The Mysterious Bell – Chapter 77
मैंने घंटी जेब से निकाली। नहीं — घंटी ने ख़ुद ही जेब में हल्की सी आवाज़ की। जैसे किसी ने साँस छोड़ी हो।
और फिर दोनों बुज़ुर्ग एक साथ बैठ गए। नहीं — गिर गए। जैसे पैंतालीस साल की थकान एक साथ आ गई हो। हाफ़िज़ बाबा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। पंडित जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
मध्य में, चबूतरी के ठंडे पत्थर पर, दो झुर्रियों वाले हाथ मिले। पैंतालीस साल बाद।
मेरी जेब में घंटी बजी।
एक बार। छोटी सी। साफ़।
और जैसे ही बजी, पूरा पीपल का पेड़ हिल गया — पत्ते, जो एक मिनट पहले तक स्थिर थे, अब बहुत तेज़ी से हिलने लगे। जैसे कोई देख रहा हो। हवा नहीं थी, पर पत्ते नाच रहे थे।
और मेरे कान में घंटी बोली।
कुल अंक — अड़तालीस।
मैंने साँस रोक ली।
"उतने?" मैंने धीरे से कहा, जैसे अपने आप से।
अड़तालीस — पैंतालीस साल का जोड़। कोई कहानी नहीं — कोई पैसा नहीं — बस दो हाथ जो आपस में मिले।
मैंने घंटी जेब में वापस रखी और चबूतरी से उठ गया।
दोनों बुज़ुर्ग वैसे ही बैठे थे। एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए। कुछ नहीं बोल रहे थे। बस बैठे थे।
मैं चुपचाप वहाँ से हट गया।
पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मैंने शबनम आपा की गुमटी की तरफ़ चलना शुरू किया।
सुबह नौ बजे के आसपास पीपल के नीचे से दो बुज़ुर्गों की सुलह की खबर पूरी गली में फैल गई। मैं शबनम आपा की गुमटी पर पहुँचा तो वो एक कटोरी समोसे मेरी तरफ़ सरका रही थीं।
"तूने कर दिया," उन्होंने कहा। कटोरी को नहीं, मुझे देख रही थीं।
"क्या?"
"वो दोनों।" एक कटोरी चाय भी सामने रख दी। "अभी-अभी हाफ़िज़ बाबा की बहू सब्ज़ी लेने आई थी। बोली, ससुर जी घर आए हँसते हुए — और बोले कि रात को कोई दावत लगेगी। पैंतालीस साल में पहली बार।"
शबनम आपा ने चिमटी उठाई और एक कड़ाही नोची।
"क्या कहा तूने उनसे?"
"कोई बात नहीं कही, आपा। सिर्फ़ उनके बीच बैठ गया।"
"बैठ गया?" उन्होंने हँसी दबा ली। "ये भी कोई उपाय है?"
"आपा, पैंतालीस साल से आप दोनों के बीच कोई नहीं बैठा था। जगह खाली पड़ी थी। मैं बैठ गया। बस।"
वो कुछ देर मुझे देखती रहीं। चाय में से एक घूँट लिया।
"तेरी माँ ठीक है?"
"ठीक हैं, आपा। दवा बदली है, जाँचें होंगी।"
वो चुप रहीं। फिर बोलीं, "और तू?"
"मैं?"
"तू ठीक है?"
मैंने चाय पीना शुरू किया। शबनम आपा से ज़्यादा कोई नहीं पूछता था — तू ठीक है? सबको लगता था कि अंकुश ठीक ही है। उसकी दुकान चल रही है, हँसता है, मज़ाक करता है, बस।
"ठीक हूँ, आपा।"
"झूठ," उन्होंने कहा और पलट गईं, चूल्हे की तरफ़।
तभी छत से आवाज़ आई।
"उस्ताद!"
मैंने ऊपर देखा। सानिया गुमटी की टीन की छत पर चढ़ी थी, उसके बाल उलझे हुए थे, चेहरे पर कोयले की कालिख। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू भी आ गए। चिंटू की नाक बह रही थी। रफ़ीक़ के घुटने पर पट्टी साफ़ दिख रही थी — सोमवार की, आज बुधवार था।
"क्या कर रहे हो छत पर?" मैंने कहा।
"कुछ नहीं," गुड्डू ने कहा, बहुत ज़ोर से झूठ बोलकर। "ऊपर से सब दिखता है। झंडा लगाने जैसा मज़ा आता है।"
"उतरो।"
वो चारों उतरे। नीचे उतरते वक़्त सानिया ने मेरे कान के पास झुककर कहा, "उस्ताद, हमने कुछ देखा है।"
"क्या देखा?"
"पंडित जी के घर के पीछे वाली कोठरी की खिड़की से हमने देखा — एक पुराना मूँड़ा, कपड़े में लपेटा हुआ। और उसके ऊपर एक चीज़ रखी है — लाल रंग का कुछ।"
मेरे हाथ से चाय का गिलास हल्का काँपा।
"तुम्हें कब दिखा?"
"कल रात," रफ़ीक़ ने कहा, अपने घुटने को सहलाते हुए। "हम तब आए जब उस्ताद ने हमें चाय के पैसे दिए थे। पंडित जी की गली में ज़्यादा रोशनी नहीं थी, बस एक टिमटिमाता बल्ब। पर खिड़की का शीशा खुला था। हमने देखा।"
"और वो लाल क्या था?"
