The Mysterious Bell – Chapter 780
शबनम आपा सबसे आगे थीं।
उनके हाथ में समोसे की प्लेट थी, भरी हुई, और वो इसे ऊँचा उठाकर गली की तरफ़ बढ़ा रही थीं जैसे कोई इनाम दिखा रहा हो।
"सुनो सब!" उन्होंने आवाज़ की, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो आज सुबह नहीं थी — न डर, न थकान। सिर्फ़ एक अजीब सा जोश। "आज जो पंचायत बैठेगी, उसका खर्चा इतिहास में लिखा जाएगा। और खर्चा मेरा। समोसा गरम है, चाय चूल्हे पर है, और जो भी आज झूठ बोलेगा — उसके हिस्से का समोसा भी मैं खुद खा जाऊँगी।"
गली में हँसी फूटी। छोटी सी हँसी, दबी हुई, जैसे लोग डर के बीच भी यह भूलना नहीं चाहते थे कि हँसना भी किसी चीज़ का जवाब होता है।
मैं लाठी पकड़े आगे बढ़ा। पीछे पापा थे, जो हर कदम पर रुककर साँस ले रहे थे, और माँ थीं, जो पापा की कमर पर हाथ रखे उन्हें सहारा दे रही थीं। काजल मेरे बगल में चल रही थी और उसकी मुट्ठी में दवा के दो पत्ते दबे थे — मैंने देखा, वो उन्हें छिपा नहीं रही थी, बस पकड़े हुए थी, जैसे किसी को हिम्मत चाहिए हो और वो हिम्मत किसी पत्ते में नहीं, पकड़ने में मिलती हो।
कौशल्या दादी मेरे दूसरी तरफ़ थीं। उनकी चाल अब भी सीधी थी, पर मुझे लगा कि उनका पूरा वज़न उस लाठी पर था जो मैं पकड़े था। शांति देवी सबसे पीछे थीं, और वो जितना पीछे थीं, उतना ही मुझे लग रहा था कि आज की सबसे बड़ी आवाज़ उन्हीं की होगी।
पीपल के नीचे पहुँचकर शांति देवी रुकीं।
उन्होंने ओढ़नी सीधी की, बालों को कान के पीछे किया, और फिर चबूतरी की तरफ़ देखा। पूरी गली उन्हें देख रही थी। कोई नहीं बोला। मशीन भी धीमी हो गई थी — नहीं रुकी थी, बस धीमी हो गई थी, जैसे वो भी सुनना चाहती हो।
"मेरा नाम शांति देवी है," उन्होंने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर इतनी साफ़ थी कि गली के आख़िरी कोने तक पहुँची। "मैं शिवनारायण यादव की बड़ी बहू हूँ। और आज मैं अपना नाम नहीं छिपाने आई हूँ। मैं यह बताने आई हूँ कि उस रात आग के बाद जो ताला उठाया गया था — वो मैंने उठाया था।"
गली में एक हल्की सी आवाज़ हुई। किसी ने कुछ कहा, किसी ने साँस रोकी।
"और वो काग़ज़," शांति देवी ने कहा, "जो उस रात गायब हुआ था, वो मैंने अपने घर में रख लिया था। मैंने सोचा था कि अगर वो काग़ज़ किसी के हाथ लगा, तो परिवार की इज़्ज़त डूब जाएगी। घर बचाने के चक्कर में मैंने सच बचाने की बात किसी से नहीं की।"
कौशल्या दादी ने अपना सिर हिलाया। बहुत धीरे। और फिर वो बोलीं, और उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो पचास साल की चुप्पी के बाद ही आती है।
"इज़्ज़त, बहू," उन्होंने कहा, "इज़्ज़त छिपाने से बचती है, न सच दबाने से। तूने उस रात जो किया, वो एक औरत का काम था जो अपने घर को बचाना चाहती थी। मैं उसके लिए तुझे गुनहगार नहीं कहूँगी। पर तूने उसके बाद जो चुप्पी ओढ़ी — उसने एक आदमी का नाम डुबो दिया जो बेगुनाह था।"
शांति देवी ने उनकी तरफ़ देखा।
"तूने भी तो चुप्पी ओढ़ी थी," वो बोलीं। "तूने मेरा नाम काग़ज़ से काटा था, कौशल्या। उस रात तूने मुझसे कहा था कि इस घर में तेरा कोई नाम नहीं रहेगा। अब बता — उस दिन तू किस इज़्ज़त की बात कर रही थी?"
दोनों औरतें आमने-सामने थीं। पीपल की छाया उन पर पड़ रही थी और उस छाया में उनके चेहरे अजीब तरह से एक जैसे लग रहे थे — जैसे दोनों एक ही आदमी की दो तस्वीरें हों, किसी पुराने फ्रेम की दो टूटी हुई शीशियाँ।
"तू मुझसे यह मत पूछ कि मैंने क्या किया," कौशल्या दादी ने कहा। उनकी लाठी मेरे हाथ में थी और उसका लोहे का सिरा एक बार ज़ोर से खटका। "तू यह बता कि तूने क्या देखा था। क्योंकि मुझे पता है, तेरे अंदर एक बात और दबी है। तुझे पता है कौन था वो। कौन था वो सफ़ेद कुर्ते वाला?"
