The Mysterious Bell – Chapter 782
हँसी फूटी। पूरी गली की। धीरे-धीरे, जैसे किसी बरसात के बाद मिट्टी से पानी का बहाव निकलता है।
टिंकू ने अपना कार्डबोर्ड माइक ऊपर उठाया और उस पर ज़ोर से फूँका — और कार्डबोर्ड से आवाज़ आई, "हैलो, हैलो।" बच्चे हँसे। पूरी गली हँसी।
और मैंने उस हँसी में अपनी घंटी को फिर गरम होते महसूस किया।
एक छोटी सी बात उसने कही — बहुत धीरे, तीन शब्द — "अब आगे।"
मैंने सिर हिलाया।
और मैंने अपनी जेब से हाथ निकाला और शांति देवी की तरफ़ बढ़ाया। मेरी हथेली पर हरी शीशे की चूड़ी थी।
"बड़ी बी," मैंने कहा, "ये मुझे कौशल्या दादी ने दी थी। पर ये असली में आपकी है। मैं इसे आपको लौटा रहा हूँ। क्योंकि आज से ये चूड़ी उस औरत की नहीं रहेगी जो डर से चुप रही — ये उस औरत की रहेगी जिसने पचास साल बाद अपना नाम बोला।"
शांति देवी ने चूड़ी ली।
उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने चूड़ी पहनी और फिर पूरी गली की तरफ़ देखा।
"अब मैं वो नाम बोलूँगी," उन्होंने कहा, "जो ताले में बंद है। और उस नाम के बाद, अगर कोई मुझे रोकना चाहे — तो वो आज यहाँ खड़े होकर बोले।"
उस वक़्त मशीन रुक गई।
पूरी तरह रुक गई। जैसे उसने भी अपनी आवाज़ नीचे रख दी हो।
और उस चुप्पी में, पीपल की सबसे ऊँची डाल पर, एक पत्ता हिला — और मुझे लगा कि किसी ने वहाँ से देखा।
मैंने सिर उठाकर देखा। पत्तों के बीच सिर्फ़ आसमान था।
पर मेरे कान में घंटी ने धीरे से कहा, "वहाँ कोई है।"
और मैंने लाठी अपनी मुट्ठी में कस ली।
शांति देवी ने साँस ली और बोलीं, "ताले में जो नाम बंद है, वो नाम है—"
और ठीक उसी पल, अस्पताल की तरफ़ से एक लंबी सीटी बजी।
सीटी। वही सीटी जो रफ़ीक़ और गुड्डू को दी गई थी — गली के मोड़ पर खबर देने के लिए।
मैंने पलटकर देखा।
रफ़ीक़ मोड़ से भागता हुआ आ रहा था। उसका चेहरा लाल था और आँखें फटी हुई थीं।
"उस्ताद!" वो चिल्लाया, और उसकी आवाज़ फट गई। "अस्पताल की सीढ़ी! वहाँ कोई खड़ा है! सफ़ेद कुर्ते में! और उसके हाथ में लोहे की पट्टी है — वो सीढ़ी तोड़ रहा है!"
गली में जो हुआ, वो मैं लिख नहीं सकता। पर मैं इतना कह सकता हूँ — शबनम आपा ने समोसे की प्लेट ज़मीन पर रख दी, कौशल्या दादी ने मेरे हाथ से लाठी खींच ली, और माँ ने मेरा कंधा पकड़कर कहा, "जा। हम यहाँ हैं।"
मैं दौड़ा।
और दौड़ते वक़्त मेरी जेब में घंटी गरम थी, गले में दादा की चाबी थी, और सामने अस्पताल की सीढ़ी थी — जहाँ कोई सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, पचास साल पुरानी अपनी परछाईं के साथ, आज गली के सबसे बड़े सच को तोड़ने आया था।
॥
मैं दौड़ रहा था और मेरे पीछे पूरी गली दौड़ रही थी।
पता नहीं तुमने कभी महसूस किया है या नहीं — जब सौ लोग एक साथ दौड़ते हैं, तो ज़मीन की आवाज़ बदल जाती है। जैसे कोई बड़ा ढोल बज रहा हो, धीरे-धीरे, और उस ढोल के नीचे तुम्हारी अपनी साँस कहीं दब जाती है।
मेरी जेब में घंटी गरम थी। इतनी गरम कि मुझे लगा जेब का कपड़ा जल जाएगा। गले में दादा की चाबी उछल रही थी और हर क़दम पर मेरी छाती से टकरा रही थी, जैसे कोई चलते-चलते उँगली से गिन रहा हो — एक, दो, तीन।
कौशल्या दादी मेरे हाथ से लाठी खींच चुकी थीं। उनकी उम्र सत्तर के पार है, कमर झुकी हुई है, पर उस वक़्त वो लाठी लेकर मेरे बराबर दौड़ रही थीं। शबनम आपा हाथ में चिमटी लिए पीछे थीं और चिमटी से हवा काट रही थीं, जैसे रास्ता साफ़ कर रही हों। टिंकू मेरे बगल में था, उसका कार्डबोर्ड माइक अब भी हाथ में, और वो भागते-भागते कह रहा था, "उस्ताद, मैं पीछे नहीं रुकूँगा। मैंने कहा था ना, अब मैं कहीं नहीं रुकता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं। सिर्फ़ इतना कहा, "दौड़ता रह। और मेरे पीछे रहना।"
अस्पताल का गेट दिखा।
और मैंने वो दृश्य देखा जो मुझे आज तक रातों में याद आता है — हालाँकि उस वक़्त मुझे पता भी नहीं था कि ये दृश्य मेरे जीवन का सबसे ज़रूरी दृश्य बनने वाला है।
सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी सीढ़ी की सबसे नीचे वाली पत्थर की पट्टी पर खड़ा था। उसके जूते सफ़ेद थे — इतने सफ़ेद कि अस्पताल की धूल भी उन पर बैठने से शरमा रही थी। उसके हाथ में लोहे की लंबी चपटी पट्टी थी, और वो उसे सीढ़ी के जोड़ में डालकर धीरे-धीरे मोड़ रहा था। तेज़ी से नहीं, गुस्से से नहीं — आराम से। जैसे कोई दिन भर का काम कर रहा हो और उसे जल्दी न हो।
पत्थर में से चरचर की आवाज़ आ रही थी।
मैंने दौड़ते-दौड़ते चिल्लाकर कहा, "रुक जा!"
