The Mysterious Bell766 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 766

7 min read November 5, 2026

"नहीं," उस्ताद ने कहा। "पहले उस औरत से पूछना होगा कि उसके गले में वो अँगूठी कहाँ से आई। क्योंकि अगर अँगूठी उसके पास है, तो ताले की चाबी भी कभी उसके पास रही होगी। और अगर चाबी उसके पास रही होगी…"

वो रुके। उन्होंने अपनी आँखें मलीं।

"तो वो मेरी माँ की आख़िरी बात जानती है।"

मैंने चाबी और टुकड़ा दोनों अपनी जेब में रखे और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

इस बार उस्ताद ने मेरा हाथ नहीं पकड़ा।

बाहर निकलते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा। याकूब चाचा अपनी लाठी के सहारे खड़े थे, और उनके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे — जैसे कोई पुरानी दुआ पढ़ रहे हों, या कोई पुराना हिसाब जोड़ रहे हों।

और उसी वक़्त, गली की तरफ़ से, सानिया की आवाज़ आई।

"अंकुश भैया! वो उठ गई! वो उठकर सीधी तुम्हारी दुकान की तरफ़ आ रही है!"

मैंने घंटी जेब से निकाली। वो हल्की गरम थी, और एक ही शब्द बोली।

"अब।"

॥

मैंने घंटी जेब में रखी और दरवाज़ा खोला। बाहर की धूप आँखों में ऐसे घुसी जैसे किसी ने मुट्ठी भर रेत फेंक दी हो।

गली में मशीन का शोर था। दूर, पीछे के प्लॉट से आता हुआ, धीमा और भारी — जैसे कोई बड़ा जानवर नींद में करवट ले रहा हो। और उसी शोर के नीचे सानिया खड़ी थी, दोनों हाथ घुटनों पर, साँस फूली हुई, पीछे गुड्डू और रफ़ीक़।

"भैया," सानिया ने हाँफते हुए कहा, "वो दुकान तक आ गई। शटर बंद देखा, तो वहीं शबनम आपा की बेंच पर बैठ गई। उठने का नाम नहीं ले रही।"

"कुछ बोली?"

"बोली," रफ़ीक़ ने आगे आकर कहा, "कि मैं किसी के घर नहीं जाऊँगी। मेरा घर मुझसे बोलता नहीं, तो मैं किसके घर जाऊँगी।"

मेरे पीछे उस्ताद बाहर आए, हाथ में अपनी लाठी जैसी सीधी कमर, और उनके पीछे याकूब चाचा — कमज़ोर, काँपते, एक हाथ से दीवार टटोलते हुए। नदीम उनका थैला उठाए खड़ा था, और मीरा कैमरा बंद करके सबसे आख़िर में निकली।

याकूब चाचा ने एक कदम रखा और रुक गए। उनकी साँस बज रही थी।

"ये मशीन," वो बोले, "पचास साल पहले भी ऐसी ही आवाज़ करती थी। उस रात भी। जब बाज़ार जल रहा था।"

उस्ताद ने उनका कंधा पकड़ा।

"अब बैठो," उस्ताद ने कहा। "तुम्हारा हाथ ठंडा है।"

"मैं किसी यादव के घर नहीं बैठूँगा।"

वो इतने धीरे बोले कि मुश्किल से सुना गया। पर सबने सुन लिया।

मैंने अपनी कमीज़ के पीछे हाथ पोंछा और उनके सामने आ गया।

"चाचा," मैंने कहा, "आप हिसाब लेने आए थे ना? तो सुन लो — हिसाब कभी सड़क पर नहीं बनता। हिसाब बैठकर बनता है। और बैठने की जगह अगर आपको पसंद नहीं, तो आप ज़मीन पर बैठ जाओ, मैं चारपाई पर बैठूँगा। बदला भी ले लेना।"

याकूब चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा था, पर थकान उससे बड़ी थी।

"तू जगदीश का पोता है," वो बोले। "जगदीश भी ऐसे ही बोलता था। बात को मज़ाक में लपेटकर रखता था, ताकि सामने वाले को लड़ने का बहाना न मिले।"

"तो फिर चलिए," मैंने कहा। "घर पास है। और मेरी माँ अगर आपको इस हाल में देख लेगी और आपने उसका गुड़ का पानी नहीं पिया, तो आज रात आपको मेरे साथ मशीन के सामने सोना पड़ेगा।"

सानिया हँस पड़ी।

याकूब चाचा कुछ बोलने ही वाले थे कि खाँसी आ गई। वो झुके, और नदीम ने उन्हें थामा। मीरा ने तुरंत कैमरा मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"मैं इसे उनके मुँह पर नहीं रखूँगी," उसने धीरे से कहा। "लेकिन चलूँगी साथ। अगर उन्हें कुछ हो जाए तो गली में मुझे ही कोसा जाएगा या नहीं — ये बाद में देखेंगे।"

हम गली में निकले — मैं एक तरफ़, नदीम दूसरी तरफ़, याकूब चाचा बीच में, उनकी लाठी धूल में टक-टक करती हुई। उस्ताद आगे-आगे चल रहे थे, ऐसे जैसे रास्ता वो साफ़ कर रहे हों।

