The Mysterious Bell – Chapter 767
याकूब चाचा ने रोटी का टुकड़ा नीचे रख दिया। उनका जबड़ा कस गया, जैसे वो कुछ ऐसा कहना चाहते हैं जो पचास साल से उनके अंदर बैठा है, पर आवाज़ रास्ता भूल गई है।
"मैंने," वो बोले, "पचास साल तुम्हारे बाप से यही माँगा था कि एक बार पूछ लो। एक बार।"
"मैं पूछ रहा हूँ," पापा ने कहा। "देर से पूछ रहा हूँ, पर पूछ रहा हूँ।"
याकूब चाचा ने उनका हाथ पकड़ा — और ये कोई हाथ मिलाना नहीं था। ये हाथ पकड़ना था। जैसे कोई गिरती हुई चीज़ को थाम लेता है, ये जानते हुए भी कि सारी ताक़त उसी के बाजू में नहीं है।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा और आँखों से कहा — अब ज़्यादा मत बोलो। फिर वो रसोई में लौट गईं और पीछे से बोलीं, वो अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची करके बोलीं, ताकि सिर्फ़ हम सुनें, बाहर वाले न सुनें:
"आज इस घर में सच का दरवाज़ा खुला है। मैंने खुद उसे खोला है, मेरे होते हुए कोई देर तक बंद नहीं रहेगा।"
फिर वो रुकीं। कड़ाही में कुछ गिरा।
"पर सुन लो सब," वो बोलीं, "उस औरत का नाम बोलने से पहले सबूत चाहिए। सबूत! क्योंकि अगर आज नाम बोल दिया और कल सुबह दस बजे की सभा में वो खड़े होकर मुस्कुराकर कह देगी कि सब झूठ है — तो गली दो हिस्सों में बँट जाएगी। और बँटी हुई गली में बाप-बेटे बोलना बंद कर देते हैं। मैंने बाईस साल एक बँटा हुआ घर झेला है। दूसरा नहीं झेलूँगी।"
उनकी आवाज़ में आग थी। माँ की रसोई में आग हमेशा चूल्हे में जलती है — आज बातों में भी जल रही थी।
मैंने पीछे देखा। काजल दरवाज़े के सहारे खड़ी थी। हाथ में दवा के दो पत्ते — दोनों दबे हुए, दोनों खाली। वो उन्हें पलट रही थी, फिर से पलट रही थी, जैसे गिनती करके भी भरोसा नहीं हो रहा हो।
"दो," उसने धीरे से कहा, "एक में दो गोली। कुल चार। डॉक्टर ने कहा था दिन में दो बार। मतलब दो दिन। बस दो दिन।"
"काजल।"
"और नई खेप रुकी है," उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा, बस पत्तों को देखती रही, "क्योंकि काग़ज़ साफ़ नहीं। काग़ज़ साफ़ होने के लिए ज़मीन का काग़ज़ नहीं देना पड़ेगा, वरना अस्पताल का नाम ही नहीं रहेगा। मॉडल की तरह साफ़ समझ आ रहा है, भैया। दोनों तरफ़ हार है।"
मैं उसके पास गया और उसके हाथ से पत्ते लिए।
"हार नहीं है," मैंने कहा।
"तो क्या है?"
"एक रास्ता है जो अभी हमने खोजा नहीं है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर जिस वक़्त उसने अस्पताल में काम देखा है, वो नर्स वाली आँखें थीं — जो थकती नहीं, बस चुप हो जाती हैं।
"आज सुबह सात बजे मशीन आएगी," वो बोली। "पीछे वाले प्लॉट पर। नींव खोदने के लिए।"
"और मशीन ज़मीन पर उतरेगी," मैंने कहा, "पर उस ज़मीन का मालिक कोई और निकलेगा। मैं वादा करता हूँ — सात बजे से पहले, रणवीर का उस ज़मीन पर जाने का रास्ता बंद हो जाएगा।"
"कैसे?"