वो रुका।
धीरे से पट्टी बाहर निकाली, उसे अपने सफ़ेद कुर्ते के पल्लू से पोंछा — जैसे औज़ार को साफ़ करना ज़रूरी हो — और फिर पलटा।
उसका चेहरा।
मैं उसके चेहरे को तुम्हारे सामने पूरा नहीं खोलूँगा, क्योंकि उस वक़्त भी वो पूरा खुला नहीं था। पर इतना कहूँगा — वो चेहरा डरावना नहीं था। वो चेहरा शांत था। और यही सबसे डरावनी बात थी।
उसने मुझे देखा और मुस्कुराया।
"अंकुश यादव," उसने कहा, "तुम आ गए। मुझे पता था तुम आओगे। तुम्हारे दादा भी ऐसे ही आते थे।"
मैं रुक गया। पूरी गली मेरे पीछे रुक गई।
"तुम्हें मेरे दादा के बारे में क्या पता?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सामान्य निकली, और मुझे अपनी आवाज़ पर हैरानी हुई।
"मुझे सब पता है," उसने कहा। "पता है तुम्हारे दादा ने किस दिन आख़िरी बार अपनी दुकान का ताला खोला था। पता है तुम्हारे पापा ने किस दिन पहली बार डर के आगे घुटना टेका था। और पता है तुम्हारी घंटी में क्या कमी है।"
मेरी जेब में घंटी ने उस वक़्त कुछ नहीं कहा। बस गरम रही। बहुत गरम।
पीछे से कौशल्या दादी आईं, लाठी ज़मीन पर टेकती हुई। उन्होंने उस आदमी को देखा और उनका चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
"तू," उन्होंने कहा। बस इतना। एक ही शब्द। पर उस एक शब्द में पचास साल थे।
आदमी ने कौशल्या दादी की तरफ़ देखा और फिर बहुत विनम्रता से सिर झुकाया। "बहन जी," उसने कहा, "आप अब भी वही लाठी रखती हैं। अच्छा है। पुरानी चीज़ें बदलनी नहीं चाहिए।"
"तूने उस रात झूठ बोला था," दादी की आवाज़ काँप रही थी, पर डर से नहीं — गुस्से से। "तूने मेरे भाई के कान में ज़हर डाला।"
"मैंने ज़हर नहीं डाला," उसने कहा, "मैंने सिर्फ़ एक बात कही थी। और सच कहूँ तो मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि वो इतनी जल्दी मान जाएगा। मुझे लगा था तुम्हारा भाई पूछेगा। लेकिन नहीं। उसने पूछा ही नहीं। और यही मेरी सबसे बड़ी कमाई थी।"
मेरे भीतर कुछ हिला।
क्योंकि मैं जानता था कि वो सच बोल रहा है। मैं जानता था कि दादा ने पूछा नहीं था। और मुझे यह भी पता था कि मेरे पापा ने भी पूछा नहीं था — चंद्रेश के दफ़्तर में, उस रात, उन्होंने काग़ज़ पढ़े बिना अंगूठा लगा दिया था।
बाप और बेटा, दो पीढ़ियाँ, एक ही ग़लती।
मैंने उस आदमी की तरफ़ एक क़दम बढ़ाया।
"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
"नाम?" उसने कहा। "नाम से क्या होता है, अंकुश? नाम तो वो चीज़ है जो दीवार पर लिखी जाती है और फिर मिटा दी जाती है। तुम्हारे दादा का नाम भी मिटाया गया था, है ना? तुम्हारे ही घर में। तुम्हारे ही संदूक में।"
मेरी जेब में घंटी गरम से गरम हो रही थी। मुझे लगा जैसे वो जलने लगी है।
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