और जैसे ही हम गुमटी के पास पहुँचे, मैंने उसे देखा।

बेंच पर एक औरत बैठी थी। सफ़ेद बाल, ओढ़नी सर से खिसकी हुई, और एक हाथ की कलाई पर वो हरी चूड़ी — रंग गया, चमक गई, पर वो वहीं थी। उसने हमें देखा। उसकी नज़र मेरे ऊपर से फिसलकर याकूब पर, फिर उस्ताद पर, और फिर वापस मेरे ऊपर आ गई।

वो उठी नहीं।

"मैं तेरे घर नहीं आऊँगी," उसने इतना ही कहा। "मैं यहीं बैठी हूँ। मेरे पास वक़्त है।"

मैंने कुछ कहना चाहा, पर उस्ताद ने मेरा कंधा दबा दिया।

"घर चलो," उन्होंने धीरे से कहा। "औरत जो यहाँ बैठी है, वो अपनी जगह खुद चुन रही है। जबरदस्ती करने से सिर्फ़ नाम निकलेगा, सच नहीं।"

और इसलिए हम चले गए — एक औरत को गुमटी की बेंच पर बैठा छोड़कर, जैसे गली में कोई पुराना पत्थर पड़ा हो।

घर पहुँचकर मैंने चारपाई खींची। माँ रसोई में थीं; चूल्हे की आवाज़ आ रही थी और घर में धनिया और घी की गंध भरी हुई थी।

माँ ने पलटकर देखा। उन्होंने एक पल के लिए भी नहीं पूछा कि ये कौन है, कहाँ से आया, क्यों आया। बस कपड़े से हाथ पोंछे और एक ताँबे का लोटा उठा लिया।

"बैठाओ इन्हें," उन्होंने कहा। "और पहले पानी। बात बाद में।"

याकूब चाचा चारपाई के किनारे बैठे। उन्होंने घर को देखा — पीली दीवार, पुरानी ताख, ताख में रखी दादा की घिसी तस्वीर, और चूल्हे के पीछे वाला वो दरवाज़ा, जिस पर सालों पुराना ताला लगा था।

"मैं इस घर में पहली बार बैठा हूँ," वो बोले। "पचास साल में पहली बार।"

"तो अब इसे पहली बार मान लीजिए," माँ ने गुड़ का पानी उनके हाथ में रखते हुए कहा। "और जो पहली बार होता है, वो थोड़ा मीठा होता है। पी लीजिए।"

उन्होंने लोटा दोनों हाथों से पकड़ा। हाथ काँप रहे थे, तो माँ ने खुद उनके हाथ नीचे से सहारा दिया। याकूब चाचा ने पिया, और मैंने देखा कि पीते वक़्त उनकी आँखें बंद थीं और एक आँसू उनकी झुर्री में उतरकर गुम हो गया — जैसे बरसों से सूखी नाली में पहली बार पानी आया हो।

माँ ने रोटी रखी। घी लगी, गरम। और साथ में एक छोटी कटोरी में अचार।

"इस घर में दाल में पानी नहीं मिलता," माँ ने कहा, "और बात में भी नहीं। तो मैं सीधी बात करूँगी। आप जिस हिसाब से आए हैं, उसका पहला हिस्सा ये रोटी है। बाकी बातें खाने के बाद।"

उस्ताद दीवार के सहारे खड़े होकर मुस्कुराए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और आँखों से कहा — ये औरत आज कुछ करवाकर रहेगी।

तभी पीछे के कमरे का परदा हिला और पापा निकले।

वो दीवार टटोलकर, झुके हुए, धीरे-धीरे आ रहे थे। पैर ज़मीन पर घसीटते हुए। मैं दौड़कर पहुँचा, पर उन्होंने हाथ उठाकर मुझे रोक दिया।

"मैं खुद चलूँगा," उन्होंने कहा। और चले।

याकूब चाचा ने सिर उठाया। दोनों की नज़रें मिलीं — और कमरे में हवा जैसे रुक गई।

किसी ने कुछ नहीं कहा। एक लंबी साँस भर का वक़्त। फिर पापा ने कुर्सी खींची और याकूब चाचा के सामने बैठ गए — ज़मीन पर नहीं, बिल्कुल उनके सामने, घुटनों के बल, इतने पास कि दोनों की साँसें एक ही हवा में मिल जाएँ।

"चाचा," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ फटी हुई थी, "मैं आपका इल्ज़ाम नहीं कर सकता।"

याकूब चाचा सकपका गए।

"मैंने भी," पापा ने कहा, "एक डर के कारण काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। मुझे नहीं पता था उस काग़ज़ पर क्या लिखा है। मुझे बस इतना पता था कि अगर मैंने अंगूठा नहीं लगाया, तो मेरी बीवी का इलाज रुक जाएगा। उस रात मैंने अपने आपको समझाया कि ये सिर्फ़ एक अंगूठा है। काग़ज़ नहीं है।"

उनकी आवाज़ और धीमी हो गई।

"बाईस साल मैंने अपने आपको यही समझाया। हर बार नहीं समझ पाया। इसलिए चाचा, जो आदमी अपने अंगूठे से डरता है, वो आपके हाथ पर उँगली नहीं उठा सकता।"

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