," उसने कहा। "वो उस दिन शहर के दूसरे कोने में था। एक उद्घाटन पर। रिबन काट रहा था, तालियाँ ले रहा था, अख़बार वालों को अपनी तस्वीर खिंचवा रहा था।"

टिंकू ने कुछ कहना चाहा और उसकी आवाज़ नहीं निकली।

"उसका बाप मरा," ज़ुबैर ने कहा, "और उसने अपने बाप की अर्थी नहीं उठाई।"

कमरे में चुप्पी इतनी भारी थी कि लगा दीवारों पर लटके फ्रेम साँस ले रहे हैं।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ।

वो ठंडी थी।

न गरम, न गुनगुनी। ठंडी।

जैसे वो भी सुन रही हो और अभी कुछ न कहना चाह रही हो।

"ज़ुबैर चाचा," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कोमलता थी जो वो कभी-कभार निकालती है, बहुत कम। "आपने उस तस्वीर को छापा नहीं। पर आपने उसे रखा क्यों? आप उसे जला सकते थे।"

"जला नहीं सका," ज़ुबैर ने कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि वो रात मेरी अपनी भी थी," उसने कहा। "मैं उसे जलाता तो अपनी उस रात को जला देता। और उस रात में उसके बाप की लाठी की आवाज़ भी थी, जो मेरी दुकान के बाहर रुककर पूछती थी — 'ज़ुबैर भाई, मेरा बेटा यहाँ आया था?'"

उसने चश्मा उतार दिया और उसे मेज़ पर रख दिया।

मैंने देखा कि उसकी आँखें गीली हैं, और वो गीली आँखों को छिपाने की कोशिश नहीं कर रहा था।

"मैंने उस आदमी से झूठ बोला था," उसने कहा। "और मैंने उस झूठ को इसलिए बोला था कि मैं उसे बचाना चाहता था। पर वो नहीं बचा। और मेरा झूठ किसी काम का नहीं रहा।"

मैंने बहुत धीरे से कहा, "आपने उसका बेटा नहीं छीना था, चाचा। उसका बेटा किसी और ने छीना था।"

उसने मेरी तरफ़ देखा और कुछ देर मुझे देखता रहा।

"तुम कितने साल के हो?" उसने पूछा।

"चौबीस।"

"चौबीस साल की उम्र में मुझे ऐसी बातें किसी ने नहीं कही थीं," उसने कहा। "मुझे तो सत्तर साल में किसी ने नहीं कहीं।"

वो उठा।

"नेगेटिव मेरी दराज़ में है," उसने कहा। "और अगर तुम उसे देखना चाहते हो, तो एक बात पहले तय कर लो।"

"क्या?"

"तुम उस आदमी से लड़ोगे या उसके अंदर वाले आदमी से?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"मैं समझा नहीं।"

ज़ुबैर ने अपनी मेज़ की तरफ़ इशारा किया, जहाँ अब भी वो नेगेटिव की पट्टी पड़ी थी, वो पहली वाली जिसे वो हमारे आने से पहले उँगलियों में घुमा रहा था।

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