"जब वक़्त आएगा, बताऊँगा," मैंने कहा। "क्योंकि अगर मैं अभी बताऊँगा, तो तुम चार दिन की दवा के डर में बैठकर उसे सबसे बड़ा राज़ समझ लोगी — और वो सबसे छोटा काग़ज़ है।"
काजल ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने मेरे कंधे पर हल्का-सा हाथ रखा और धीरे से कहा —
"अगर तुम झूठ बोल रहे हो, तो मैं तुम्हें माँ के हाथ से पीटवाऊँगी। मैं खुद नहीं पीटूँगी, मेरे हाथ ज़्यादा मुलायम हैं।"
"मंज़ूर," मैंने कहा।
उस कमरे में उस वक़्त कोई डर नहीं था। एक रोटी थी, एक लोटा था, दो आदमी एक-दूसरे का हाथ पकड़े बैठे थे और एक चूल्हा जल रहा था। बाहर मशीन थी। अंदर सच था। और सच जब जलता है, तो पहले बहुत धीमा जलता है, बाद में ताप आता है।
तभी मीरा उठी।
वो दीवार के पास बैठी थी, कैमरा गोद में, और अचानक उसकी नज़र पीछे के कमरे के कोने पर पड़ी — जहाँ चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े से आगे, एक अंधेरा कोना था, और वहाँ एक पुराना लकड़ी का संदूक रखा था, जिस पर रस्सी बँधी थी।
"रुको," मीरा ने कहा। "ये संदूक मैंने देखा है।"
हम सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
"मैं छोटी थी," वो बोली, "तुम्हारी माँ से मिलने आई थी। किसी खबर के लिए। और ये संदूक मैंने यहीं, इसी कोने में देखा था। तुम्हारी माँ ने उसे जल्दी से अपनी साड़ी के पल्लू से ढक दिया था। ऐसे, जैसे कोई बच्चा मिठाई का डिब्बा छिपाता है। और उस वक़्त मैंने सोचा था कि अंदर गुड़ होगा।"
माँ रसोई से बाहर आईं। उनके हाथ में कड़छी थी, और वो कुछ कहने से पहले चुप रहीं, जो उनकी आदत नहीं।
"वो संदूक मेरे ससुराल से आया था," उन्होंने कहा। "मेरे सास-ससुर के घर से। जिस दिन मैं इस घर में आई, उस दिन से वो वहीं रखा है। किसी ने नहीं खोला।"
"क्यों नहीं खोला?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि ताले पर एक नाम खुदा है," माँ ने कहा। "और उस नाम को पढ़कर ससुर जी ने कहा था — इस पर हाथ मत डालना। ये उसका है जो गया है।"
कमरे में सन्नाटा।
"कौन गया है?" मैंने पूछा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"यही तो पता नहीं," उन्होंने कहा। "और आज सुबह लग रहा है कि यही हमारी सबसे बड़ी कमी है।"
हम सब उस कोने की तरफ़ बढ़े। उस्ताद ने लालटेन जलाई क्योंकि कोने में रोशनी नहीं थी। याकूब चाचा उठे और मेरा हाथ पकड़कर खड़े हुए — वो देखना चाहते थे, बैठकर नहीं।
हमने रस्सी खोली। धूल उड़ी और मैंने नाक पोंछी। संदूक पुराना था, पीतल की फूलों वाली पट्टियाँ उखड़ी हुई, ऊपर का ढक्कन टेढ़ा, पीछे से दरार। और सामने ज़ंग लगा बड़ा सा ताला — जिस पर कुछ खुदा था, पर पचास साल की धूल के नीचे सिर्फ़ दो अक्षर बचे थे, बाकी घिस गया था।
"शं…" मीरा ने हाथ में आतिशी शीशा लेकर पढ़ा, "…लाल।"
याकूब चाचा ने एक कदम पीछे किया।
"इसका आधा नाम मिटा है," मीरा ने कहा। "पर जो बचा है, वो शंकरलाल जैसा लगता है।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तुम्हारे पास जो चाबी है।"
मैंने गले की पुरानी चाबी निकाली। पच्चीस साल से वो मेरे गले में थी और मुझे नहीं पता था कि वो किस चीज़ की है। पापा ने मुझे दी थी, पंद्रह-सोलह साल की उम्र में, यह नहीं बताया कि क्या है।
पापा चारपाई पर बैठे थे और उनका चेहरा बदल गया।
"ऊपर वाले ताले में," उन्होंने कहा।
मैंने देखा। मेज़ पर पड़ा ताला धूल के नीचे बैठा था, पर उसकी कुंडी अलग दिख रही थी — जैसे हाल में किसी ने उसे छुआ हो, पोंछा हो।
"रुको," मैंने कहा। "ये ताला पुराना है, पर इसे कोई साफ़ कर चुका है। कुछ दिन पहले।"
उस्ताद झुके। उन्होंने उँगली से कुंडी पर पसीना पोंछा।
"हाँ," वो बोले। "कोई इसे देखता है। पर खोलता नहीं।"
मैंने चाबी डाली।
वो अंदर गई। एक बार नहीं, दो बार नहीं — पूरी गई, और अटकी, और फिर अनायास घूम गई। क्लिक। ताला खुला।
दरवाज़े के बाहर किसी ने दूर से पूछा — मजदूर नहीं, कोई और — और फिर हवा ने उस आवाज़ को मोड़ दिया। गली में मशीन का सुर बदल गया।
हमने ढक्कन उठाया।
अंदर से गंध आई — कपूर, पुराना काग़ज़, और एक और गंध — थोड़ी सी नफ़्तलीन, जैसे कोई दराज़ बहुत साल बंद रहा हो।
अंदर कपड़े थे। मोड़े हुए। दो साड़ियाँ, एक टोपी, कुछ बच्चों के कपड़े, और एक मोटा कपड़े का बंडल।
और उस बंडल के ऊपर, रखा था एक छोटा सा ताला।
लोहे का। मुट्ठी से भी छोटा। रंग काला पड़ा, पर कुंडी चमकदार।
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