The Mysterious Bell – Chapter 783
तभी पीछे से आवाज़ आई — पापा की आवाज़। वो भागते हुए आ रहे थे, माँ का हाथ पकड़े हुए, और उनकी साँस फूल रही थी।
"तू… तू वही है," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी।
आदमी ने पापा को देखा और मुस्कुराया। "हाँ, शंकर भाई। मैं वही हूँ। पचास साल पहले तुम्हारे पिता को मिला था, बाईस साल पहले तुम्हें मिला था, और आज तुम्हारे बेटे को मिल रहा हूँ। तीन पीढ़ियाँ। ये रिकॉर्ड है, शंकर भाई।"
और फिर उसने वो किया जो मुझे आज तक समझ नहीं आया।
उसने पट्टी ज़मीन पर रख दी।
"मैं सीढ़ी नहीं तोड़ रहा था," उसने कहा, "मैं सिर्फ़ तुम्हें बुला रहा था। और तुम आ गए। बस इतना ही चाहिए था।"
वो हँसा। हल्की सी हँसी, जैसे कोई पुराना वाकया याद आ गया हो।
और फिर वो मुड़ा और चला गया।
पूरी गली ने देखा। कोई रोका नहीं। मैं भी नहीं रोका। क्योंकि उस वक़्त मुझे लगा कि अगर मैंने उसे रोका, तो वो कुछ और बोलेगा और मैं उसे सुनना नहीं चाहता था।
वो गली के मोड़ से मुड़ा और गायब हो गया।
मशीन की आवाज़ फिर शुरू हुई। धीरे-धीरे, जैसे किसी ने उसे फिर से ऑन कर दिया हो।
मैंने सीढ़ी को छुआ। सबसे नीचे की पट्टी में एक पतली दरार आ गई थी। गहरी नहीं। पर थी।
मैंने पलटकर गली को देखा और मेरे मुँह से निकला, "सीढ़ी बची है।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
फिर शबनम आपा ने कहा, "सीढ़ी बची है या नहीं, ये तो डॉक्टर साहब बताएँगे। और तुम अब मेरे साथ चलो। पीपल के नीचे। वहाँ कोई तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"
मैंने पूछा कौन।
"कौशल्या दादी," उन्होंने कहा, "और उनके हाथ में एक डायरी।"
वो लौटकर पीपल के नीचे पहुँचे। सूरज ढल रहा था और पीपल की छाया लंबी हो गई थी। चबूतरी पर कौशल्या दादी बैठी थीं और उनकी गोद में एक मोटी, पीली पड़ी, उखड़ी हुई जिल्द वाली डायरी थी।
पूरी गली वहाँ जमा थी। माँ को काजल पकड़े हुई थी। पापा चबूतरी के किनारे बैठे थे, सिर झुकाए। शांति देवी दादी के बगल में बैठी थीं और उनकी कलाई पर हरी शीशे की चूड़ी अब रोशनी में चमक रही थी।
मैंने कहा, "दादी, वो आदमी चला गया। सीढ़ी बच गई।"
कौशल्या दादी ने मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "आज सीढ़ी बच गई, कल दरवाज़ा टूटेगा। ये लड़ाई पत्थर की नहीं है। ये लड़ाई काग़ज़ की भी नहीं है। ये लड़ाई उस बात की है जो पचास साल पहले एक झूठ ने हमारे घर में घुसा दी थी। और उसे आज तुम्हें सुनना पड़ेगा।"
उन्होंने डायरी खोली।
काग़ज़ की गंध आई — पुरानी, हल्की फफूँद जैसी, और उसमें धूप भी थी। जैसे ये डायरी कभी खिड़की के पास पड़ी रही हो और फिर बंद हो गई हो।
उन्होंने पहला पन्ना उठाया।
"ये तुम्हारे परदादा की लिखाई है," उन्होंने कहा, "शिवनारायण यादव। और ये पन्ना उन्होंने उस रात लिखा था जिस रात पुराने बाज़ार में आग लगी थी। सिर्फ़ एक पन्ना बचा है। बाक़ी फट गए, जल गए, या किसी ने निकाल लिए। पर ये पन्ना काफ़ी है। क्योंकि इसमें वो बात लिखी है जो किसी ने किसी को नहीं बताई।"
उन्होंने पढ़ना शुरू किया।
धीरे-धीरे। हर शब्द को ज़मीन पर रखकर, जैसे कोई भारी बोरी रखता है।
"पुराने बाज़ार में एक पीपल था," दादी ने कहा, "आज भी है। तुमने उसे देखा है। उसके नीचे शिवनारायण और इलाही बक्श ने पहली दुकान खोली थी। बड़ी दुकान नहीं थी, बेटा। एक चटाई, एक औज़ारों की पेटी, एक छोटा सा बोर्ड। बोर्ड पर पैसों का हिसाब नहीं लिखा था — बस इतना लिखा था कि 'टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता मत लाओ।'"
गली में हल्की हँसी फूटी।
"क्या बात है," बंसी बाबा ने चबूतरी के दूसरे सिरे से कहा, "आजकल भी किसी को यही लिखना चाहिए।"
दादी मुस्कुराईं और आगे बढ़ीं।
"वहाँ गरीबों की साइकिल मुफ़्त ठीक होती थी," उन्होंने कहा, "बिल्कुल मुफ़्त। कोई पैसा नहीं। कोई उधार नहीं। और अगर कोई ज़बरदस्ती पैसा रख जाता, तो शिवनारायण उसे दौड़ाकर लौटा देते थे — चाहे वो आदमी कितना ही बड़ा हो। मज़दूरी में वो एक ही चीज़ लेते थे, बेटा। भरोसा। कहते थे — जब तुम्हारी साइकिल फिर टूटे, तो यही दुकान याद करना। बस इतना। यही मज़दूरी है।"
टिंकू ने अपना कार्डबोर्ड माइक गिरा दिया और ज़ोर से बोला, "तो दादी, उनकी दुकान का खाता भी मेरी कॉपी जैसा अधूरा रहा होगा! मेरी कॉपी में भी हिसाब आधा है, बाक़ी जगह टिफ़िन के दाग़ हैं!"
