The Mysterious Bell – Chapter 76
"बेटा," उन्होंने कहा, "ये बात तेरे समझने की नहीं।"
"तो किसके समझने की है?"
"पुरानी बात है।" हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "जा, अपना काम कर। हमें बूढ़ों को उनकी बात पर छोड़ दे।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा।
फिर मैंने वो किया जो मैंने पिछले तीन दिन में सीफिर मैंने वो किया जो मैंने पिछले तीन दिन में सीखा था — मैंने उनसे बहस नहीं की। मैं चुपचाप चबूतरी के बीच वाली उस खाली जगह पर, ठंडे पत्थर पर बैठ गया।
दोनों बुज़ुर्ग एक साथ हिले, जैसे किसी की ज़मीन पर किसी ने क़दम रख दिया हो।
"अरे — तू कहाँ बैठ गया?" हाफ़िज़ बाबा ने कहा। उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ और था — घबराहट।
"यहीं, बाबा। आप दोनों के बीच।"
"उठ यहाँ से," पंडित ब्रजकिशोर ने लाठी टिकाई। "ये जगह खाली है।"
"पैंतालीस साल से खाली है, पंडित जी।" मैंने कहा। "पर खाली रहने की जगह नहीं है ये। ये जगह भरी हुई है। दो लोग रोज़ आते हैं, इसके दोनों तरफ़ बैठते हैं, और दोनों इसके अंदर कुछ डालकर जाते हैं। क्या डालते हैं, पता है आपको?"
दोनों चुप रहे।
"ज़रा सोचिए," मैंने कहा। "पैंतालीस साल। रोज़। एक-दूसरे की तरफ़ मुँह नहीं करते। न सलाम, न नमस्ते। न आँख मिलाते। पर आते हैं। रोज़। बारिश में भी। धूप में भी। बुखार में भी। ये आदत नहीं है, बाबा। ये ज़िद है।"
पंडित जी ने लाठी को दोनों हाथों से पकड़ा। उनकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।
"तू क्या कहना चाहता है?" उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की चरचराहट।
"मैं कुछ नहीं कहना चाहता, पंडित जी। सिर्फ़ एक बात पूछनी है।" मैंने हाफ़िज़ बाबा की तरफ़ देखा, फिर पंडित जी की तरफ़। "आपको याद है, झगड़ा किस बात पर हुआ था?"
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह की माला उँगलियों में लपेटी।
"हुआ था," उन्होंने कहा। "पता है हुआ था।"
"किस बात पर?"
वो कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले, "उसके बेटे ने कुछ कहा था।"
"झूठ बोल रहे हो," पंडित जी ने कहा। "तेरी बेटी ने कुछ कहा था।"
"मेरी बेटी ने क्या कहा था?"
"वही तो — मुझे भी याद नहीं।"
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। पहली बार। पैंतालीस साल में पहली बार, एक-दूसरे की आँखों में सीधे।
और उस पल मुझे याद आया कि हाफ़िज़ बाबा को पिछली ईद पर बंसी बाबा और रहमत बाबा के साथ बैठकर चाय पीते देखा था। वो चबूतरी के उस पार बैठे थे, सफ़ेद कुर्ते में, और उनकी आँखें धुँधली थीं। रहमत बाबा गुज़रे थे तीन साल पहले। उनके साथ पैंतालीस साल की चुप्पी छोड़कर हाफ़िज़ बाबा अकेले रह गए थे।
"बाबा," मैंने धीरे से कहा। "आप दोनों को याद भी नहीं है, किस बात पर झगड़े थे। पर आप दोनों ये जगह नहीं छोड़ सके। कोई ये मानेगा कि ये दुश्मनी है? नहीं। ये आदत है। आपको आदत पड़ गई है एक-दूसरे की तरफ़ मुँह न करने की। और अब आपको डर है कि अगर आदत छूट गई, तो पता नहीं क्या होगा।"
मैंने रुककर साँस ली।
"आपको पता है पैंतालीस साल में किसने ये झगड़ा सबसे ज़्यादा सहा है? आपने। आप दोनों ने। बेटे-बेटियाँ चले गए अपनी ज़िंदगी में। बीवियाँ गुज़र गईं। बस आप दो बचे। और आपने पैंतालीस साल बर्बाद कर दिए। पर एक बात जान लो — आपने बर्बाद नहीं किए। आपने रोज़ चुना है बर्बाद करने का। हर सुबह। क्योंकि हर सुबह कोई आदमी ये चुन सकता है कि वो जाए और कहे, 'अरे, वो बात भूल जा।' पर आपने वो नहीं चुना। आपने ये चुना।"
पंडित जी की लाठी हिली। एक बार।
फिर मैंने वो कहा जो मैंने कल शाम देखा था और छुपा लिया था।
"पंडित जी, कल शाम आप उठे। जब हाफ़िज़ बाबा यहाँ से उठ चुके थे। आपने जेब से रुमाल निकाला — नहीं, वो नहीं। उनका रुमाल ज़मीन पर गिरा था। आपने उसे उठाया। झाड़ा। और उनकी जगह पर — उसी पत्थर पर — रख दिया। और फिर मुँह फेरकर चले गए।"
पंडित ब्रजकिशोर का चेहरा सफ़ेद हो गया।
"तेरे देख लिया," उन्होंने धीरे से कहा, जैसे ये बात अपने आप निकल गई हो।
"हाँ, देख लिया। और आप बता दीजिए, हाफ़िज़ बाबा, कल शाम आपने जो किया, वो भी बता दें?"
