The Mysterious Bell – Chapter 803
मेरी जेब में घंटी और ठंडी हो गई।
"नाम बोल," ठंडी आवाज़ ने फिर कहा। "वरना यह चाबी तेरे हाथ में रहकर भी बेकार रहेगी।"
मैंने चाबी को अपनी हथेली में कसा। वो भारी थी। बहुत भारी। ऐसी भारी जैसे उसमें सिर्फ़ लोहा न हो, कुछ और भी हो।
और तभी, मेरे पीछे से एक आवाज़ आई। छोटी, पतली, घबराई हुई।
"उस्ताद!"
टिंकू। वो नीम के पेड़ के नीचे से भागकर आया था, और उसका एक जूता पैर से उतर आया था, जिसे वो हाथ में उठाए हुए था।
"उस्ताद," उसने हाँफते हुए कहा, "वो मशीन… वो मशीन पीछे वाले प्लॉट पर आ गई है। दो ट्रक हैं। और एक आदमी सफ़ेद काग़ज़ लेकर खड़ा है, जो कह रहा है कि सात बजे की तारीख़ दी जा चुकी है।"
मैंने सीढ़ी पर खड़े आदमी को देखा।
उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी उँगली उठाकर टिंकू की तरफ़ इशारा किया — जैसे कह रहा हो, "देख, तेरा वक़्त खत्म हो रहा है।"
मैंने घंटी जेब से बाहर निकाली।
वो मेरी हथेली पर ठंडी थी, और उसका पीतल सुबह की रोशनी में भी बेरंग लग रहा था।
"सुन," मैंने ठंडी आवाज़ से कहा। "तू मुझसे नाम माँग रही है। मैं तुझे नाम दूँगा। पर एक बात पहले सुन ले।"
"बोल।"
"मैं उस आदमी का नाम नहीं जानता जिसने तुझे दो टुकड़ों में बाँटा," मैंने कहा। "मैं पचास साल पहले पैदा नहीं हुआ था। मैंने वो रात नहीं देखी। मैंने वो आग नहीं देखी। मेरे परदादा की चुप्पी मुझे विरासत में मिली, उनका नाम नहीं।"
घंटी चुप रही।
"पर मैं उन लोगों के नाम जानता हूँ," मैंने कहा, "जिन्होंने इस गली को आज तक ज़िंदा रखा।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
"शंकर यादव," मैंने कहा। "मेरे पापा। जिन्होंने डर के मारे अंगूठा लगाया, और आज सबके सामने उसे कबूल किया।"
पापा का सिर झुक गया।
"सुशीला यादव," मैंने कहा। "मेरी माँ। जो अस्पताल के पाँचवें बेड पर हैं, और जिन्होंने पापा की चुप्पी को बाईस साल अपनी चुप्पी से ढका।"
कौशल्या दादी की लाठी ज़मीन पर टिकी रही, पर उनका हाथ काँपा।
"काजल यादव," मैंने कहा। "मेरी बहन। जो अठारह साल की है और स्कूल के काग़ज़ों में अपने बाप का नाम ढूँढती है।"
कौशल्या दादी ने कहा, "और कौशल्या। शिवनारायण यादव की बहन। जो पचास साल से घर में बैठी थी।"
शांति देवी ने कहा, "और शांति। जिसने ताला उठाया और काग़ज़ छिपाया, और जो आज ताले के साथ खड़ी है।"
उस्ताद अली बक्श ने कहा, "और अली बक्श। जिसने पचास साल अपनी मशीन पर टाँका लगाया और भाई से बात नहीं की।"
याकूब ने कहा, "और याकूब। इलाही बक्श का बेटा। जो अपने बाप का नाम आज सबके सामने ले रहा है।"
शबनम आपा ने गुमटी से आवाज़ दी, "और शबनम! और रज़िया! और यह पूरी गली, जिसका तूने एक-एक रिश्ता तोड़ने की कोशिश की!"
