The Mysterious Bell – Chapter 781
मैंने वो काग़ज़ पढ़ा और मेरे मुँह से एक छोटी सी हँसी निकली। अब इस समय हँसी अजीब लगती है, पर मैं झूठ नहीं बोलूँगा — आ गई थी।
"अरे," मैंने कहा, और काग़ज़ ऊपर उठा दिया, "ये धमकी है या वादा? अस्पताल की सीढ़ी तो मैं खुद आज रात बंद होने से रोकने वाला था।"
गली में हल्की हँसी उठी। पर वो हँसी ज़्यादा देर नहीं टिकी। क्योंकि छत की तरफ़ देखने पर कोई नहीं मिला — सिर्फ़ पीपल की डालियाँ थीं, और उनके पीछे आसमान, जो अब और गहरा नीला हो रहा था।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखें कह रही थीं कि मैं काग़ज़ जेब में रख लूँ।
मैंने रख लिया।
"अब बोलो," कौशल्या दादी ने शांति देवी से कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो कोमलता नहीं थी जो पहले थी। अब वो सिर्फ़ एक औरत की आवाज़ थी जो पचास साल से सुन रही थी और आज खुद बोलना चाहती थी। "कौन था वो? उस रात तूने किसे देखा था?"
शांति देवी ने आँखें खोलीं।
और उन्होंने कहा, बहुत साफ़, बहुत धीरे, पर ऐसे कि गली की हर ईंट सुन ले।
"उस आदमी का चेहरा मुझे नहीं दिखा। पर उसकी परछाईं दिखी थी — उस रात, पीछे की दीवार पर, लालटेन की रोशनी में। एक लंबी परछाईं। और उस परछाईं की एक उँगली पर, मुझे आज भी याद है, एक अंगूठी थी। काली।"
गली में मौत जैसी चुप्पी छा गई।
मेरे पीछे कहीं पापा ने साँस ली — लंबी, काँपती हुई। मैंने पलटकर देखा। पापा का चेहरा सफ़ेद था और उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे कुछ कहना चाहते हों और आवाज़ न निकल रही हो।
"काली अंगूठी," मैंने धीरे से दोहराया। "वो अंगूठी जो मीरा की तस्वीर में थी। वो अंगूठी जो रज़ा सलीम के हाथ में है। वो अंगूठी जो…"
मैं रुक गया।
क्योंकि उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि मेरे सामने सिर्फ़ एक नाम नहीं खुल रहा था। पचास साल का एक पूरा धागा खुल रहा था — और वो धागा कहीं और जुड़ रहा था, किसी ऐसी चीज़ से जिसे मैंने अब तक बस एक काग़ज़ समझा था।
शांति देवी ने कहा, "उस सफ़ेद कुर्ते वाले की परछाईं आज भी अस्पताल की सीढ़ी पर खड़ी है। मैं उसे देखती हूँ। हर शाम। सात बजे के आसपास। मैं जब भी अस्पताल के गेट से गुज़रती हूँ, वो परछाईं वहीं खड़ी मिलती है — जैसे वो किसी चीज़ का इंतज़ार कर रही हो। जैसे वो जानती हो कि एक दिन कोई उसे पहचान लेगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और आज," उन्होंने कहा, "वो परछाईं पहचान ली गई।"
मेरे हाथ की घंटी, जो अब तक ठंडी थी, अचानक गरम हो गई। इतनी गरम कि मुझे लगा जैसे किसी ने उसे अंगारे पर रख दिया हो। मैंने उसे मुट्ठी में दबाया और मेरी मुट्ठी जलने लगी।
और घंटी ने कहा — छोटा सा, दो शब्द, बस इतना कि मैं सुन सकूँ।
"अब पूछ।"
मैंने शांति देवी की तरफ़ देखा। सीधा। बिना झिझक।
"बड़ी बी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में अब वो मज़ाक नहीं थी जो रोज़ होती है, "आपने कहा था कि ताले का नाम भी बोलना है। मैं आज सबके सामने वो नाम सुनना चाहता हूँ। पर पहले एक बात — जब आपने उस रात ताला उठाया था, तो आपने उसमें से क्या निकाला था?"