हाफ़िज़ निसार अहमद ने आँखें झुका लीं।
"मैं — मैंने कुछ नहीं किया।"
"आपने किया। जब पंडित जी उठकर बाहर जा रहे थे, आपने देखा कि उनके पाँव के नीचे जंगली बेर का एक पत्ता था। काँटेदार। आपने चुपचाप अपना खड़ाऊँ उस पत्ते पर रख दिया, ताकि वो उस पर न चढ़ें। फिर हटा दिया। ये क्या था, बाबा?"
हाफ़िज़ बाबा के हाथ काँपने लगे। तस्बीह की माला ज़मीन पर गिरी और फिसल गई।
मैंने उठाकर उन्हें पकड़ाई।
"पैंतालीस साल की दुश्मनी में कोई अपने दुश्मन के पैर के नीचे से काँटा नहीं हटाता, बाबा। मैंने सुना है आप दोनों ने मिलकर ये चबूतरी बनवाई थी। दादाजी ने बताया था। आधे-आधे पैसे। और फिर किसी बात पर दोनों ने रिश्ता तोड़ लिया। बात भूल गई, पर चबूतरी याद रह गई। क्योंकि चबूतरी तोड़ नहीं सके। तोड़ने का मन नहीं हुआ। तो आप दोनों ने एक काम किया — चबूतरी नहीं तोड़ी, ख़ुद को तोड़ लिया।"
मैंने दोनों की तरफ़ देखा।
"आज मैं आपको एक बात कहता हूँ। आप दोनों को याद नहीं है क्यों झगड़े थे। पर मैं जानता हूँ क्यों नहीं छोड़ पाए — क्योंकि दोनों के अंदर एक ही दर्द बैठा है। दोनों को लगता है कि दूसरे ने कुछ कहा था, कुछ किया था। और दोनों को ये डर है कि अगर पता चला कि दूसरे ने कुछ नहीं किया, तो पैंतालीस साल किस बात के लिए गए? इसीलिए दोनों चुप हैं। दोनों को दुश्मन चाहिए। क्योंकि दुश्मन के बिना, बचे हुए पैंतालीस साल सहने पड़ेंगे।"
चबूतरी पर सन्नाटा ऐसा छा गया कि दूर किसी स्कूटर की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दी। पीपल का एक पत्ता गिरा। सूखा। खड़ा खड़ा। और हवा ही नहीं थी।
फिर हाफ़िज़ बाबा बोले। आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे किसी कुएँ से आ रही हो।
"कल — कल मैंने तेरे लिए एक काम किया था, ब्रजकिशोर।"
पंडित जी ने उनकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"तेरे हाथ की लाठी — जो नीचे से चटक गई थी — मैंने किसी को बता नहीं, पर मैंने उसे रात को उठाकर अपने घर ले जाकर, गोंद से जोड़ दिया और वापस रख दिया। तुझे पता है मैंने क्यों किया? क्योंकि मुझे पता था कि तू उसी लाठी पर टिकता है।"
पंडित ब्रजकिशोर ने अपनी लाठी को देखा। फिर अपने हाथ को। फिर हाफ़िज़ बाबा को।
"मुझे — मुझे लगा कि नीचे से वो मज़बूत हो गई।"
"हाँ," हाफ़िज़ बाबा ने कहा। "हो गई।"
पंडित जी उठे। एक हाथ लाठी पर, दूसरा हवा में। जैसे कुछ पकड़ना चाहते हों। उनका हाथ थम गया।
फिर उन्होंने कहा, "मेरे घर में — घर के पीछे की कोठरी में — तेरे बाप का बनाया हुआ एक मूँड़ा रखा है। पैंतालीस साल से। कपड़े में लपेटा हुआ। मैंने उसे ठीक नहीं किया। नहीं ठीक कर सका।"
हाफ़िज़ बाबा की आँखें भर आईं।
"तूने वो मूँड़ा क्यों रखा?"
"क्योंकि मैं उसे वापस नहीं कर सकता था।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे नहीं पता था कि उसे ठीक कैसे करूँ।" पंडित जी की आवाज़ काँप गई। "मैंने तीस लोगों से पूछा। कोई ठीक नहीं कर सका। तेरे बाप का बनाया था। उसकी बनावट ऐसी थी कि — कोई नहीं जानता था। और मैं तुझसे कह नहीं सकता था, क्योंकि तब तक हम बोलना बंद कर चुके थे। तो वो कोठरी में रह गया। पैंतालीस साल।"
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह एक जेब में रखी और दूसरी जेब से एक पुराना, फटा रुमाल निकाला। माथा पोंछा।
"तो — तो वो रुमाल वाली बात —"
"वो रुमाल भी तेरा ही था," पंडित जी ने कहा। "तेरे बाप का। तेरे बाप ने इस चबूतरी पर मेरे बाप के साथ चाय पी थी, और रुमाल भूल गए थे। मैंने रख लिया था। पैंतालीस साल। रोज़।"
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