फिर बच्चे आगे आए। सानिया ने कहा, "सानिया!" गुड्डू ने कहा, "गुड्डू!" रफ़ीक़ ने कहा, "रफ़ीक़!" और चिंटू ने इतनी ज़ोर से कहा, "चिंटू!" कि उसकी आवाज़ अस्पताल की दीवार से टकराकर लौटी।
और फिर मैंने कहा।
"मैं अंकुश यादव। जगदीश यादव का पोता। शिवनारायण यादव का परपोता। इस गली की सात नंबर दुकान वाला। और इस घंटी का रखवाला — न मालिक, न चोर। रखवाला।"
घंटी मेरी हथेली में गुनगुनी हुई।
धीरे-धीरे। ठंडी नहीं रही।
और ठंडी आवाज़ ने कहा — इस बार वो खुरचती नहीं थी, बस थोड़ी दबी हुई थी, जैसे किसी ने किसी पुराने कमरे की खिड़की खोल दी हो।
"यह नाम नहीं है," उसने कहा। "यह हिसाब है।"
"हिसाब ही नाम से बड़ा होता है," मैंने कहा।
वो चुप हो गई।
सफ़ेद कुर्ते वाले ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी।
"अच्छा," उसने कहा। "तो तू नाम नहीं देगा।"
"मैं नाम दूँगा," मैंने कहा। "जिस दिन तेरा मालिक आएगा, उस दिन मैं उसका नाम नहीं पूछूँगा। उस दिन वो खुद बोलेगा।"
"हिम्मत है," उसने कहा।
"हिम्मत नहीं है," मैंने कहा। "पूरी गली है।"
वो हँसा, पर इस बार हँसी में कुछ कम था।
मैंने चाबी ऊपर उठाई।
"यह चाबी अगर उस ताले की है जो मेरे घर के पीछे है," मैंने कहा, "तो यह मेरी है। तू इसे लेकर आया, इसका मतलब यह नहीं कि यह तेरी है।"
उसने कुछ कहना चाहा —
और उसी वक़्त मेरे पीछे किसी ने मेरा कंधा पकड़ा।
मैंने पलटकर देखा।
मीरा थी। उसका फटा बैग कंधे से फिसल आया था, और उसके हाथ में रणवीर की पुरानी तस्वीरों का बंडल था। उसने एक तस्वीर निकाली थी — वही तस्वीर, जिसमें रणवीर गले में ताबीज़ लटकाए किसी मंदिर के सामने हाथ जोड़े खड़ा था।
"अंकुश," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ अजीब थी। "सुन।"
"मीरा, अभी नहीं —"
"अंकुश, सुन!" उसने कहा, और उसकी आवाज़ ऐसी थी कि मैं रुक गया।
उसने तस्वीर पलट दी।
तस्वीर के पीछे, उस पुराने काग़ज़ की पीठ पर, एक धुँधली गोल मोहर लगी थी। मोहर का रंग उड़ गया था, पर अक्षर बचे हुए थे। और उन अक्षरों के साथ नीली स्याही में कुछ लिखा हुआ था — किसी कलम से, किसी आदमी के हाथ से।
मैंने झुककर देखा।
मीरा ने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया और उसकी उँगली उन अक्षरों पर रख दी।
"यह स्टूडियो तो बीस साल से बंद है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सन्नाटा था जो किसी बड़ी चीज़ से पहले आता है।
"फिर इस मोहर पर लिखा नाम आज भी ज़िंदा कैसे है?"
सफ़ेद कुर्ते वाले ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और अपनी उँगली फिर पोंछी।
और मैंने उसकी उँगली पर, छल्ले के उस सफ़ेद निशान के नीचे, नीली स्याही की एक पुरानी लकीर देखी।
एक लकीर जो अभी भी उस पर सूखी नहीं थी।
॥
सफ़ेद कुर्ते वाले ने रूमाल जेब में रखा और अपनी उँगली को हथेली के अंदर कर लिया, जैसे कोई बच्चा चॉकलेट छिपाता है।
"तेरी उँगली पर नीली स्याही है," मैंने कहा। "कहीं तू अभी कुछ लिखकर आया है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर मुस्कुराया — वैसी ही फीकी मुस्कान, जो अब तीन बार फीकी पड़ चुकी थी।
"मैं चाबी हूँ," उसने कहा। "चाबी पर स्याही नहीं होती, चाबी पर सिर्फ़ ज़ंग होती है।"
"तेरे हाथ पर ज़ंग नहीं है," मैंने कहा। "स्याही है। और स्याही उसी के हाथ पर होती है जो लिखता है।"
वो कुछ नहीं बोला। बस अपनी उँगली को कुर्ते की आस्तीन में छिपाकर पीछे मुड़ा और सीढ़ी के पत्थर पर लकड़ी के जूतों से तीन कदम चला।
खट। खट। खट।
वो आवाज़ मुझे अब तक परेशान करती है। इंसान के जूते ऐसी आवाज़ नहीं करते। वो आवाज़ किसी ऐसे आदमी की होती है जो चलता नहीं, गिनता है।
"मेरा भेजने वाला आज रात आएगा," उसने पीठ फेरकर कहा। "तब तक तू अपना भीतर वाला नाम ढूँढ ले, अंकुश यादव। क्योंकि बाहर वाले नाम से तेरी दुकान नहीं बचेगी।"
"और तेरा भेजने वाला अगर रात को सच बोलने लगे," मैंने कहा, "तो उसका नाम भी गली के रजिस्टर में लिख जाएगा। उसी रजिस्टर में, जिसमें तेरे मालिक ने अपना नाम चिपकाकर छिपा रखा है।"
वो रुका। एक पल के लिए। फिर चल दिया।
मैंने उसे जाते हुए देखा और मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो न डर था, न गुस्सा। बस एक अजीब-सी बेचैनी — जैसे कोई पुराना ताला खुल रहा हो और उसके अंदर से हवा बाहर आ रही हो, जो पचास साल से बंद थी।
मीरा अब भी मेरे कंधे के पास खड़ी थी, तस्वीर हाथ में।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "यह मोहर मुझे जानी-पहचानी लग रही है।"
"कहाँ से?"
"मैंने इसे पहले देखा है।" उसने आँखें सिकोड़ीं। "पुराने बाज़ार में। एक बंद दुकान के शटर पर, बीस साल पुरानी चिपकी सूचना पर।"
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