शांति देवी ने अपनी कमर पर हाथ रखा, जहाँ वो पुराना ताला बँधा था। उन्होंने उसे छुआ, नहीं खोला।
"मैंने उसमें से एक काग़ज़ निकाला था," उन्होंने कहा, "जिस पर सात नाम और सात अंगूठे थे। और उस काग़ज़ के आख़िरी पन्ने पर एक शर्त लिखी थी जो किसी ने पूरी नहीं की थी। मैंने वो काग़ज़ उठाया, अपने आँचल में छिपाया, और घर ले आई। पर उस रात मुझे यह नहीं पता था कि उस काग़ज़ का एक हिस्सा तो उस सफ़ेद कुर्ते वाले ने पहले ही निकाल लिया था।"
वो रुकीं।
"मैंने बाईस साल उस काग़ज़ को संभाला," उन्होंने कहा। "कभी पढ़ा नहीं, कभी फाड़ा नहीं, कभी किसी को दिया नहीं। बस रखा रहा — जैसे कोई औरत अपने सीने पर पत्थर रखकर सोए। और आज, इस गली के सामने, मैं वो पत्थर उतार रही हूँ।"
कौशल्या दादी ने आगे कदम बढ़ाया।
"तो उतार," उन्होंने कहा। "उतार दे। क्योंकि अब इस गली में कोई ऐसा नहीं बचा जो डर से चुप बैठा हो। देख — ये बच्चे, ये औरतें, ये बूढ़े। ये सब आज यहाँ इसलिए खड़े हैं कि कोई एक औरत अपना नाम बोलेगी। और अगर तू आज भी चुप रही, तो ये सब यहाँ से यह सोचकर जाएँगे कि सच बोलने का कोई फ़ायदा नहीं।"
शांति देवी ने गली की तरफ़ देखा।
मैंने भी देखा। और मुझे लगा कि उस वक़्त गली में जो खड़ा था, वो सिर्फ़ लोग नहीं थे। वो एक तरह का सवाल था — सबके चेहरों पर एक ही सवाल, अलग-अलग तरह से लिखा हुआ। और उस सवाल का जवाब सिर्फ़ शांति देवी के पास था।
उन्होंने गहरी साँस ली।
"सात नाम थे," उन्होंने कहा। "उनमें एक नाम था — जगदीश यादव। और एक नाम था — इलाही बक्श। और उन दोनों के बीच, तीसरे नंबर पर, एक नाम ऐसा था जो किसी अंगूठे से नहीं, किसी और लिखाई से लिखा गया था। वो लिखाई मैंने उस रात से पहले भी देखी थी — सफ़ेद कुर्ते वाले की मेज़ पर।"
"तो वो नाम था?" शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो जोश नहीं, बल्कि एक अजीब सी हिम्मत थी।
"वो नाम था," शांति देवी ने कहा, "चंद्रेश सक्सेना का।"
गली में हवा रुक गई।
मैंने अपनी जेब से माँ की हिसाब की कॉपी नहीं निकाली, न ही वो पीला काग़ज़। बस उन्हें वहीं रहने दिया, जैसे उनका वक़्त अभी आया नहीं था।
"पर बात सिर्फ़ नाम की नहीं है," शांति देवी ने कहा। "बात यह है कि उस रात उस काग़ज़ पर जो आख़िरी शर्त लिखी थी, वो यह थी कि अगर ज़मीन बिकेगी, तो उसका पैसा उसी अस्पताल के इलाज में जाएगा जहाँ से यह सब शुरू हुआ था। और उस शर्त को किसी ने पूरा नहीं किया। उलटा, उस शर्त वाले काग़ज़ को ही किसी ने जला दिया — बस मेरे हिस्से वाला बच गया, क्योंकि मैंने उसे उस रात उठा लिया था।"
मैंने कौशल्या दादी की तरफ़ देखा।
उनका चेहरा अब साफ़ था। बिलकुल साफ़। जैसे पचास साल का धुआँ एक झटके में उतर गया हो।
"तो यही वो काग़ज़ है," उन्होंने कहा, "जिसके लिए मैंने तुझे बाईस साल कोसा। और यही वो काग़ज़ है जिसे उस सफ़ेद कुर्ते वाले ने अपनी जेब में डाला था। और तूने वो देखा, और चुप रही।"
"मैं डर गई थी," शांति देवी ने कहा। "और मुझे आज भी उस बात का पछतावा है। पर अब मैं यह नहीं कहूँगी कि मैंने कुछ नहीं किया। मैंने ताला उठाया, काग़ज़ बचाया। मैंने कम से कम इतना किया कि आज यह सच ज़िंदा है। और अगर आज यह सच ज़िंदा है, तो वो इसलिए है कि किसी ने उसे पचास साल छिपाकर रखा।"
कौशल्या दादी ने अपना सिर हिलाया।
"तो अब यह सच ज़िंदा रहेगा," उन्होंने कहा। "पर वो तभी ज़िंदा रहेगा जब हम दोनों उसे साथ बोलेंगी।"
और फिर वो दोनों औरतें — जो पचास साल से एक-दूसरे की आवाज़ नहीं सुनती थीं — पहली बार एक साथ, एक जैसी आवाज़ में, एक ही साँस में बोलीं।
"उस रात," कौशल्या दादी ने कहा।
"उस रात," शांति देवी ने कहा।
"हम दोनों वहाँ मौजूद थीं," उन्होंने साथ कहा, "और हम दोनों ने कुछ देखा।"
गली में किसी ने ताली बजाई। फिर दूसरे ने। फिर पूरी गली ने, और वो ताली किसी जीत की नहीं थी — वो ताली उस चीज़ की थी जो पचास साल बाद पहली बार एक साथ हुई थी।
शबनम आपा ने समोसे की प्लेट ऊपर उठाई और ज़ोर से कहा, "अब ये समोसे किसी को नहीं, इन दो बहुओं को पहले। और अगर कोई आज झूठ बोले, तो उसके हिस्से का समोसा भी इन्हीं को।"
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