The Mysterious Bell – Chapter 804
मैंने तस्वीर उसके हाथ से ली और उसे धूप में उठाया।
मोहर के अक्षर धुँधले थे, पर पढ़े जा सकते थे।
ज़ुबैर फोटो स्टूडियो।
और उसके नीचे छोटे अक्षरों में — पुराना बाज़ार, बिजलीघर की गली।
"यह स्टूडियो बीस साल से बंद है," मीरा ने कहा। "यह मैं जानती हूँ, क्योंकि मैंने उसकी एक खबर बनाई थी — जिस स्टूडियो में एक ज़माने में पूरे शहर की शादियों की तस्वीरें छपती थीं, वहाँ अब सिर्फ़ चूहे रहते हैं।"
"तो फिर इस तस्वीर पर उसकी मोहर क्यों है?" टिंकू ने पूछा। वो अब तक शांत नहीं बैठा था, उसके हाथ में मेरी रिंच थी जो उसने चुपके से ट्रंक से उठाई थी। "अगर दुकान बंद है तो मोहर कैसे चल रही है, उस्ताद?"
"यही तो सवाल है," मैंने कहा।
कौशल्या दादी पास आईं और उन्होंने मोहर पर उँगली रख दी।
"ज़ुबैर," उन्होंने धीरे से कहा, जैसे किसी पुराने नाम को मुँह में नचा रही हों। "यह वही ज़ुबैर है जो आग की रात के बाद सबसे पहले बाज़ार आया था। उसने उस रात कुछ तस्वीरें ली थीं।"
मेरा दिल एक धड़कन आगे बढ़ गया।
"तस्वीरें?" मैंने कहा। "कौन सी तस्वीरें?"
"मुझे नहीं पता," कौशल्या ने कहा। "उसने कभी दिखाई नहीं। पर उस रात के बाद उसकी दुकान बंद हो गई थी।"
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ ली।
"अंकुश," उसने कहा। "अगर उसके पास उस रात की तस्वीर है —"
"तो उसके पास उस रात का चेहरा है," मैंने कहा। "और उस रात का चेहरा ही हमें बताएगा कि आग लगाने वाला कौन था।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा सीढ़ी के पास खड़े थे, हाथ में मेरी घंटी से बँधा वो धागा जो काजल ने दिया था, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई बहुत पुरानी बात सुनकर अचानक जाग गया हो।
"पापा," मैंने कहा। "मैं जा रहा हूँ पुराने बाज़ार।"
"मैं साथ चलूँगा," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में जो था, वो मैंने पहले कभी नहीं सुना था। मिनती नहीं, हुक्म नहीं। बस एक कोशिश — जैसे टूटा आदमी अपने टूटे हिस्से को जोड़ने चल पड़ा हो।
"नहीं, पापा," मैंने कहा। "आप यहीं रहिए। माँ अस्पताल में हैं, काजल उनके पास है, और आज रात वो आदमी आने वाला है। अगर मैं आपको साथ ले गया और वो आ गया, तो माँ अकेली रह जाएँगी।"
उन्होंने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गए। और मुझे पता था कि वो चुप्पी उन्होंने मेरी बात मानकर नहीं चुनी थी — उन्होंने डर से चुनी थी।
मैंने उनका कंधा थपथपाया।
"आप माँ के पास जाइए," मैंने कहा। "उनसे कहिए कि आज रात दरवाज़ा खोलने से पहले मेरी आवाज़ सुन लें। बस मेरी आवाज़।"
उन्होंने सिर हिलाया।
और फिर मैं मीरा और टिंकू के साथ गली के मुँह की तरफ़ चल पड़ा।
रास्ते में शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं और मेरे हाथ में दो समोसे और एक कटोरी चाय थमा दी।
"बिना कुछ खाए नहीं जाएगा," उन्होंने कहा। "तेरे पापा की तरह भूखा रहकर हीरो मत बन।"
"आपा," मैंने कहा, "मैं हीरो नहीं हूँ।"
"तो और बुरा है," उन्होंने कहा। "हीरो को तो लोग याद रखते हैं। तू तो बस वो है जिसे लोग भूल जाएँगे अगर आज रात कुछ गड़बड़ हो गई। खा।"
मैं खा ही रहा था कि उस्ताद अली बक्श दौड़ते हुए आए।
"ज़ुबैर की दुकान पर मत जाओ," उन्होंने कहा, साँस फूल रही थी।
मैंने समोसा निगल लिया।
"क्यों?"
"क्योंकि मैं उसे जानता हूँ," उस्ताद ने कहा। "वो पचास साल का आदमी है, पर उसका डर सौ साल का है। उसने उस रात कुछ देखा था, और उस रात के बाद उसने अपनी दुकान बंद कर दी और कभी किसी को कुछ नहीं बताया। मुझसे भी नहीं।"
"तो आज बताएगा," मैंने कहा।
"अंकुश," उस्ताद ने कहा, और उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली। "अगर वो बीस साल चुप रहा है, तो उसकी चुप्पी में कुछ है। ऐसे आदमी से सवाल ऐसे पूछे जाते हैं जैसे फटे हुए ज़ख्म से पट्टी खोली जाती है। धीरे।"
उनकी आँखों में कुछ था जो मुझे माँ की आँखों की याद दिलाता था।
"ठीक है," मैंने कहा। "धीरे पूछूँगा।"
उस्ताद ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और कुछ देर मुझे देखते रहे, फिर पीछे लौट गए।
टिंकू ने मीरा की कार की पिछली सीट पर बैठकर कहा, "उस्ताद, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर वो बूढ़ा तस्वीर नहीं दिखाता, तो?"