पूरी गली हँस पड़ी।
सच कहूँ तो उस हँसी की ज़रूरत उस वक़्त सबको थी। अस्पताल की सीढ़ी, सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, उसकी बातें — सब कुछ उस हँसी में थोड़ा देर के लिए हल्का हो गया।
शबनम आपा ने टिंकू के सिर पर हल्का हाथ रखा और कहा, "अबे, तू हिसाब की बात मत कर। तेरी कॉपी में टिफ़िन का दाग़ है, इसका मतलब है तू खाता रहा। यही तो असली हिसाब है।"
दादी ने हँसी के बाद साँस ली और फिर उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"अब सुनो," उन्होंने कहा। "घंटी उन्होंने बाज़ार से नहीं खरीदी थी। घंटी उन्होंने खुद बनाई थी। शिवनारायण ने और इलाही ने — दोनों ने मिलकर। एक ही ढलाई में। एक ही पीतल में। एक ही आग में। और जब वो बनी, तो उन्होंने उसे देखा और फिर दोनों ने एक साथ कहा — ये एक नहीं, दो है।"
कौशल्या दादी ने रुककर सबको देखा।
"मतलब?" मैंने पूछा।
"मतलब ये, बेटा, कि उन्होंने घंटी बनाते वक़्त उसका हिस्सा बाँट दिया था। एक हिस्सा मेहनत का, और दूसरा भरोसे का। बजती वो तभी थी जब दोनों हिस्से कोई साथ बजाता। एक अकेले बजाता, तो सिर्फ़ आवाज़ आती — तंत्र नहीं जागता। दोनों साथ बजाते, तो घंटी बोलती।"
मेरी जेब में घंटी काँपी।
मैंने उसे निकाला और देखा। वो गरम थी और उस पर वो पुराना फूल अब उभरा हुआ दिख रहा था।
"तो ये अधूरी है?" मैंने पूछा। "मेरी घंटी अधूरी है?"
दादी ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में कुछ था जो मैं अब तक नहीं समझ पाया था।
"हाँ," उन्होंने कहा, "अधूरी है। पचास साल से अधूरी है। और इसीलिए वो कभी पूरी तरह बोलती नहीं, कभी रुक जाती है, कभी सिर्फ़ तीन शब्द बोलकर चुप हो जाती है। क्योंकि अधूरी चीज़ें पूरी आवाज़ नहीं देतीं, बेटा। वो बस इशारा करती हैं।"
मैं चुप हो गया।
तुम सोच रहे होगे कि मुझे उस वक़्त रोना आया होगा। नहीं आया। मुझे गुस्सा आया। अपने पर, अपने पापा पर, और उस पूरे खानदान पर जिसने अपनी चीज़ें अधूरी छोड़ दीं और हमें विरासत में अधूरापन दिया।
तभी पापा ने कुछ कहा।
बहुत धीमे। सिर झुकाए।
"मैंने भी वही किया," उन्होंने कहा।
गली चुप हो गई।
"दादी की बात सुनकर मैं समझ गया," पापा ने कहा, "कि मेरे पिता ने जो किया, वही मैंने किया। उन्होंने बिना पूछे भरोसा तोड़ दिया, और मैंने बिना पढ़े अंगूठा लगा दिया। दोनों जगह वजह एक ही थी — डर। और दोनों जगह कीमत एक ही चुकाई गई — चुप्पी।"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा, उसे हाथ में घुमाया, और फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं तुझे ये नहीं कहूँगा कि मुझे माफ़ कर दे। क्योंकि माफ़ी माँगने से पहले इंसान को सीधा खड़ा होना पड़ता है, और मैं अभी ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा। पर इतना कहूँगा — मैं वो अधूरापन आगे नहीं बढ़ाऊँगा। तेरे हाथ में जो घंटी है, वो अधूरी है, और उसे पूरा करने का हक़ तेरे पास है। मेरे पास नहीं, तेरे पास।"
मेरे हाथ में घंटी ठंडी हो गई।
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