"अख़बार," चिंटू ने कहा, नाक खींचते हुए। "उस्ताद, अख़बार पर कुछ लिखा था। पेंसिल से। हमने पढ़ा नहीं।"
"क्यों नहीं पढ़ा?"
"क्योंकि अख़बार पुराना था, उस्ताद। देखा — पीला।"
मैं एक पल के लिए चुप बैठा रहा।
फिर मैंने पूछा, "तो उस अख़बार को तुमने वापस ऐसे ही रखा?"
सानिया ने हाथ जेब में डाला और एक चीज़ निकाली। एक छोटी सी माचिस की डिब्बी। उसके ऊपर कुछ लिखा था — पेंसिल से। असली अख़बार नहीं लाई थी वो। उसने माचिस के डिब्बे पर जो लिखा था, वो लिख लिया था।
"ये क्या है?" मैंने माचिस की डिब्बी पलटकर देखी।
"वही जो उसकी लाठी पर लिखा था," सानिया ने कहा। उसकी आवाज़ में अचानक उम्र से ज़्यादा समझदारी थी। "उसके नाम का पहला अक्षर — अ। और नीचे एक तारीख़। पैंतालीस साल पहले की।"
मैंने माचिस की डिब्बी को जेब में रखा।
"ये तुमने कब निकाला?"
"जब उस्ताद चबूतरी पर थे।"
"तुम उसके घर के पीछे क्या कर रहे थे?"
"सब देखते हैं," सानिया ने कहा, बहुत सीधी आवाज़ में। "पूरी गली हम देखते हैं। कोई हमें नहीं देखता, पर हम सब देखते हैं।"
शबनम आपा ने चिमटी एक तरफ़ रखी और मेरी तरफ़ देखा।
"ये बच्चे कल से कुछ और बड़े हो गए हैं, अंकुश। इन्हें काम पर रख ले।"
"मैंने सोचा था," मैंने कहा, कप को मुँह से लगाकर।
"तो सोचना छोड़ और कर," उन्होंने कहा, कटोरी की तरफ़ इशारा करके। "कुछ चाहिए इनको?"
"चार कटोरी चाय," मैंने कहा। "और समोसे — पूरे, आधे नहीं।"
शबनम आपा मुस्कुराईं। पहली बार आज सुबह। फिर चूल्हे की तरफ़ पलट गईं।
मैंने चारों बच्चों को पास बैठाया।
"अब बताओ — और क्या देखा तुमने?"
"पंडित जी के घर के पीछे, उस्ताद," गुड्डू ने कहा। "उस कोठरी के नीचे एक चूहादानी है। पुरानी। उस पर एक रस्सी है। जब मैं कल रात खिड़की से झाँक रहा था, तो पंडित जी आए और उस रस्सी को छुआ। और फिर रोए।"
"तुमने देखा कि वो रोए?"
"उस्ताद, हमें सब पता है," सानिया ने कहा। "वो रोज़ रोते हैं। चार बजे के बाद। जब हाफ़िज़ बाबा चबूतरी पर आते हैं। हमने बहुत बार देखा है। पंडित जी अपने घर की खिड़की से उन्हें देखते हैं और रोते हैं।"
मैंने माचिस की डिब्बी को जेब में दबाया।
इतनी देर में बाज़ार की गली में चहल-पहल बढ़ गई थी। सब्ज़ी वाली आ गई थी, ट्रक वाला, दूध वाला। मैंने चारों बच्चों को चाय दी।
"अब सुनो," मैंने कहा। "तुम चारों अब से मेरी टीम हो। कुछ भी होगा गली में — तुम्हें सबसे पहले पता चलेगा। मुझे बताओगे। पर एक शर्त है।"
"क्या?" चारों ने एक साथ पूछा।
"कोई भी बात बढ़ा-चढ़ाकर नहीं। जो देखा है वही बताओगे। कोई कहानी नहीं बनाओगे।"
"पक्का," गुड्डू ने कहा, और रफ़ीक़ ने "मेरी कसम" कहकर हाथ ऊपर उठाया, और चिंटू ने कहा, "मैं एक बात कहूँ, उस्ताद?"
"कहो।"
"कभी-कभी कहानी सच से बेहतर होती है।"
मैं हँस पड़ा।
शबनम आपा ने समोसे लाकर रखे। "ये सब मेरी तरफ़ से," उन्होंने कहा। "और इस चीज़ के लिए — जो तूने चबूतरी पर किया — तू आज से मेरी गुमटी पर चाय का पैसा मत देना।"
"आपा —"
"मुझे मत सुन। मैं तेरी माँ के टिफ़िन से पैसे भी नहीं लेती। फिर तू कौन है?"
वो हँसी। एक छोटी सी हँसी। पर पैंतालीस साल वाली नहीं थी। नई थी।
तभी बाहर गली में एक आवाज़ आई।
सिलाई मशीन की आवाज़ आनी रुकी।
टिक-टिक-टिक…
रुकी।
जैसे किसी ने सुई को बीच में छोड़ दिया हो।
मैंने गुमटी से बाहर झाँका।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के बाहर खड़े थे।
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