मैंने खिड़की से बाहर देखा। गली के मकान पीछे छूट रहे थे, दूकानें, पीपल, चबूतरी, सब पीछे।
"तो हम उसकी दुकान में चूहे पकड़ेंगे," मैंने कहा। "और देखेंगे कि चूहे किस चीज़ की खुशबू लेकर आते हैं। बूढ़े आदमी की दराज़ में तस्वीर नहीं होगी, तो कहीं न कहीं उसका डर ज़रूर होगा। और डर हमेशा अपने पीछे एक तार छोड़ जाता है।"
टिंकू ने सोचा, फिर सिर हिलाया।
"उस्ताद," उसने फिर कहा, "वो सफ़ेद कुर्ते वाला —"
"उसका नाम नहीं पता," मैंने कहा।
"वो सफ़ेद कुर्ते वाले की उँगली पर जो नीली स्याही थी," टिंकू ने कहा, "वो अगर लिखने की स्याही थी, तो उसने कब लिखा? आज सुबह? या रात में जब हम सो रहे थे?"
मीरा ने पीछे देखा, फिर मुझे देखा।
"यह बच्चा," उसने कहा, "कभी-कभी ऐसा सवाल पूछता है कि मुझे अपनी पुरानी खबरें याद आ जाती हैं।"
"मीरा दीदी," टिंकू ने कहा, "मैं बच्चा हूँ, बेवकूफ़ नहीं।"
मीरा हँसी। पहली बार आज सुबह से।
पुराने बाज़ार की गली में घुसते ही हवा बदल गई।
यहाँ की हवा में तेल, लोहे और पुराने काग़ज़ की गंध थी। गली इतनी तंग थी कि दो आदमी सीधे खड़े हो जाएँ तो तीसरा फँस जाए। ऊपर तारों का जाल था, बीच में पानी टपक रहा था किसी टंकी से, और दोनों तरफ़ शटर पर शटर बंद पड़े थे — किसी पर चार साल की धूल, किसी पर तो ज़ंग के फूल उग आए थे।
बिजलीघर की गली का मोड़ आया और मीरा ने कार रोक दी।
"आगे कार नहीं जाएगी," उसने कहा।
हम उतरे।
गली के आख़िर में, एक बंद शटर के आधे हिस्से से पीली रोशनी की एक पतली लकीर बाहर आ रही थी।
शटर आधा खुला था। बस इतना, जितने में एक आदमी झुककर निकल सके।
और शटर के ऊपर, ज़ंग खाए बोर्ड पर, उभरे अक्षरों में लिखा था — ज़ुबैर फोटो स्टूडियो।
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "अंदर अजीब बदबू आ रही है।"
"वो बदबू नहीं है," मीरा ने कहा, धीरे से। "वो केमिकल है। डार्क रूम की बदबू।"
मैं झुका और शटर के नीचे से अंदर झाँका।
अंदर अँधेरा था, पर वो अँधेरा ऐसा नहीं था जैसा बंद कमरे में होता है। यह वो अँधेरा था जिसमें आँखें डालकर सामान सहेजा जाता है। दीवारों पर तारों से तस्वीरों के फ्रेम लटके थे — किसी शादी के, किसी के बच्चे के, किसी के बूढ़े बाप के। धूल उन पर इतनी थी कि लगता था तस्वीरों के चेहरों पर किसी ने सफ़ेद परदा डाल दिया हो।
और उस अँधेरे के बीच, एक लकड़ी की मेज़ पर, पीले बल्ब की रोशनी में एक आदमी बैठा था।
मोटा चश्मा। सफ़ेद बाल। काला कुर्ता। हाथ में एक पतली, लंबी काली पट्टी जिसे वो धीरे-धीरे अपनी उँगलियों के बीच घुमा रहा था।
नेगेटिव की पट्टी।
वो बिना सिर उठाए बोला, "शटर गिरा दो।"
"ज़ुबैर चाचा," मीरा ने कहा।
उसका हाथ रुका।
"ज़ुबैर चाचा," मीरा ने फिर कहा, "हम आपसे रणवीर भारद्वाज के बारे में पूछने आए हैं।"
चश्मे के पीछे उसकी आँखें उठीं।
उसने हमें एक-एक करके देखा — मीरा को, मुझे, टिंकू को। फिर उसने नेगेटिव की पट्टी मेज़ पर रख दी, दोनों हाथों से अपनी कुर्सी की बाहें पकड़ीं, और इतनी देर हँसा कि उसकी हँसी खाँसी में बदल गई।
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