The Mysterious Bell78 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 78

7 min read November 5, 2026

उनके हाथ में मोटा चश्मा था — अधूरा पहना हुआ। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में आज सुबह की चाय की बूँद नहीं थी, जैसे उन्होंने चाय छोड़ दी हो।

वो बाहर आए थे। बिल्कुल बाहर। उनकी दुकान से गुमटी की तरफ़। जो पचास साल में उन्होंने नहीं किया था — बिना बिना बुलाए गली में निकलना।

और वो गुमटी से पांच का पत्थर दूर रुक गए। जैसे किसी अदृश्य सीमा पर।

उनका चेहरा — मैंने उन्हें कभी ऐसा नहीं देखा था।

उनकी आँखें मेरी तरफ़ नहीं थीं। मेरी जेब की तरफ़ थीं।

"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी, पर गली के हर कोने तक पहुँची।

मैं उठा। कटोरी में चाय छोड़कर। गुमटी से बाहर निकला।

"उस्ताद?"

"तूने घंटी बजाई?"

"मैंने?" मैंने कहा। "नहीं, उस्ताद। मैंने तो —"

"घंटी बजी," उन्होंने कहा। "मैंने सुनी। अभी। वहीं। उसी तरह।"

उनका हाथ काँप रहा था। गली में कुछ लोग रुके। शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं।

उस्ताद ने मेरी कलाई पकड़ी और मुझे गुमटी के पीछे खींच ले गए, जहाँ गली से नज़र नहीं आता। जहाँ सिर्फ़ पुरानी दीवार थी, और उस पर काई लगी थी।

"क्या हुआ?" मैंने कहा।

"ये घंटी तो नहीं बजी, अंकुश," उन्होंने कहा। "ये घंटी नहीं बजी। ये — ये कुछ और बजा। एक और घंटी। दूर। बहुत दूर।"

"उस्ताद, मैं समझा नहीं।"

"पचास साल पहले," उन्होंने धीमे से कहा, "मेरे पास भी यही घंटी थी। और मेरे भाई इलियास के पास इसकी एक और — बिल्कुल ऐसी। एक जोड़। दो घंटी। एक माने दो सवाल नहीं पूछेगी। एक बजे तो दूसरी काँपती है। आज दूसरी बजी। पचास साल बाद।"

"कहाँ?"

"मुझे नहीं पता।" उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "तूने अभी कुछ किया है?"

मैंने चबूतरी वाली बात बताई। छोटी सी। दो हाथ। अड़तालीस अंक। वो सुनते रहे।

"हाफ़िज़ और ब्रजकिशोर," उन्होंने कहा। "वो दो — पैंतालीस साल से — अच्छा। मतलब — घंटी ने सुना। और घंटी ने सुनाया। और उस पार — जहाँ भी इलियास है — उसकी घंटी ने भी सुना। ये अच्छा नहीं है, अंकुश। ये बहुत अच्छा नहीं है।"

"क्यों?"

"क्योंकि इलियास अब मुझे ढूँढेगा।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "पचास साल बाद। बूढ़ा हो चुका होगा। पर ढूँढेगा। और जब वो ढूँढेगा, तो यहाँ कुछ ऐसा मिलेगा जो उसे खुश नहीं करेगा।"

"क्या?"

"मैं ख़ुद," उन्होंने कहा। "मैं ख़ुद उसके सामने ये नहीं कह सकता कि मैंने क्या किया था। पचास साल पहले।"

"उस्ताद —"

"नहीं।" उन्होंने हाथ उठाया। "आज नहीं। बाद में।" वो पलटे, फिर रुके। "अंकुश, सुन — तूने वो कहा जो मैंने पिछली बार पूछा था?"

"क्या?"

"तेरा घर इतना चुप क्यों है।"

मेरे अंदर कुछ ठंडा गया।

"उस्ताद, घंटी ने कहा है — अभी मत पूछना। जब काजल की सुबह आए।"

"तो काजल की सुबह आई या नहीं?"

मैं कुछ देर चुप रहा।

"आई," मैंने कहा। "वो आज सुबह अस्पताल गई। कहकर गई कि माँ की परची लेकर जाएगी और डॉक्टर से सब कुछ पूछेगी — पूरा सच।"

"तो फिर तू अब क्यों खड़ा है यहाँ? जा। जब तेरा घर खुल रहा है, तू बाहर के घर जोड़ रहा है। जा।"

मैंने सिर हिलाया।

"पर उस्ताद — आप वो बात — काली साइकिल —"

"काली साइकिल वाली बात भी बाद में। पहले अपना घर।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "एक बात याद रखना। जब तेरा घर खुलेगा, तो उसमें जो निकलेगा, वो तेरे हाथ में नहीं होगा। तुझे लगता है तू तैयार है। पर तू तैयार नहीं है। जो चीज़ें बहुत देर तक बंद रहती हैं, उनमें से जब खुलती हैं तो बदबू भी आती है, अंकुश। और वो बदबू हर उस चीज़ पर लग जाती है जो उस घर के अंदर है।"

"आप डरा रहे हैं?"