गली पूरी चुप हो गई।
इस चुप्पी में मैंने अपनी जेब से हाथ निकाला और हरी शीशे की चूड़ी मुट्ठी में दबाकर पकड़ी। मुझे लगा जैसे वो चूड़ी इस वक़्त इस गली में सबसे सच्ची चीज़ है — जो किसी से नहीं लड़ती, बस कहती है कि वो वहीं की है जहाँ से आई है।
तभी सामने से एक हल्की सी आवाज़ आई।
"मैं बोलूँ, या बच्चे पहले बोलेंगे?"
सभी ने गर्दन घुमाई।
टिंकू था, जो कार्डबोर्ड का एक गोल माइक बनाकर हाथ में उठाए खड़ा था — नीचे लकड़ी की डंडी, ऊपर टेप से चिपका काला ढक्कन। उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू एक सीध में बैठे थे, जैसे कोई मंत्रिमंडल हो।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू बोल। पर छोटा बोल।"
टिंकू ने माइक अपने मुँह के सामने किया और फिर उसे नीचे कर दिया, जैसे समझ गया हो कि आज माइक की ज़रूरत नहीं, आज आवाज़ की ज़रूरत है।
"बड़ी बी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो तेरह साल के लड़के में ही होती है, "क्या आज उस असली चोर का नाम भी आएगा? जिसने सबको फँसाया? क्योंकि मेरी माँ कहती है कि असली चोर वो नहीं जो सामान ले जाए। असली चोर वो है जो किसी और के हाथ में सामान रखकर खुद को किनारे कर ले।"
शांति देवी ने उसे देखा। और फिर वो मुस्कुराईं — पहली बार, पूरे अर्थ में। उन्होंने टिंकू के सिर पर हाथ रखा।
"आएगा, बेटा," उन्होंने कहा। "आएगा। पर उससे पहले मुझे एक बात कहनी है जो मैंने आज तक किसी से नहीं कही।"
उन्होंने कौशल्या दादी की तरफ़ देखा।
"उस रात, आग के बाद, मैं घर के पिछले हिस्से में थी," उन्होंने कहा। "मैंने देखा — एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी इलाही बक्श की थैली के पास झुका हुआ था। उसके हाथ में कुछ काग़ज़ थे। वो उन्हें थैली में रख रहा था — नहीं, रख नहीं रहा था। वो थैली में से कुछ निकालकर अपनी जेब में डाल रहा था। और मैं वहाँ खड़ी थी। मैं कुछ नहीं बोली। मैंने सिर्फ़ देखा और मुड़कर चली गई।"
कौशल्या दादी के चेहरे का रंग उड़ गया।
"तूने देखा था," उन्होंने धीरे से कहा, "और तूने कुछ नहीं कहा?"
"मैंने कहा था, कौशल्या," शांति देवी ने कहा। "मैंने कहा था कि मुझे डर लगा। उस आदमी ने मेरी तरफ़ देखा था। और उस दिन के बाद मैंने कभी उसका नाम नहीं लिया। मैंने उसे बस एक बात कहते सुना था — 'अगर किसी ने कुछ देखा है, तो उसे याद रखना चाहिए कि देखने वाला भी अकेला होता है।'"
मेरे हाथ की घंटी ठंडी पड़ गई।
बर्फ़ जैसी। जैसे उसने सब सुन लिया हो और अब अंदर की तरफ़ मुँह फेर लिया हो।
कौशल्या दादी ने गहरी साँस ली और फिर बोलीं, और उनकी आवाज़ अब किसी फ़ैसले जैसी सुनाई दी।
"तो झूठ का पहला बीज वहीं पड़ा था," उन्होंने कहा। "उस रात, उसी जगह, उसी सफ़ेद कुर्ते वाले के हाथ से। और उस बीज से जो उगा, उसने पचास साल में तीन खानदान खा लिए।"
गली में किसी ने धीरे से कहा — "कौन था वो?"
शांति देवी ने आँखें बंद कीं।
और ठीक उसी पल, हमारे ऊपर से कुछ गिरा।
एक छोटा सा पीला काग़ज़। मुड़ा हुआ। जैसे कोई छत पर खड़ा हो और उसने इसे नीचे गिराया हो।
वो काग़ज़ सीधे चबूतरी के किनारे पर गिरा और फिसलकर मेरे पैर के पास आकर रुका। मैंने झुककर उठाया, खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी।
"सात बजे नाम लिया, तो आज रात अस्पताल की सीढ़ी बंद कर दी जाएगी।"
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