"हाँ," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो डरता नहीं, वो तैयार नहीं होता।"

वो गली में वापस आए। लोगों ने उन्हें देखा। कोई कुछ बोला नहीं। वो अपनी दुकान में गए। सिलाई मशीन फिर शुरू हुई।

मैं गुमटी के पीछे से बाहर निकला।

तभी गली के मुहाने की तरफ़ से एक आवाज़ आई।

"अंकुश यादव!"

मैंने मुड़कर देखा।

मीरा तिवारी आ रही थी। कैमरा कंधे पर, बैग कंधे पर, और चेहरे पर वो भाव जो पिछले दो दिनों से मेरी तरफ़ नहीं बदला था — घृणा, शक, और कोई बहुत गहरा गुस्सा जो उसका अपना था, पर मेरे ऊपर निकल रहा था।

"मीरा —"

"चुप," उसने कहा। "आज मैं बोलूँगी। तू सुन।"

वो मेरे सामने आकर रुकी। कुछ लोग रुके। कुछ दुकानों से सिर निकले। फ़िरोज़ा बेगम ने खिड़की से झाँका।

"तुमने कल शाम मुझे बोला था — दस अंक — टूटने से पहले की आवाज़ — कुछ बकवास — मैंने सुना। आज सुबह फिर दो बुज़ुर्गों का तमाशा। जो तुमने किया। तुमने उन्हें एक-दूसरे से जोड़ दिया — बहुत अच्छा। पर तुमने किसी को कुछ बताया? नहीं। तुमने मुझे बताया? नहीं। तुम आस-पास घूमते हो, बच्चों को इकट्ठा करते हो, बुज़ुर्गों को बैठाते हो, और फिर जब कोई रोता है तो तुम वहाँ खड़े होते हो, गवाह की तरह। और कल को तुम कहोगे — देखो, मैंने ये किया।"

"मीरा, मैंने किसी को —"

"मैंने तुम्हारी जाँच की," उसने कहा। उसने बैग से एक काग़ज़ निकाला। "तुम्हारी दुकान — दुकान नंबर सात — ये दुकान पिछले पंद्रह साल से उसी ट्रस्ट के नाम पर है जिसका मालिक रणवीर भारद्वाज की कंपनी के साथ जुड़ा है। तुम्हें पता था?"

मेरा पेट गिरा।

"क्या?"

"तुम्हारे पापा ने झूठ बोला था — ये दुकान उनकी है? नहीं है। ये दुकान किराए पर है, ट्रस्ट से, और वो ट्रस्ट भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का है। तुम्हारे पापा को किराया माफ़ है — क्यों, पता है? क्योंकि तुम्हारे पापा ने किसी काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। वही जो मैंने तुम्हें दिया था। वही लाल निशान। वो इस दुकान और इस घर के बदले में था।"

मैं एक पल के लिए कुछ नहीं बोल सका।

"तो तुम किसका घर बचा रहे हो, अंकुश? यही दुकान? यही दुकान तो पहले से बिकी हुई है। तुम हवा में लटके हो। तुम्हारा पापा हवा में लटके हैं, तुम्हारी माँ, तुम्हारी बहन। और तुम्हें लगता है तुम बुज़ुर्गों का झगड़ा सुलझाकर किसी को बचा रहे हो?"

मैंने काग़ज़ की तरफ़ देखा।

"मैं इस पर विश्वास नहीं करता," मैंने कहा।

"तो जा अपने पापा से पूछ।" उसने काग़ज़ वापस बैग में डाला। "जब पूछ ले, तब मिलना। और तब तक —" उसने कैमरा उठाया। "सब कुछ जो तुम्हारे इर्द-गिर्द हो रहा है, मैं रिकॉर्ड करूँगी। क्योंकि जिस घर में ये सब हो, उसका सच बाहर आना चाहिए। चाहे तुम्हें पसंद आए या न आए।"

"मीरा —"

वो पलट चुकी थी।

फिर मुड़ी और एक और बात कही।

"और अंकुश, एक बात कहूँ? मुझे पता है तुम जो कर रहे हो, वो सही है। पर सही काम भी बुरे हाथों में बुरा होता है। तुम्हें अगर सच को सच की तरह जीना है, तो पहले अपना हिसाब साफ़ कर।"

वो चली गई।

गली में लोग मुझे देख रहे थे। शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं और मेरे पास खड़ी हो गईं, हाथ में चिमटी। मीरा की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।

"ये लड़की क्यों ऐसी है?" उन्होंने कहा।

"पता नहीं, आपा।"

"और उसका कहा कुछ सच है?"

मैंने मीरा के जाते हुए पीठ को देखा।

"मुझे नहीं पता, आपा।"

तभी मेरे कान के पास घंटी बजी।

छोटी सी। सिर्फ़ इतनी कि मैं सुन सकूँ।

और घंटी ने कहा —

पूछ। अब पूछ। काजल की सुबह आ गई।

मैंने घंटी जेब से निकाली। हथेली पर रखी। गर्म थी। ज़्यादा गर्म।

"क्या पूछूँ?"

तूने उस्ताद से वादा किया था, घंटी ने कहा। पूछ — तेरा घर इतना चुप क्यों है।

मेरे हाथ से चाय का गिलास शबनम आपा ने पकड़ लिया।

"अंकुश?"

"आपा," मैंने धीरे से कहा, "मुझे घर जाना है।"

वो कुछ कहती, उससे पहले मैं चल पड़ा।

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